मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में बड़ा राजफाश, 6.6 करोड़ की जमीन अधिकारियों ने छलपूर्वक छह लाख में खरीदी

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से सरकारी तंत्र को शर्मसार कर देने वाला एक बेहद सनसनीखेज और बड़ा राजफाश सामने आया है। यहां के तामिया में स्थित पातालकोट व्यू पॉइंट के पास रहने वाले अत्यंत पिछड़ी भारिया जनजाति के एक सीधे-साधे आदिवासी परिवार के साथ प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा मिलीभगत कर करोड़ों रुपये के जमीनी घोटाले को अंजाम देने का गंभीर आरोप लगा है। आरोप है कि राजस्व विभाग के बड़े अधिकारियों ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए इस आदिवासी परिवार की करीब 11 एकड़ पुश्तैनी जमीन, जिसकी बाजार में कीमत 6 करोड़ 60 लाख रुपये से भी ज्यादा है, उसे छलपूर्वक और धोखाधड़ी से महज 6 लाख रुपये में अपने ही सगे-संबंधियों के नाम पर रजिस्ट्री करवा लिया। इस चौंकाने वाले खुलासे के बाद पूरे प्रदेश के प्रशासनिक अमले और राजनैतिक हलकों में हड़कंप मच गया है। संपादक जीत कुमार की इस विशेष खोजी डिजिटल रिपोर्ट में जानिए कि कैसे सरकारी योजनाओं के नाम पर आदिवासियों को ठगा गया।

एसडीएम के पिता, तहसीलदार की पत्नी और बीएमओ के नाम हुई रजिस्ट्री, अफसरों ने ऐसे बुना जाल

पीड़ित आदिवासी परिवार द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों के मुताबिक, इस महाघोटाले में शामिल तत्कालीन अधिकारियों ने कानून और नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए जमीन को अपने परिवार के सदस्यों के नाम ट्रांसफर करवाया। यह बेशकीमती जमीन चौरा पठार और मशहूर पातालकोट व्यू पॉइंट के ठीक पास मुख्य सड़क के किनारे स्थित है। इस जमीन की रजिस्ट्री तत्कालीन तहसीलदार उमराज वारले की पत्नी प्रियंका वालरे, ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (BMO) जितेंद्र शाह और जुन्नारदेव एसडीएम कामिनी ठाकुर के पिता दिलीप सिंह के नाम पर कराई गई है। चूंकि यह जमीन आदिवासी की थी, इसलिए खरीदार भी आदिवासी वर्ग के ही इन रसूखदार अधिकारियों के रिश्तेदारों को बनाया गया ताकि कानूनी पचड़ों से बचा जा सके।

पुश्तैनी जमीन के पारिवारिक विवाद का उठाया फायदा, सालों से चल रही थी बंटवारे की जंग

इस पूरे खेल की पृष्ठभूमि को समझें तो पीड़ित भारिया परिवार की तामिया में कुल 22 एकड़ पुश्तैनी जमीन है। मूल भू-स्वामी नांहों भारती की मौत के बाद उनकी दो बेटियों, विप्पा भारती और सिमिना बाई के बीच जमीन के सीमांकन और आपसी बंटवारे को लेकर सालों से तहसील कोर्ट में विवाद चल रहा था। समय बीतने के साथ दोनों बहनों की भी मौत हो गई और जब जमीन के वारिसों की संख्या बढ़ी, तो यह पारिवारिक विवाद और ज्यादा गहरा गया। इसी पारिवारिक कलह और कानूनी उलझन का फायदा उठाते हुए राजस्व विभाग के इन शातिर अधिकारियों ने जमीन पर अपनी नजरें गड़ा दीं और सिमिना बाई के पुत्र को विश्वास में लेकर 11 एकड़ जमीन की रजिस्ट्री का पूरा ताना-बाना बुन डाला।

सरकारी योजना के ई-केवाईसी (e-KYC) के नाम पर कोरे कागजों पर लगवाए अंगूठे और दस्तखत

पीड़ित परिवार के सदस्यों ने अधिकारियों की इस जालसाजी की जो कहानी बयां की है, वह बेहद डराने वाली है। पीड़ितों का आरोप है कि जुन्नारदेव की एसडीएम पिछले साल खुद उनके घर जमीन का सौदा करने आई थीं। जब सीधे-साधे आदिवासियों ने अपनी पुश्तैनी जमीन बेचने से साफ मना कर दिया, तो अधिकारियों ने साजिश के तहत तत्कालीन पटवारी लेखराम नदवंशी और स्थानीय कोटवार को उनके घर भेजा। पटवारी और कोटवार ने भोले-भाले आदिवासियों को झांसा दिया कि सरकार की एक नई योजना का लाभ दिलाने के लिए उनका ई-केवाईसी (e-KYC) होना बेहद जरूरी है। ई-केवाईसी के बहाने चालाकी से कोरे कागजों और सरकारी दस्तावेजों पर परिवार के सदस्यों के अंगूठे के निशान और दस्तखत ले लिए गए। बाद में इन्हीं हस्ताक्षरों का अवैध इस्तेमाल कर चुपचाप जमीन का मनमाना बंटवारा और नामांतरण फाइल तैयार कर ली गई।

मात्र 28 दिनों में फाइल मंजूर, सरकारी गाइडलाइन और बाजार मूल्य को ताक पर रखकर हुआ खेल

अधिकारियों के इस रसूख का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस सरकारी दफ्तर में आम जनता की फाइलों पर सालों तक धूल जमती है, वहां इस जमीन के नामांतरण (Mutation) का काम एक्सप्रेस स्पीड से हुआ। तहसील ऑफिस में 2 मई 2025 को नामांतरण के लिए आवेदन पेश किया गया और महज 28 दिनों के भीतर, यानी 30 मई 2025 को इसे मंजूरी भी मिल गई। इसके तुरंत बाद 2 जुलाई 2025 को जमीन की रजिस्ट्री भी अधिकारियों के परिवार के नाम कर दी गई। व्यावसायिक उपयोग वाली इस बेहद कीमती जमीन का बाजार मूल्य कम से कम 60 लाख रुपये प्रति एकड़ है, जबकि शासकीय गाइडलाइन में भी इसकी कीमत करीब 27 लाख रुपये प्रति एकड़ दर्ज है। इस लिहाज से 11 एकड़ जमीन की कुल कीमत करीब 6 करोड़ 60 लाख रुपये होती है, जिसे इन अधिकारियों ने महज 6 लाख रुपये (3 लाख रुपये चेक द्वारा और 3 लाख रुपये नकद) दिखाकर कौड़ियों के भाव अपने नाम लिखवा लिया। पीड़ित परिवार अब इंसाफ के लिए उच्च अधिकारियों और न्यायपालिका का दरवाजा खटखटा रहा है।