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प्रकृति की कीमत पर विकास नहीं, CJI सूर्यकांत बोले- पर्यावरण संरक्षण ही न्याय का असली ‘बरगद’ है सुप्रीम कोर्ट

देश की सर्वोच्च अदालत ने पर्यावरण संरक्षण और बेलगाम विकास के बीच चल रही तनातनी को लेकर एक बेहद स्पष्ट, कड़ा और दूरगामी संदेश पूरी देश और दुनिया के सामने रखा है। हाल ही में एक महत्वपूर्ण विधिक संगोष्ठी और न्यायिक कार्यक्रम के दौरान भारत के सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत (Justice Surya Kant) ने देश की न्यायपालिका की प्राथमिकताओं को रेखांकित करते हुए बहुत ही मार्मिक और शक्तिशाली बयान दिया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि इस आधुनिक युग में प्रकृति की कीमत पर किसी भी प्रकार के तथाकथित विकास को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। आज के दौर में जब देश तेजी से औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है, तब जंगलों के कटान, नदियों के प्रदूषण और पहाड़ों के सीने पर चलने वाली जेसीबी मशीनों ने प्राकृतिक संतुलन को बुरी तरह से तहस-नहस कर दिया है। सीजेआई सूर्यकांत ने इस बात पर जोर दिया कि विकास का पहिया भले ही अपनी पूरी गति से चले, लेकिन उसकी वजह से हमारी आने वाली पीढ़ियों के सांस लेने लायक शुद्ध हवा, पीने योग्य पानी और हरी-भरी धरती खतरे में नहीं पड़नी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि देश की सबसे बड़ी अदालत पर्यावरण और पारिस्थितिकी संतुलन के मुद्दों पर कितनी गंभीर और संवेदनशील है, और वह किसी भी विकास मॉडल को पर्यावरण के कत्ल की कीमत पर अनुमति देने के पक्ष में बिल्कुल नहीं है।

पर्यावरण न्याय का ‘बरगद’ है सुप्रीम कोर्ट, कमजोरों और मूक प्रकृति की आवाज बनी न्यायपालिका

अपने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने देश की सर्वोच्च अदालत की तुलना एक विशाल और घने ‘बरगद के पेड़’ से की, जो अपनी शीतल छाया से समाज के हर उस वर्ग और तत्व को सुरक्षा प्रदान करता है जो खुद अपनी रक्षा करने में असमर्थ है। उन्होंने गहराई से समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार बरगद का पेड़ हर राहगीर को बिना भेदभाव के अपनी छांव देता है, ठीक उसी तरह सुप्रीम कोर्ट पर्यावरण न्याय (Environmental Justice) का वह मजबूत स्तंभ है जो मूक प्रकृति, बेजुबान वन्यजीवों और उन आम नागरिकों की आवाज बनता है जो प्रदूषण और औद्योगिक दोहन के शिकार होते हैं। अदालतों के पास जब कभी भी वनों की कटाई, वन्यजीवों के आवास के विनाश या अनियंत्रित प्रदूषण से जुड़ी याचिकाएं पहुंचती हैं, तब न्यायपालिका संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को मिले जीने के अधिकार के दायरे में पर्यावरण के अधिकार को भी शामिल करती है। उन्होंने इस बात पर गर्व महसूस किया कि भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर ऐसे ऐतिहासिक और कड़े फैसले सुनाए हैं जिन्होंने देश के पर्यावरण को बचाने में अपनी बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। चाहे वह दिल्ली-एनसीआर का प्रदूषण संकट हो, हिमालयी क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण पर रोक लगाने की बात हो, या फिर नदियों को पुनर्जीवित करने के निर्देश हों, सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा पर्यावरण के प्रहरी की तरह अपनी भूमिका का पूरी निष्ठा और दृढ़ता के साथ निर्वहन किया है।

भविष्य की पीढ़ियों के लिए हरी-भरी विरासत बचाने का संकल्प और न्यायिक जवाबदेही

आज के समय में जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और मौसम के चक्र में आ रहे भयंकर बदलावों से जूझ रही है, तब न्यायपालिका की यह सोच पूरी मानव सभ्यता के लिए एक बड़ी राहत और उम्मीद की किरण लेकर आती है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने देश के सभी नीति-निर्माताओं, उद्योगपतियों और आम नागरिकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि यदि हमने आज अपनी प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा नहीं की, तो कल आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। विकास के नाम पर जंगलों को उजाड़ने और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाना अब केवल अदालतों की ही नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक नैतिक जिम्मेदारी बन चुकी है। सुप्रीम कोर्ट का यह बयान न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) का वह सुंदर उदाहरण है जहां कानून और न्याय केवल फाइलों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे हमारी धरती के अस्तित्व को बचाने ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं। आने वाले समय में पर्यावरण से जुड़े मामलों पर न्यायपालिका का यह कड़ा और संतुलित रुख उद्योगों और सरकारों को विकास की हर योजना बनाते समय पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) को पूरी ईमानदारी से लागू करने के लिए बाध्य करेगा। कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह संदेश हर भारतीय को यह सिखाता है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर चलना ही सच्ची प्रगति है, और इसके बिना किसी भी राष्ट्र का वास्तविक और टिकाऊ विकास संभव नहीं है।