
गले के निचले हिस्से में तितली के आकार की थायराइड ग्रंथि शरीर के संपूर्ण मेटाबॉलिज्म, हृदय गति और ऊर्जा स्तर को नियंत्रित करने का काम करती है। हाल के वर्षों में भारत सहित दुनिया भर में थायराइड विकारों के मामलों में भारी उछाल दर्ज किया गया है, जिसमें सबसे चिंताजनक बात यह है कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं इसकी चपेट में करीब आठ से दस गुना अधिक आ रही हैं। लखनऊ, दिल्ली, मुंबई, पटना और जयपुर जैसे बड़े शहरों के एंडोक्राइनोलॉजी क्लीनिक्स में आने वाले हर दस मरीजों में से सात से आठ महिलाएं होती हैं। थायराइड मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है—हाइपोथायरायडिज्म (जिसमें ग्रंथि से हार्मोन का स्राव कम हो जाता है और वजन तेजी से बढ़ता है) और हाइपरथायरायडिज्म (जिसमें हार्मोन का स्तर अत्यधिक बढ़ जाता है और शरीर तेजी से सूखने लगता है)। आधुनिक जीवनशैली और जैविक जटिलताओं के चलते यह बीमारी महिलाओं के समग्र स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है।
महिलाओं के शरीर में जीवन के विभिन्न चरणों में होने वाले भारी हार्मोनल बदलाव उन्हें थायराइड की समस्याओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना देते हैं। मासिक धर्म की शुरुआत (प्यूबर्टी), गर्भावस्था (प्रेग्नेंसी), प्रसव के बाद का समय (पोस्टपार्टम) और रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) के दौरान महिला शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन के स्तर में तेज उतार-चढ़ाव होता है। एस्ट्रोजन हार्मोन का सीधा संबंध थायराइड-बाइंडिंग ग्लोब्युलिन से होता है। जब एस्ट्रोजन का स्तर अनियंत्रित होता है, तो यह थायराइड हार्मोन के अवशोषण और कार्यप्रणाली को बाधित कर देता है। विशेषकर प्रसव के बाद कई महिलाओं में ‘पोस्टपार्टम थायराडाइटिस’ की समस्या देखी जाती है, जिसे अक्सर नई मां केवल प्रसव की सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देती हैं।
थायराइड विकारों का सबसे प्रमुख चिकित्सकीय कारण ऑटोइम्यून बीमारियां हैं। ऑटोइम्यूनिटी एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर की अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) भ्रमित होकर अपने ही स्वस्थ ऊतकों और अंगों पर हमला करने लगती है। महिलाओं में हाशिमोटो थायराडाइटिस (जिससे हाइपोथायरायडिज्म होता है) और ग्रेव्स डिजीज (जिससे हाइपरथायरायडिज्म होता है) सबसे आम ऑटोइम्यून स्थितियां हैं। चिकित्सा विज्ञानियों के अनुसार, महिलाओं में दो एक्स क्रोमोसोम (XX) होते हैं, जिनमें से कई इम्यून सिस्टम को नियंत्रित करने वाले जीन्स धारण करते हैं। इस अनुवांशिक और जैविक बनावट के कारण महिलाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली अधिक आक्रामक होती है, जो उन्हें किसी भी ऑटोइम्यून हमले के प्रति अधिक संवेदनशील बना देती है।
आज की आधुनिक जीवनशैली में महिलाओं पर घर-परिवार की देखभाल, कामकाजी दबाव और मल्टीटास्किंग का दोहरा बोझ रहता है। लगातार बना रहने वाला मानसिक और शारीरिक तनाव शरीर में ‘स्ट्रेस हार्मोन’ यानी कोर्टिसोल के स्तर को लगातार ऊंचा रखता है। कोर्टिसोल का बढ़ा हुआ स्तर पिट्यूटरी ग्लैंड और हाइपोथैलेमस को भ्रमित कर देता है, जिससे थायराइड स्टिमुलेटिंग हार्मोन (टीएसएच) का उत्पादन बाधित होता है। इसके अलावा, अत्यधिक तनाव टी4 हार्मोन को सक्रिय टी3 हार्मोन में बदलने की प्रक्रिया को धीमा कर देता है। तनाव के चलते आंतों का माइक्रोबायोम भी कमजोर पड़ता है, जिससे पोषक तत्वों का अवशोषण रुक जाता है और थायराइड ग्रंथि को आवश्यक ऊर्जा नहीं मिल पाती।
थायराइड ग्रंथि को सुचारू रूप से कार्य करने के लिए आयोडीन, सेलेनियम, जिंक, आयरन और विटामिन डी जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। भारतीय महिलाओं में अक्सर एनीमिया (आयरन की कमी) और विटामिन डी3 की गंभीर कमी पाई जाती है। आयरन की कमी से थायराइड पेरोक्सीडेज एंजाइम कमजोर हो जाता है, जो हार्मोन बनाने के लिए जरूरी है। इसके साथ ही, वजन घटाने के लिए की जाने वाली अत्यधिक क्रैश डाइटिंग, भूखे रहने की आदतें और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड व पैकेज्ड फूड का बढ़ता सेवन मेटाबॉलिज्म को सुस्त कर देता है। सोया प्रोडक्ट्स का अत्यधिक असंतुलित उपयोग और क्रूसिफेरस सब्जियों (जैसे पत्तागोभी, फूलगोभी) का कच्चा अत्यधिक सेवन भी कुछ मामलों में गॉइट्रोजेनिक प्रभाव पैदा कर हार्मोनल असंतुलन को बढ़ा सकता है।
थायराइड विकार अक्सर बहुत धीरे-धीरे पनपते हैं, जिसके कारण महिलाएं इनके शुरुआती संकेतों को सामान्य कमजोरी मानकर टाल देती हैं। हाइपोथायरायडिज्म के प्रमुख लक्षणों में बिना वजह वजन बढ़ना, हर समय अत्यधिक थकान और सुस्ती, बालों का तेजी से झड़ना, त्वचा का सूखापन, कब्ज, अत्यधिक ठंड लगना और पीरियड्स का अनियमित या बहुत भारी होना शामिल है। वहीं दूसरी ओर, हाइपरथायरायडिज्म में अचानक वजन घटना, दिल की धड़कन तेज होना, हाथों में कंपन, अत्यधिक पसीना आना, घबराहट और अनिद्रा जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। यदि इनमें से दो या तीन लक्षण भी लगातार बने रहें, तो बिना देर किए एक साधारण ब्लड टेस्ट—थायराइड प्रोफाइल (TSH, Free T3, Free T4)—कराना चाहिए।
थायराइड से बचाव और इसके प्रभावी प्रबंधन के लिए दवाओं के साथ-साथ समग्र जीवनशैली में सुधार लाना अनिवार्य है। अपने दैनिक आहार में कद्दू के बीज, अखरोट, भीगे बादाम, हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें और मौसमी फल शामिल करें जो सेलेनियम और जिंक की आपूर्ति करते हैं। प्रतिदिन कम से कम 30 मिनट का मध्यम व्यायाम, तेज चलना, या प्राणायाम (विशेषकर उज्जायी प्राणायाम और अनुलोम-विलोम) थायराइड ग्रंथि के रक्त संचार को बेहतर बनाने में अत्यधिक सहायक सिद्ध होते हैं। रात में 7 से 8 घंटे की निर्बाध नींद लें, अत्यधिक स्क्रीन टाइम सीमित करें और हर 6 महीने में अपनी थायराइड जांच नियमित रूप से करवाते रहें ताकि किसी भी गड़बड़ी को शुरुआती स्तर पर ही नियंत्रित किया जा सके।
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