कामाख्या धाम में अंबुबाची मेले का आगाज: 3 दिनों के लिए बंद हुए मंदिर के कपाट, जानें क्या है ‘लाल वस्त्र’ और तंत्र साधना का रहस्य

असम की मनोरम नीलांचल पहाड़ियों पर स्थित विश्व प्रसिद्ध मां कामाख्या देवी मंदिर में सोमवार (22 जून, 2026) से ऐतिहासिक और अलौकिक ‘अंबुबाची मेले’ की शुरुआत हो गई है। पूरे भारतवर्ष में स्थित मां दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में कामाख्या मंदिर का स्थान सबसे सर्वोच्च, चमत्कारी और रहस्यमयी माना जाता है। यह सनातन धर्म का इकलौता ऐसा मंदिर है, जहां माता की कोई मूर्ति स्थापित नहीं है, बल्कि यहां देवी की महामुद्रा की आराधना की जाती है। अंबुबाची मेले के दौरान इस पावन धाम में एक बेहद अनोखी प्राकृतिक और आध्यात्मिक घटना घटित होती है, जिसके साक्षी बनने और तंत्र-मंत्र की सिद्धियां प्राप्त करने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु, नागा साधु, अघोरी और सिद्ध तांत्रिक यहां डेरा डालते हैं।

आखिर क्यों सनातनी आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है कामाख्या?

गुवाहाटी के नीलांचल पर्वत पर स्थित कामाख्या मंदिर को आदि शक्ति की उपासना का मुख्य केंद्र माना जाता है। पौराणिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के पार्थिव शरीर के टुकड़े किए थे, तब इस पावन स्थान पर माता का योनि भाग गिरा था। इसी वजह से यह स्थान सर्वोच्च शक्तिपीठ के रूप में विख्यात हुआ। मंदिर के गर्भगृह में कोई इंसानी मूर्ति नहीं है, बल्कि एक प्राकृतिक शिला (चट्टान) मौजूद है, जिसमें एक प्राकृतिक दरार बनी हुई है। इसी दरार को देवी की महामुद्रा या योनि मुद्रा के रूप में साक्षात पूजा जाता है, जिससे लगातार प्राकृतिक जल का प्रवाह होता रहता है।

क्यों बंद कर दिए जाते हैं मंदिर के कपाट और पूजा?

धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अंबुबाची उत्सव के इन तीन दिनों के दौरान माता कामाख्या मासिक धर्म (रजस्वला) की अवस्था में होती हैं। इस समय को साक्षात देवी के पूर्ण विश्राम का काल माना जाता है। इसी पावन मान्यता के चलते मुख्य मंदिर के कपाट आम जनता और पुजारियों के लिए भी पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं और इन दिनों मंदिर के भीतर कोई नियमित पूजा-अर्चना नहीं होती। आध्यात्मिक गुरुओं का मानना है कि इस विशेष अवधि में पूरी धरती माता भी सृजन शक्ति और उर्वरता से जुड़ी एक दिव्य ऊर्जा प्राप्त करती हैं। यही कारण है कि यह पर्व प्रकृति और स्त्री शक्ति के सम्मान का सबसे बड़ा वैश्विक प्रतीक है।

अघोरियों, नागा साधुओं और तांत्रिकों का महाकुंभ

अंबुबाची मेले को पूरी दुनिया में तंत्र साधना और अघोर पंथ का महाकुंभ माना जाता है। सनातन परंपरा में यह मान्यता है कि इन तीन दिनों के भीतर की गई गुप्त साधना, मंत्र जाप और अनुष्ठान तुरंत सिद्ध हो जाते हैं। यही वजह है कि असम की इन पहाड़ियों पर देश के कोने-कोने से आए खूंखार अघोरी, हिमालय से उतरे नागा साधु और गुप्त विधाओं के जानकार तांत्रिक अपनी गुप्त शक्तियों को जगाने के लिए विशेष अनुष्ठान करते हैं। माना जाता है कि अंबुबाची के दौरान नीलांचल पर्वत की आध्यात्मिक ऊर्जा अपने चरम स्तर पर होती है, जो साधकों की चेतना को जागृत करती है।

लाल वस्त्र और ब्रह्मपुत्र नदी के लाल जल का अनोखा चमत्कार

अंबुबाची मेला शुरू होने से ठीक पहले, मंदिर के मुख्य पुजारियों द्वारा गर्भगृह के भीतर पवित्र प्राकृतिक शिला के पास सफेद रंग के सूती अंगवस्त्र (कपड़े) रखे जाते हैं। तीन दिनों के बाद जब माता का विश्राम काल पूरा होता है और कपाट खोले जाते हैं, तो वे सफेद वस्त्र पूरी तरह से लाल रंग में भीगे हुए मिलते हैं। इस चमत्कारी कपड़े को ‘अंबुबाची वस्त्र’ या ‘रक्त वस्त्र’ कहा जाता है, जिसे आशीर्वाद और महाप्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में बांटा जाता है। इसे घर में रखना अत्यंत शुभ और रक्षक माना जाता है। इसके साथ ही, इन तीन दिनों में मंदिर के पास से बहने वाली विशाल ब्रह्मपुत्र नदी का पानी भी पूरी तरह लाल रंग का हो जाता है, जिसे भक्त देवी की असीम और साक्षात दिव्य शक्ति का चमत्कार मानते हैं।

26 जून को खुलेंगे कपाट, उमड़ेगा भक्तों का सैलाब

अंबुबाची पर्व के नियमों के अनुसार, तीन दिनों की पूर्ण बंदी के बाद आगामी 26 जून, 2026 की पावन सुबह माता कामाख्या की विशेष महापूजा, शुद्धिकरण और श्रृंगार आरती की जाएगी। इस भव्य अनुष्ठान के संपन्न होते ही मंदिर के मुख्य द्वार देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिए जाएंगे। प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था और भीड़ नियंत्रण के लिए पूरे गुवाहाटी और नीलांचल पर्वत क्षेत्र में कड़े सुरक्षा इंतजाम किए हैं।