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भोपाल में पूर्व अखबार मालिक को 10 बार उम्रकैद की सजा, 77.64 लाख का जुर्माना; नाबालिगों के शोषण मामले में कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

भोपाल/विशेष संवाददाता। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण, अवैध नशीले पदार्थों के सेवन और सुनियोजित मानव तस्करी के बेहद चर्चित व रूह कंपा देने वाले मामले में न्यायपालिका ने कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। भोपाल की विशेष पॉक्सो (POCSO) अदालत ने एक स्थानीय समाचार पत्र के पूर्व मालिक व मुख्य दोषी को 10 अलग-अलग आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सख्त सजा सुनाई है। इसके साथ ही अदालत ने दोषी पर कुल 77.64 लाख रुपये का भारी-भरकम आर्थिक जुर्माना भी ठोका है। इस पूरे कुकृत्य में उसका साथ देने वाली महिला सहयोगी को भी कोर्ट ने किसी प्रकार की नरमी न दिखाते हुए 20 वर्ष के कठोर कारावास और अर्थदंड की सजा मुकर्रर की है। मीडिया और रसूख की आड़ में नाबालिग बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाने वाले इस गिरोह के खिलाफ अदालत के इस कठोर फैसले को राज्य में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से एक नजीर के तौर पर देखा जा रहा है।

इस सनसनीखेज मामले की जड़ें जुलाई 2020 में उस समय खुली थीं, जब भोपाल पुलिस ने शहर के रातीबड़ इलाके में देर रात संदिग्ध हालत में घूमती पांच नाबालिग बच्चियों को सुरक्षित बचाया था। पूछताछ के दौरान बालिकाओं ने जो आपबीती बयां की, उसने पुलिस प्रशासन और सभ्य समाज के होश उड़ा दिए थे। जांच में खुलासा हुआ कि दोषी व्यक्ति एक सांध्य दैनिक अखबार की आड़ लेकर शहर के प्रशासनिक व सामाजिक हलकों में खुद का बड़ा रसूख दिखाता था। इसी प्रभाव का इस्तेमाल कर वह आर्थिक रूप से बेहद कमजोर, जरूरतमंद और झुग्गी बस्तियों में रहने वाली किशोरियों को अपने जाल में फंसाता था। बच्चियों को अच्छी नौकरी दिलाने, मॉडलिंग कराने, अखबार में काम देने और ऐशो-आराम की जिंदगी का लालच दिया जाता था। इसके बाद भोपाल के पॉश इलाकों जैसे श्यामला हिल्स और शाहपुरा स्थित फ्लैट्स व पेंटहाउस में लेट-नाइट पार्टियों के बहाने उन्हें बुलाया जाता था। वहां नाबालिगों को शराब व अन्य नशीले पदार्थ दिए जाते थे और फिर उनके साथ दरिंदगी की जाती थी।

विशेष अदालत ने इस घिनौने अपराध तंत्र में मुख्य दोषी की खास सहयोगी स्वीटी विश्वकर्मा की भूमिका को भी बेहद खतरनाक और अक्षम्य माना। जांच एजेंसियों द्वारा पेश की गई चार्जशीट के अनुसार, स्वीटी ही वह मुख्य कड़ी थी जो मासूम बच्चियों को बहला-फुसलाकर दोषी के चंगुल तक लाती थी। वह खुद को एक बड़ी बहन या शुभचिंतक के तौर पर पेश करती थी और गरीब परिवारों की लड़कियों को अमीर बनने के सपने दिखाकर पार्टियों में ले जाती थी। जब लड़कियां दलदल में फंस जाती थीं, तो उन्हें ब्लैकमेल करना, धमकाना और बाहर किसी से शिकायत न करने के लिए दबाव बनाना इसी सहयोगी का काम था। अदालत ने स्वीटी को मानव तस्करी (धारा 370), साजिश और पॉक्सो एक्ट की संबंधित धाराओं में दोषी पाते हुए 20 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने अपनी टिप्पणी में स्पष्ट किया कि एक महिला होकर दूसरी अबोध बालिकाओं को नरक में धकेलने का कृत्य किसी भी स्थिति में दया का पात्र नहीं हो सकता।

अदालत ने केवल कठोर जेल की सजा तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि पीड़ितों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक पुनर्वास के लिए भी कड़े वित्तीय निर्देश जारी किए हैं। मुख्य दोषी पर लगाया गया 77.64 लाख रुपये का विशाल जुर्माना कानून के तहत वसूली प्रक्रिया में लाया जाएगा। इस जुर्माने की वसूली के लिए प्रशासन को दोषी की जब्त की गई संपत्तियों की नीलामी करने और बैंक खातों से राशि वसूलने की शक्तियां प्रदान की गई हैं। अदालत ने आदेश दिया है कि जुर्माने से प्राप्त होने वाली इस राशि का बड़ा हिस्सा पीड़ित बच्चियों को बतौर मुआवजा और पुनर्वास सहायता प्रदान किया जाएगा। नाबालिग बच्चियों को वर्षों तक जिस गहरे मानसिक आघात (ट्रॉमा) से गुजरना पड़ा है, उसकी भरपाई के लिए यह राशि उनके सुरक्षित भविष्य, उच्च शिक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए सरकारी ट्रस्ट या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से खर्च की जाएगी।

मामले की संवेदनशीलता और दोषी के राजनीतिक व रसूखदार संबंधों को देखते हुए मध्य प्रदेश पुलिस ने उस वक्त एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया था। जैसे ही बच्चियों के बयान दर्ज हुए और एफआईआर दर्ज की गई, आरोपी राजधानी से फरार हो गया था। पुलिस ने आरोपी पर एक लाख रुपये का नकद इनाम घोषित किया था। तकनीकी सर्विलांस और खुफिया सूत्रों की मदद से पुलिस की विशेष टीम ने आरोपी का पीछा किया और आखिरकार उसे जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर से एक होटल से धर दबोचा था। पुलिस ने जांच के दौरान आरोपी के कई ठिकानों पर छापेमारी कर डिजिटल साक्ष्य, सीसीटीवी फुटेज, विदेशी शराब, महंगी कारें और कई आपत्तिजनक सामग्रियां बरामद की थीं। नगर निगम और जिला प्रशासन ने भी त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी के अवैध मैरिज गार्डन, रेस्टोरेंट और अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चलाकर उन्हें ध्वस्त कर दिया था। अभियोजन पक्ष ने अदालत में दर्जनों गवाहों, फॉरेंसिक रिपोर्टों और मेडिकल साक्ष्यों को इतनी मजबूती से रखा कि बचाव पक्ष की तमाम दलीलें ध्वस्त हो गईं।

इस ऐतिहासिक फैसले पर टिप्पणी करते हुए कानूनी जानकारों और बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने कहा कि यह निर्णय पूरे देश के लिए एक बड़ा मील का पत्थर है। कई बार अपराधी मीडिया, प्रेस और अखबार के नाम की आड़ लेकर कानून की पकड़ से बचने का भ्रम पाल लेते हैं। लेकिन इस फैसले ने साबित कर दिया है कि अपराध कितना भी पुराना हो और अपराधी कितना भी साधन संपन्न या प्रभावशाली क्यों न हो, न्याय के तराजू पर कानून से ऊपर कोई नहीं हो सकता। पॉक्सो अधिनियम 2012 का मूल उद्देश्य ही यही है कि मासूमों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों में बिना किसी देरी के त्वरित और नजीर पेश करने वाला दंड दिया जाए। भोपाल कोर्ट का यह फैसला उन सभी अपराधियों के लिए एक खुला सबक है जो मासूमियत का सौदा करने की हिमाकत करते हैं। पीड़ित परिवारों ने भी अदालत के बाहर नम आंखों से फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि भले ही उनकी बेटियों के जख्म पूरी जिंदगी नहीं भरेंगे, लेकिन अदालत के इस न्याय ने उनके भीतर कानून के प्रति विश्वास को हमेशा के लिए जिंदा कर दिया है।