
आज के इस आधुनिक और तेज़ी से बदलते हुए दौर में जहां एक तरफ महिलाएं कॉर्पोरेट जगत की ऊंचाइयों को छू रही हैं और हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ आज भी हमारे समाज के एक बड़े हिस्से में रूढ़िवादी सोच और पुरानी मानसिकता की जड़ें कितनी गहरी हैं, इस बात का अंदाजा हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक तीखी और विचारणीय बहस से लगाया जा सकता है। जब एक पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर महिला ने अपनी मर्जी से अपनी कॉर्पोरेट नौकरी को छोड़कर अपने घर और परिवार को संभालने का एक व्यक्तिगत निर्णय लिया, तो उसे समाज की तरफ से ऐसे अजीबोगरीब और दबे-छिपे तानों का सामना करना पड़ा जिसने पूरे इंटरनेट पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस पूरी घटना के दौरान जब उस महिला से पारंपरिक मानसिकता के तहत यह सवाल दागा गया कि ‘तुम्हारा लड़का यानी पति कितना कमाता है?’ तो इस एक छोटे से सवाल ने समाज की उस दोहरी सोच की पूरी पोल खोलकर रख दी जिसमें आज भी महिला की अपनी योग्यता और उसके निजी फैसलों से ज्यादा उसके पुरुष साथी की कमाई को उसकी सामाजिक औकात और सफलता का पैमाना माना जाता है। आज के इस विस्तृत और गहराई से विश्लेषण वाले आर्टिकल में हम इसी वायरल हो चुके सामाजिक मुद्दे के हर एक पहलू पर विस्तार से चर्चा करेंगे और जानेंगे कि क्यों आज भी हमारी मानसिकता पितृसत्तात्मक ढांचे से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाई है।
जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर हर इंसान को अपने करियर और अपने पारिवारिक जीवन के बीच एक संतुलन बिठाने के लिए कुछ कड़े और निजी फैसले लेने पड़ते हैं, और ठीक ऐसा ही फैसला उस महिला ने भी लिया जिसने अपनी एक अच्छी-खासी नौकरी को अलविदा कहकर फुल-टाइम होममेकर बनने की राह चुनी। उसने सोचा था कि यह उसका अपना निजी निर्णय है जिससे उसके परिवार को मानसिक शांति और बेहतर देखभाल मिल सकेगी, लेकिन उसे इस बात का अंदाजा बिल्कुल भी नहीं था कि समाज उसके इस फैसले को एक व्यक्तिगत स्वतंत्रता के रूप में देखने के बजाय उस पर सवालिया निशान लगाने का एक मौका मान बैठेगा। जैसे ही आस-पड़ोस और रिश्तेदारों को यह पता चला कि उसने अपनी नौकरी छोड़ दी है, वैसे ही लोगों के मन में सहानुभूति कम और उसकी इस तथाकथित ‘बर्बादी’ को लेकर जिज्ञासा और ताने ज्यादा उमड़ने लगे। लोगों को यह हजम ही नहीं हो रहा था कि कोई पढ़ी-लिखी महिला स्वेच्छा से कॉर्पोरेट रेस से बाहर कैसे हो सकती है, और यहीं से शुरू हुआ उन दबे हुए सवालों और ताने मारने के दौर का एक ऐसा सिलसिला जिसने उसकी मानसिक शांति को झकझोर कर रख दिया।
इस पूरी सामाजिक उठापटक के दौरान हद तब पार हो गई जब एक पारिवारिक समारोह के दौरान लोगों ने उस महिला से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से यह पूछना शुरू कर दिया कि जब तुमने नौकरी छोड़ ही दी है, तो अब यह बताओ कि तुम्हारा पति यानी लड़का महीने का कितना कमा लेता है कि तुम घर बैठकर आराम कर रही हो। इस एक छोटे और बेहद जहरीले सवाल ने उस महिला के उस पूरे स्वाभिमान और उसके व्यक्तिगत निर्णय को मिट्टी में मिला दिया, जिसे उसने अपनी मेहनत और सूझबूझ से कमाया था, क्योंकि समाज के इन ठेकेदारों के लिए एक महिला का वजूद तभी तक मायने रखता है जब तक वह या तो खुद चार पैसे कमा रही हो या फिर उसके पति की सैलरी का ग्राफ बहुत ऊंचा हो। यह सवाल इस बात का सबसे बड़ा और कड़वा प्रमाण था कि आज भी हमारे समाज में किसी स्त्री को एक स्वतंत्र और संपूर्ण इकाई के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता है, बल्कि उसे हमेशा किसी न किसी पुरुष की कमाई या उसकी पहचान के साथ जोड़कर ही आंका जाता है। महिला ने जब इस वाकये को सोशल मीडिया पर साझा किया, तो देखते ही देखते यह पोस्ट एक बड़ा वायरल डिबेट बन गया और हज़ारों लोगों ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए इस पितृसत्तात्मक सोच की जमकर आलोचना की।
आज की इस फास्ट-पेस लाइफस्टाइल में होममेकर होना या घर संभालना कोई गुनाह नहीं है, बल्कि कई बार यह परिवार की मानसिक और शारीरिक सेहत के लिए एक बेहद जरूरी और समझदारी भरा कदम होता है, जिसे लोग अपनी संकीर्ण सोच के चलते समझ नहीं पाते हैं। जब कोई पुरुष अपनी नौकरी छोड़ता है या अपना प्रोफेशन बदलता है, तो समाज उसे उसकी अपनी चॉइस मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेता है, लेकिन जब कोई महिला ऐसा करती है, तो उसके पीछे उसके पति की आर्थिक स्थिति या उसकी लाचारी को जोड़ने की गंदी मानसिकता आज भी जिंदा है। लोगों को यह समझना होगा कि घर संभालना, बच्चों की परवरिश करना और परिवार को जोड़कर रखना किसी भी फुल-टाइम कॉर्पोरेट नौकरी से कम कठिन नहीं है, और इसमें लगने वाला मानसिक श्रम किसी के वेतन के तराजू में नहीं तोला जा सकता है। इस तरह के असंवेदनशील सवाल महिलाओं के आत्मविश्वास को तोड़ने का काम करते हैं और समाज में यह संदेश देते हैं कि एक औरत की अपनी कोई व्यक्तिगत पहचान या मर्जी की कोई कीमत नहीं है।
यह वायरल घटना केवल एक अकेली महिला की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे समाज के उस दोहरे चरित्र का आईना है जो मुंह पर तो महिला सशक्तिकरण और आधुनिकता की बड़ी-बड़ी बातें करता है, लेकिन अंदर से आज भी उतनी ही पुरानी और सड़ी-गली सोच को पाले हुए है। अब समय आ गया है कि हम दूसरों के निजी फैसलों में तांक-झांक करने और उनके जीवन को अपनी संकीर्ण कसौटियों पर तौलने की इस गंदी आदत को हमेशा के लिए दफना दें। किसी महिला से यह पूछना कि उसका पति कितना कमाता है, उसकी गरिमा को ठेس पहुंचना है और यह दिखाता है कि हम इंसानों को उनकी इंसानियत या काबिलियत से नहीं बल्कि उनके बैंक बैलेंस से आंकते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस तरह की खुली बहसों के माध्यम से लोगों की आंखें खुलेंगी और समाज में एक ऐसी सकारात्मक सोच का विकास होगा जहाँ हर व्यक्ति — चाहे वह महिला हो या पुरुष — को बिना किसी सामाजिक दबाव के अपने जीवन के फैसले खुद लेने की आज़ादी मिल सकेगी।
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