
बिहार की राजनीति में विधान परिषद की सीटों को लेकर घमासान हमेशा से दिलचस्प रहा है, लेकिन इस बार पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव सत्ताधारी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) के लिए गले की फांस बनता जा रहा है। स्थिति ऐसी बन चुकी है कि राजनीतिक गलियारों में साल 2002 के उस पुराने और डरावने सियासी समीकरण की चर्चा फिर से होने लगी है, जब अपनों की नाराजगी और भीतरघात के कारण एनडीए को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। इस बार मोकामा के बाहुबली विधायक और जेडीयू नेता अनंत सिंह के तीखे तेवरों ने पार्टी के अंदरखाने खलबली मचा दी है। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता और मौजूदा एमएलसी नीरज कुमार इस सीट से एक बार फिर चुनावी मैदान में उतरकर जीत का चौका लगाने की फिराक में हैं, लेकिन उनके रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा कोई विपक्षी दल नहीं बल्कि उनकी ही पार्टी के भीतर से उठ रहा विरोध है। हालात की नजाकत को भांपते हुए पार्टी नेतृत्व पूरी तरह सक्रिय हो चुका है और इस अंतरकलह को थामने के लिए ताबड़तोड़ बैठकों का दौर शुरू हो गया है।
क्या है साल 2002 का वह खतरा जो डरा रहा है जेडीयू के रणनीतिकारों को?
बिहार के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो साल 2002 में पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव आपसी कलह और बगावत का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। उस दौरान एनडीए समर्थित उम्मीदवार के रूप में नीरज कुमार मैदान में थे, लेकिन पार्टी के भीतर टिकट बंटवारे और आपसी खींचतान के कारण वरिष्ठ नेता रमेश प्रसाद सिंह बगावत कर निर्दलीय मैदान में कूद पड़े थे। उस त्रिकोणीय मुकाबले में सवर्ण वोटों का भारी ध्रुवीकरण और बिखराव हो गया था, जिसका सीधा फायदा राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के उम्मीदवार को मिला और वे चुनाव जीत गए, जबकि मजबूत मानी जाने वाली एनडीए समर्थित ताकतें पीछे छूट गईं। आज साल 2026 के इस चुनावी मोड़ पर ठीक वैसा ही इतिहास दोहराए जाने का खतरा मंडरा रहा है। वर्तमान में भी समीकरण कुछ ऐसे ही उलझते नजर आ रहे हैं जहां अपनों की नाराजगी पार्टी के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो सकती है।
अनंत सिंह के बगावती तेवर और डॉ. अनुज सिंह के समर्थन का नया दांव
इस बार विवाद की शुरुआत तब हुई जब मोकामा विधायक अनंत सिंह ने बाढ़ इलाके में एक जनसंपर्क के दौरान आगामी एमएलसी चुनाव में पार्टी के घोषित या संभावित अधिकृत दांव के उलट निर्दलीय या वैकल्पिक चेहरे के रूप में डॉ. अनुज सिंह को खुला समर्थन देने का ऐलान कर दिया। अनंत सिंह के इस ऐलान के बाद उनके समर्थकों में गजब का उत्साह देखा गया और यह संदेश गया कि ‘छोटे सरकार’ जिस तरफ खड़े हैं, मुकाबला उसी दिशा में मोड़ेगा। हालांकि पार्टी के भीतर अनुशासन और समन्वय बनाए रखने के लिए तुरंत शीर्ष नेतृत्व ने हस्तक्षेप किया और अनंत सिंह को पटना स्थित पार्टी कार्यालय बुलाकर डैमेज कंट्रोल की कोशिश की गई। बैठक के दौरान हालांकि यह दिखाने की कोशिश की गई कि सब कुछ सामान्य है और आपसी मतभेदों को बातचीत से सुलझा लिया गया है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टेबल टॉक से भले ही ऊपरी तौर पर मामला शांत हुआ हो, पर अंदरूनी मनभेद और कड़वाहट अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
पार्टी के भीतर डैमेज कंट्रोल और शीर्ष नेतृत्व की सक्रियता
बगावत के इस खतरे को भांपते हुए जेडीयू ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं तथा मंत्रियों ने मोर्चा संभाल लिया है। पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की इस प्रतिष्ठा वाली सीट पर पार्टी की जीत सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश कार्यालय में एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की गई, जिसमें क्षेत्र से जुड़े सभी विधायकों, विधान पार्षदों और प्रमुख रणनीतिकारों ने हिस्सा लिया। पार्टी के तमाम दिग्गज यह सुनिश्चित करने में लगे हैं कि किसी भी तरह के व्यक्तिगत असंतोष को चुनावी नतीजों पर हावी न होने दिया जाए। नेताओं का यह भी मानना है कि यदि अनंत सिंह जैसे कद्दावर क्षेत्रीय क्षत्रप को पूरी तरह संतुष्ट नहीं किया गया, तो स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के सुशिक्षित मतदाताओं के बीच भी गलत संदेश जा सकता है, जिसका सीधा असर मतदान के दिन देखने को मिल सकता है।
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का जटिल समीकरण और चुनावी भविष्य
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र आम चुनावों से बिल्कुल अलग होते हैं, जहां राजनीतिक रैलियों और हवाबाजी के बजाय व्यक्तिगत संपर्क, जमीनी नेटवर्क और प्रबंधकीय कौशल की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। इस सीट पर एक-एक वोट की कीमत होती है क्योंकि मतदाता सामान्य जनता न होकर डिग्री धारी युवा और पेशेवर लोग होते हैं। ऐसे में यदि पार्टी के भीतर का यह घमासान और अंतर्कलह समय रहते शांत नहीं हुआ, तो यह सत्ता पक्ष के लिए एक बहुत बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है। फिलहाल पार्टी के शीर्ष स्तर से लेकर मैदानी कार्यकर्ताओं तक सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में यह सियासी रंजिश पूरी तरह थमती है या फिर बगावत के सुर चुनाव के वक्त पार्टी की गणित को पूरी तरह बिगाड़ कर रख देते हैं।
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