
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि हमारे लचर प्रशासनिक तंत्र द्वारा की गई एक सोची-समझी लापरवाही है। इस अग्निकांड से उठे काले धुएं ने न सिर्फ मासूम छात्रों के भविष्य को संकट में डाला, बल्कि सुरक्षा और नियमों का दम भरने वाले पूरे सिस्टम के चेहरे पर गहरी कालिख पोत दी है। जब भी ऐसा कोई दर्दनाक वाकया होता है, तो कागजी जांच और दिखावटी सीलिंग की कार्रवाई शुरू हो जाती है, लेकिन हकीकत जस की तस बनी रहती है। एक जिम्मेदार रिपोर्टर और सजग नागरिक के नाते अब वक्त आ गया है कि इस खोखलेपन पर केवल अफसोस न जताया जाए, बल्कि इसके लिए जिम्मेदार सफेदपोशों और भ्रष्ट अफसरों की फौरन जवाबदेही तय की जाए।
आखिर कब तक मासूमों की जान से खेलता रहेगा यह भ्रष्ट तंत्र
यह कोई पहली बार नहीं है जब किसी कोचिंग हब में ऐसी भयावह आग लगी हो। देश के अलग-अलग हिस्सों से लेकर खुद लखनऊ के कई इलाकों में बेसमेंट और संकरी गलियों के भीतर धड़ल्ले से मौत के ये अड्डे संचालित हो रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब इन इमारतों के पास न तो पर्याप्त वेंटिलेशन होता है और न ही आपातकालीन निकास, तो स्थानीय प्रशासन, विकास प्राधिकरण और अग्निशमन विभाग इन्हें हरी झंडी कैसे दे देते हैं? क्या चंद रुपयों की रिश्वत और रसूख के दम पर मासूम बच्चों की जिंदगी का सौदा करना इस सिस्टम की आदत बन चुका है? इस हादसे ने साफ कर दिया है कि जब तक जमीनी स्तर पर काम करने वाले इंस्पेक्टरों से लेकर उच्च अधिकारियों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं होगा, तब तक ये दुकानें बंद नहीं होंगी।
जांच के नाम पर केवल लीपापोती और खानापूर्ति बर्दाश्त नहीं
हादसे के बाद अमूमन देखा जाता है कि सरकारें बड़ी-बड़ी जांच कमेटियां बना देती हैं, जिनमें बड़े आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को शामिल कर दिया जाता है। यह कदम प्रशासनिक तौर पर सही हो सकता है, लेकिन जनता अब सिर्फ वादों और लंबी खिंचने वाली जांच रिपोर्टों से थक चुकी है। अक्सर इन जांचों की आड़ में असली दोषियों को बच निकलने का मौका मिल जाता है और सारा दोष बिल्डिंग के मालिक या किसी छोटे कर्मचारी पर मढ़ दिया जाता है। इस बार लखनऊ की अवाम और पीड़ित परिवार सीधे कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। जवाबदेही उसकी होनी चाहिए जिसने इस अवैध निर्माण को आंखें मूंदकर बढ़ावा दिया और समय रहते शिकायतों पर कोई कड़ा एक्शन नहीं लिया।
अब बदलाव का वक्त: कोचिंग्स को कड़े रेगुलेशन के दायरे में लाना अनिवार्य
अगर हम सच में चाहते हैं कि भविष्य में लखनऊ या देश के किसी भी अन्य कोने में ऐसा कोई अग्निकांड दोबारा न हो, तो पूरे एजुकेशन और कोचिंग सेक्टर के लिए एक बेहद सख्त और पारदर्शी कानून बनाना होगा। हर एक संस्थान की रैंडम चेकिंग होनी चाहिए और उसकी फायर सेफ्टी ऑडिट रिपोर्ट को पब्लिक डोमेन में ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि माता-पिता अपने बच्चों का दाखिला कराने से पहले खुद सुरक्षा मानकों को परख सकें। सिस्टम को अब जागना होगा और यह समझना होगा कि शिक्षा के नाम पर व्यापार करने वाले इन केंद्रों को कड़े नियमों के हंटर से ही सुधारा जा सकता है। अब बातें बहुत हो चुकीं, अब सिर्फ और सिर्फ सख्त और त्वरित एक्शन की दरकार है।
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