
बिहार की सियासत में एक बार फिर नीतीश कुमार के सबसे महत्वाकांक्षी और कड़े फैसले यानी ‘पूर्ण शराबबंदी’ (Liquor Ban in Bihar) को लेकर घमासान छिड़ गया है। राज्य में शराबबंदी के इतने साल बीत जाने के बाद भी इसको लेकर सत्ताधारी दल जनता दल यूनाइटेड (JDU) के अंदर ही मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। पार्टी के भीतर इस नीति को लेकर नेताओं के सुर पूरी तरह से बदलते नजर आ रहे हैं। जहां एक तरफ पार्टी के एक बड़े और वरिष्ठ नेता ने शराबबंदी कानून के व्यावहारिक असर को देखते हुए इसकी समीक्षा (Review) करने की पुरजोर वकालत की है, वहीं दूसरी तरफ दूसरे कद्दावर नेता ने इस मांग को सिरे से खारिज करते हुए तीखा बयान दिया है, जिससे राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है।
“महिलाओं के श्राप में भस्म हो जाएंगे”: शराबबंदी के समर्थन में तीखा बयान
बिहार में शराबबंदी के पक्षधर नेताओं का मानना है कि यह फैसला राज्य की करोड़ों माताओं और बहनों के सम्मान, सुरक्षा और उनके घरों को बचाने के लिए एक ऐतिहासिक कदम था। पार्टी के एक धड़े का साफ कहना है कि यदि इस कानून में किसी भी तरह की ढील दी गई या इसकी समीक्षा के नाम पर इसे कमजोर किया गया, तो यह राज्य की महिलाओं के साथ बड़ा विश्वासघात होगा। उनका यह भी तर्क है कि इस कड़े कानून की बदौलत ही समाज में अपराध और घरेलू हिंसा के मामलों में भारी कमी आई है, इसलिए इसे किसी भी कीमत पर बदला नहीं जाना चाहिए और महिलाओं के आशीर्वाद से ही सरकार सुरक्षित है।
जेडीयू के भीतर क्यों उठ रहे हैं समीक्षा के सुर?
दूसरी तरफ, जेडीयू के भीतर ही उठ रहे दूसरे स्वर का यह तर्क है कि कानून लागू होने के बावजूद धरातल पर अवैध शराब की तस्करी और ब्लैक मार्केटिंग के मामले पूरी तरह नहीं रुक पाए हैं, जिससे कई बार प्रशासन और पुलिस पर भी सवाल खड़े होते हैं। कुछ नेताओं का मानना है कि व्यावहारिक कठिनाइयों और राजस्व नुकसान को ध्यान में रखते हुए नीति के कुछ पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए ताकि प्रशासन का फोकस पूरी तरह से अपराधियों पर रहे। पार्टी के भीतर इस प्रकार की दोफाड़ और अलग-अलग बयानों के सामने आने से विपक्षी दलों को भी सरकार पर हमला बोलने का बड़ा मौका मिल गया है, और आने वाले दिनों में यह मुद्दा बिहार की राजनीति में एक बार फिर तूफान खड़ा कर सकता है।
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