
उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) और देश की राजनीति के गलियारों से इस वक्त राज्यसभा चुनावों (Rajya Sabha Elections) को लेकर एक बहुत बड़ी, तीखी और सनसनीखेज राजनीतिक जंग छिड़ चुकी है। बहुजन समाज पार्टी (BSP) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती (Mayawati) ने समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पर एक बेहद आक्रामक और तीखा हमला बोला है। यह पूरा विवाद रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े वरिष्ठ कार्यकारी और उद्योगपति धनराज नथवानी (Dhanraj Nathwani) को राज्यसभा का टिकट दिए जाने की चर्चाओं के बाद शुरू हुआ है। मायावती ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों से तीखे शब्दों में प्रहार करते हुए कहा है कि समाजवादी पार्टी हमेशा से ही ‘धन्नासेठों’ (पूंजीपतियों और अरबपतियों) को संसद भेजती आई है और गरीब, शोषित तथा वंचित समाज के वास्तविक हितों की अनदेखी करती है। इस बयान के सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश के राजनीतिक पारे में अचानक उबाल आ गया है और विपक्षी दलों के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। आज के इस विस्तृत, राजनीतिक विश्लेषणात्मक और जमीनी आलेख में हम आपको इस पूरे विवाद की पूरी कहानी, मायावती के बयानों और राज्यसभा की इस सियासत के सभी अंदरूनी पहलुओं के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।
धनराज नथवानी को राज्यसभा भेजने की चर्चाओं पर क्यों भड़कीं बसपा प्रमुख मायावती?
राज्यसभा की रिक्त सीटों के लिए चल रही जोड़तोड़ और उम्मीदवारों के नामों के ऐलान के बीच जब उद्योगपति धनराज नथवानी को टिकट दिए जाने की बात राजनीतिक गलियारों में तैरने लगी, तो बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने बिना एक पल गंवाए समाजवादी पार्टी पर सीधा निशाना साध लिया। मायावती ने अपने तीखे तेवरों में यह स्पष्ट रूप से कहा कि जो दल खुद को समाजवाद और पिछड़ों-शोषितों का मसीहा होने का दावा करते हैं, वे असल में चुनाव के वक्त बड़े-बड़े उद्योगपतियों और पूंजीपतियों यानी ‘धन्नासेठों’ के सामने नतमस्तक हो जाते हैं। बसपा सुप्रीमो का यह तर्क रहा है कि इस तरह के फैसलों से यह साबित होता है कि राजनीतिक दलों के लिए जनता का दर्द और जमीन पर संघर्ष करने वाले साधारण कार्यकर्ता कोई मायने नहीं रखते, बल्कि केवल चुनावी फंडिंग और कॉरपोरेट घराने ही उनकी प्राथमिकता बन चुके हैं। इस प्रकार के कड़े बयानों ने एक बार फिर से यूपी की राजनीति में उस पुरानी बहस को जिंदा कर दिया है जिसमें जनता बनाम पूंजीपति की लड़ाई पर चर्चा की जाती है।
समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव की रणनीति पर खड़े किए गए गंभीर सवाल
राजनीतिक जानकारों का यह मानना है कि मायावती द्वारा उठाया गया यह कदम पूरी तरह से उनकी उस मूल वैचारिक राजनीति का हिस्सा है जो कांशीराम और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के उन सिद्धांतों पर आधारित है, जहां बहुजनों और गरीबों को राजनीतिक सत्ता की मुख्यधारा में लाने की बात कही जाती है। अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी पर हमला बोलते हुए मायावती ने यह आरोप लगाया कि सपा का चरित्र कभी भी जमीनी और सर्वहितकारी नहीं रहा है, बल्कि वह केवल खास वर्गों और रईसों को संसद की चौखट तक पहुँचाने का काम करती है। जब से यह सियासी मुकाबला गर्माया है, तब से समाजवादी खेमे की तरफ से भी इसके जवाब में राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो चुकी है, जिसमें यह तर्क दिया जा रहा है कि राजनीतिक प्रबंधन और विधानसभा में सीटों के गणित को साधने के लिए इस प्रकार के फैसले पार्टी की रणनीति का हिस्सा होते हैं। लेकिन जनता के बीच इस बहस ने एक नया वैचारिक द्वंद्व जरूर खड़ा कर दिया है।
राज्यसभा चुनावों का गणित और उत्तर प्रदेश के सियासी समीकरणों पर इसका असर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा का हर एक चुनाव और विधानसभा के विधायकों का संख्या बल आने वाले बड़े चुनावों की दिशा और दशा तय करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। वर्तमान में जिस प्रकार से राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के चयन को लेकर गोपनीय रणनीतियाँ बना रहे हैं, उससे यह साफ जाहिर होता है कि कोई भी दल अपनी तरफ से कोई चूक नहीं करना चाहता। धनराज नथवानी जैसे बड़े कॉरपोरेट चेहरे के नाम के जुड़ने से चुनाव का यह पूरा परिदृश्य और अधिक रोचक बन गया है। जहाँ एक तरफ सत्ताधारी दल और अन्य बड़े गठबंधन अपनी वित्तीय और प्रबंधकीय ताकत को मजबूत करने में लगे हैं, वहीं मायावती ने इस मुद्दे को लपककर एक बार फिर से खुद को दलितों, पिछड़ों और वंचितों की एकमात्र सच्ची हितैषी के रूप में स्थापित करने की पुरजोर कोशिश की है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि इस जुबानी जंग का उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों पर क्या और कितना गहरा असर पड़ता है।
जनता के बीच चर्चा का विषय बनी यह राजनीतिक बयानबाजी और इसके दूरगामी परिणाम
उत्तर प्रदेश के आम मतदाताओं, चाय की दुकानों पर चर्चा करने वालेबुद्धिजीवियों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इस वक्त केवल इसी बात की चर्चा है कि क्या बड़े पूंजीपतियों को राजनीति में इस प्रकार से आगे बढ़ाना लोकतंत्र के लिए सही है या गलत। मायावती के इस आक्रामक रुख ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि वे भले ही चुनावी मैदान में अपनी पुरानी ताकत हासिल करने के लिए संघर्ष कर रही हों, लेकिन वैचारिक मुद्दों और जनता से जुड़े मामलों पर हमलावर होने में वे पीछे हटने वाली नहीं हैं। चुनाव नजदीक आते-आते इस तरह के बयान और तीखे हमले राज्य की राजनीति को और अधिक गरमाने का काम करेंगे। तब तक तमाम राजनीतिक दलों के नेता अपनी-अपनी जीत के समीकरणों को साधने में जुटे हैं और जनता इस हाई-प्रोफाइल राजनीतिक ड्रामे के अगले और बड़े अध्याय का इंतजार कर रही है।
girls globe