
भारतीय राजनीति में गठबंधन की सियासत (Coalition Politics) का इतिहास हमेशा से दिलचस्प, उतार-चढ़ाव से भरा और कभी-कभी विरोधाभासों से भरपूर रहा है। देश के राजनीतिक पटल पर जब भी वैचारिक रूप से अलग या विरोधी तेवर वाले दल आपस में हाथ मिलाते हैं, तो ‘गठबंधन धर्म’ (Alliance Dharma) का पाठ पढ़ाया जाता है। विशेष रूप से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर भाजपा (BJP) और जनता दल यूनाइटेड (JDU) का रिश्ता इस बात का सबसे जीवंत उदाहरण रहा है कि कैसे दो दल कभी एक-दूसरे के सबसे बड़े सियासी विरोधी बन जाते हैं और कुछ समय बाद ही फिर से गले मिलकर सरकार चलाने लगते हैं। इन दोनों दलों के बीच नेताओं का आना-जाना, पाला बदलना और चुनावी जरूरतों के हिसाब से अपने बयानों और सिद्धांतों को मोड़ लेना भारतीय राजनीतिक संस्कृति की एक ऐसी बानगी बन चुका है, जिसे देखकर आम जनता अक्सर यह सोचने पर मजबूर हो जाती है कि आखिर सियासत में सिद्धांतों का मोल कितना बचा है।
भाजपा और जदयू के संबंधों का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि दोनों दलों के बीच कई ऐसे नेता रहे हैं जो हवा का रुख भांपकर समय-समय पर पाला बदलते रहे हैं। जब दोनों दल साथ होते हैं तो एक-दूसरे की नीतियों की तारीफों के पुल बांधे जाते हैं, और जैसे ही रास्ते अलग होते हैं, वही नेता एक-दूसरे पर तीखे राजनीतिक हमले करने लगते हैं। यह केवल नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का खेल नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ा चुनावी गणित काम करता है। बिहार की राजनीति में जातिगत समीकरणों साधने के लिए कभी एनडीए के भीतर तो कभी महागठबंधन के खेमे में नेताओं की आवाजाही लगातार बनी रहती है। जनता के बीच भले ही यह संदेश दिया जाए कि यह सब जनहित और विकास के लिए हो रहा है, लेकिन हकीकत में यह सत्ता हासिल करने और अपने राजनीतिक वजूद को बचाए रखने की एक सोची-समझी रणनीति होती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आज के दौर में वैचारिक शुद्धता और वैचारिक प्रतिबद्धता पीछे छूट गई है और एकमात्र लक्ष्य चुनाव जीतना रह गया है। भाजपा की अपनी एक सुस्पष्ट वैचारिक पहचान और राष्ट्रवादी एजेंडा रहा है, जबकि जदयू ने लंबे समय तक समाजवादी विचारधारा और सामाजिक न्याय के बैनर तले अपनी राजनीति को गढ़ा है। बावजूद इसके, जब भी सत्ता के समीकरणों को साधने की बात आती है, दोनों दल तमाम वैचारिक मतभेदों को ताक पर रखकर एक मंच पर आ जाते हैं। इस तरह के समझौतों से भले ही अल्पकालिक राजनीतिक स्थिरता मिल जाती हो, लेकिन लंबे समय में यह लोकतांत्रिक संस्कृति और जनता के विश्वास को कमजोर करता है। जब एक ही नेता कुछ महीने पहले जिस पार्टी की आलोचना कर रहा होता है, कल उसी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ता नजर आता है, तो आम मतदाता के मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा होना स्वाभाविक है।
आज के समय में ‘गठबंधन धर्म’ शब्द सिर्फ भाषणों और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित होकर रह गया है। चुनाव के वक्त सीटों के बंटवारे को लेकर होने वाली खींचतान, अंदरखाने एक-दूसरे के खिलाफ चलने वाली रणनीतियां और परिणाम आने के बाद मजबूरी में बनायी गई सरकारें इस बात का सुबूत हैं कि यह रिश्ता केवल और केवल सत्ता के संतुलन पर टिका हुआ है। आने वाले समय में भी राजनीतिक परिस्थितियां जैसे-जैसे करवट लेंगी, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भाजपा और जदयू के बीच या फिर व्यापक राजनीतिक परिदृश्य में नेताओं की यह आवाजाही इसी तरह जारी रहेगी। बहरहाल, जनता अब इन सियासी ड्रामों को बहुत करीब से देख रही है और आने वाले चुनावों में वह इन पैंतरों का जवाब अपने मत के जरिए देने के लिए पूरी तरह तैयार बैठी है।
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