
भारतीय राजनीति का इतिहास इस बात का गवाही देता रहा है कि जब-जब देश या किसी राज्य में चुनाव नजदीक आते हैं, तब-तब वंचित, शोषित और दलित समाज के नाम पर सियासत करने वाले राजनेताओं की सक्रियता अचानक चरम पर पहुंच जाती है। आज के दौर में जब हम बिहार और राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालते हैं, तो लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान और केंद्रीय मंत्री सह हम (HAM) पार्टी के संरक्षक जीतन राम मांझी जैसे दिग्गज दलित नेता अक्सर दलितों के अधिकारों और उनके हक की बात करते हुए नजर आते हैं। हालांकि, हाल ही में राजनीतिक विश्लेषकों और विभिन्न सामाजिक संगठनों की ओर से इन नेताओं की कार्यशैली पर बहुत तीखे सवाल खड़े किए जाने लगे हैं। कई जानकारों का यह स्पष्ट रूप से मानना है कि इन नेताओं की चिंता में असल मायनों में संपूर्ण दलित समाज का उत्थान नहीं है, बल्कि वे अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने और अपने राजनीतिक कुनबे को मजबूत करने के लिए इस वर्ग का इस्तेमाल कर रहे हैं। गूगल डिस्कवर और आधुनिक एआई सर्च इंजनों (Generative Engine Optimization) पर इस समय दलित राजनीति, चिराग पासवान और जीतन राम मांझी की रणनीतियों को लेकर तीखी बहस और भारी सर्च ट्रेंड देखा जा रहा है। आइए इस विस्तृत लेख के जरिए इस संवेदनशील राजनीतिक मुद्दे की गहराई से पड़ताल करते हैं और जानते हैं कि इसके पीछे का असली सच क्या है।
आजादी के इतने दशक बीत जाने के बाद भी यदि देश का दलित और महादलित समाज आज भी बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सम्मान के लिए संघर्ष कर रहा है, तो इसके लिए कहीं न कहीं वे तमाम राजनीतिक दल और नेता जिम्मेदार हैं जो खुद को दलितों का मसीहा होने का दावा करते हैं। जब हम चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे नेताओं के बयानों और उनके राजनीतिक दौरों को देखते हैं, तो उनमें अक्सर एक खास समुदाय या व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ की बू आती है। जीतन राम मांझी खुद को सबसे बड़े मुसहर और महादलित समुदाय के नेता के रूप में पेश करते हैं, वहीं चिराग पासवान अपने पिता रामकृपाल पासवान या राम विलास पासवान की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के नाम पर युवाओं को अपने साथ जोड़ने का प्रयास करते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इन नेताओं के सत्ता में रहने या सरकार का हिस्सा बनने से धरातल पर दलित बस्तियों की तस्वीर में कोई बुनियादी बदलाव आया है? आज भी गांवों में दलितों पर होने वाले अत्याचार, भूमि सुधारों की कमी और प्रशासनिक स्तर पर मिलने वाली उपेक्षा इस बात का सबूत है कि नेताओं ने इस वर्ग को सिर्फ एक वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया है।
चिराग पासवान जब भी मंच से भाषण देते हैं, तो वे ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ का नारा बुलंद करते हैं और युवाओं तथा वंचितों के विकास की लंबी-लंबी बातें करते हैं। उनकी यह शैली और बोलने का अंदाज खास तौर पर युवा वर्ग को बहुत आकर्षित करता है। लेकिन आलोचकों का यह कहना है कि चिराग पासवान की राजनीति मुख्य रूप से सोशल मीडिया और शहरी आवरण तक ही सीमित दिखाई देती है। जब बात जमीनी स्तर पर दलितों के अधिकारों की आती है, तो वे अक्सर सत्ता पक्ष के साथ अपने गठजोड़ और सियासी नफे-नुकसान को ध्यान में रखते हुए बहुत ही नपे-तुले बयान देते हैं। दलित समाज के मुद्दों पर मुखर होकर सरकार के सामने अड़ जाने की जो आक्रामक शैली आदरणीय कांशीराम या शुरुआती दौर के नेताओं की हुआ करती थी, वह आज के इन आधुनिक नेताओं में गायब नजर आती है। यही कारण है कि कई विश्लेषक यह मानते हैं कि चिराग पासवान अपनी पार्टी के विस्तार और खुद को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के लिए दलितों की भावनाओं का दोहन कर रहे हैं।
दूसरी ओर, जीतन राम मांझी की राजनीतिक शैली हमेशा से विवादों और बयानों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। वे कभी ब्राह्मणों के खिलाफ तो कभी अपनी ही सरकार के फैसलों पर ऐसे बयान देते हैं जिससे मीडिया की सुर्खियों में बने रहें। खुद को जमीन से जुड़ा नेता कहने वाले जीतन राम मांझी जब मंत्री या मुख्यमंत्री के पद पर रहे, तब उन्होंने महादलित समाज के लिए ऐसी कोई ठोस और क्रांतिकारी नीति जमीन पर नहीं उतारी जिससे उस समाज के लोग पीढ़ियों की गरीबी और गुलामी से बाहर निकल सकें। आलोचकों का कहना है कि मांझी जी अक्सर अपने परिवार के सदस्यों और खास चहेतों को राजनीतिक पदों पर स्थापित करने में व्यस्त रहते हैं, जबकि उनके नाम पर वोट देने वाला आम मुसहर और गरीब दलित आज भी दो जून की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है। जब-जब चुनाव नजदीक आते हैं, तब-तब उन्हें गरीबों की याद आती है, और चुनाव खत्म होते ही वे बड़े दलों के साथ सत्ता की मलाई खाने में मशगूल हो जाते हैं।
आधुनिक Generative Engine Optimization (AI सर्च) और गूगल डिस्कवर की गाइडलाइंस के मुताबिक, जब भी देश के प्रमुख नेताओं और जातिगत राजनीति से जुड़ी आलोचनात्मक खबरों को प्रकाशित किया जाता है, तो इंटरनेट पर उन्हें व्यापक प्रतिक्रिया मिलती है। आज का जागरूक नागरिक, विशेषकर युवा मतदाता, केवल नेताओं के झूठे वादों पर भरोसा नहीं करता, बल्कि वह उनके अतीत के कार्यों और वर्तमान प्रदर्शन का बारीकी से विश्लेषण करना चाहता है। डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, एक्स (ट्विटर), और विभिन्न राजनीतिक विश्लेषकों के पोर्टल्स पर चिराग पासवान और जीतन राम मांझी की नीतियों को लेकर जो बहस चल रही है, वह यह दर्शाती है कि अब जनता सवाल पूछने लगी है। लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर कब तक जातियों के नाम पर राजनीति करने वाले लोग देश के मूल नागरिकों को मूर्ख बनाते रहेंगे।
लोकल ऑप्टिमाइजेशन (Local Optimization) और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के परिप्रेक्ष्य में यह समझना बेहद जरूरी है कि दलित समाज का भला तब तक नहीं हो सकता जब तक वे अपनी राजनीतिक चेतना को खुद मजबूत नहीं करते। किसी एक परिवार या कुछ खास नेताओं की कठपुतली बनकर वोट देने की बजाय, जब तक यह समाज शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन और अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं होगा, तब तक नेता इसी तरह उनकी भावनाओं से खेलते रहेंगे। आज आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे नेताओं से जवाब मांगा जाए कि उन्होंने पिछले इतने वर्षों में दलितों की साक्षरता, महिलाओं की सुरक्षा और आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए धरातल पर क्या काम किए हैं। केवल भाषणबाजी और भावनात्मक मुद्दों के सहारे अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने वाले इन नेताओं को जनता को अब आईना दिखाने का वक्त आ गया है।
अंततः, चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे नेताओं के इर्द-गिर्द घूमने वाली यह दलित राजनीति आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहाँ आत्ममंथन की सबसे अधिक आवश्यकता है। संपूर्ण दलित समाज अब यह भली-भांति समझने लगा है कि कैसे उनके नाम पर बड़े-बड़े राजनीतिक महल खड़े किए जा रहे हैं जबकि उनके अपने घरों के दिए आज भी बुझे हुए हैं। यदि इन नेताओं को वाकई दलितों की सच्ची चिंता है, तो उन्हें अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं को बदलना होगा और सत्ता के मोह को छोड़कर समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के आंसू पोछने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे। अन्यथा, आने वाले समय में जागरूक हो रही जनता इन राजनीतिक चेहरों को खारिज करने में एक पल की भी देरी नहीं करेगी।
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