तसलीमा नसरीन का बड़ा बयान: शेख हसीना की हो वतन वापसी, अवामी लीग से तुरंत हटे बैन

लगभग दो दशक (19 साल) के लंबे अंतराल के बाद कोलकाता की धरती पर कदम रखने वालीं मशहूर और निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने एक बड़ी मांग कर दी है। उन्होंने बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की स्वदेश वापसी और उनकी पार्टी ‘अवामी लीग’ पर लगे प्रतिबंध को हटाने की पुरजोर वकालत की है। तसलीमा का यह बयान ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश में जुलाई 2024 के भारी विरोध प्रदर्शनों के बाद सत्ता पलट गई थी और शेख हसीना को भारत में शरण लेनी पड़ी थी।

शेख हसीना की वापसी और चुनाव लड़ने के अधिकार की मांग

कोलकाता में मीडिया से बातचीत करते हुए तसलीमा नसरीन ने स्पष्ट किया कि शेख हसीना को जिस तरह से सत्ता से बेदखल किया गया, वह तरीका पूरी तरह से गलत था। उन्होंने कहा कि अवामी लीग पर लगाया गया प्रतिबंध असंवैधानिक है और इसे तुरंत हटाया जाना चाहिए। तसलीमा ने मांग की है कि पूर्व प्रधानमंत्री को न केवल अपने देश लौटने की अनुमति मिलनी चाहिए, बल्कि उन्हें अपनी पार्टी का नेतृत्व करने और लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव में हिस्सा लेने का पूरा अधिकार भी दिया जाना चाहिए। गौरतलब है कि हाल ही में शेख हसीना ने भी दिसंबर तक बांग्लादेश लौटने के संकेत दिए थे।

मदरसों और कट्टरपंथ पर तसलीमा का तीखा प्रहार

अपने बेबाक अंदाज़ के लिए जानी जाने वालीं तसलीमा नसरीन ने कट्टरपंथी इस्लामियों पर भी जमकर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि मदरसों का इस्तेमाल अराजकता फैलाने के लिए किया जा रहा है। लेखिका ने सख्त लहजे में कहा कि समाज में मदरसों की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि ये सिर्फ जिहादी पैदा करते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि सभी मदरसों को धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) स्कूलों में तब्दील कर दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही, उन्होंने 19 साल बाद कोलकाता वापस बुलाने के लिए पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का विशेष रूप से आभार भी व्यक्त किया।

19 साल बाद कोलकाता वापसी: छलका निर्वासित लेखिका का दर्द

एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान तसलीमा काफी भावुक नजर आईं। 63 वर्षीय लेखिका ने कोलकाता वापसी को अपने लंबे व्यक्तिगत निर्वासन का अंत बताया। उन्होंने कहा कि कोलकाता लौटना ऐसा है जैसे वह अपनी जिंदगी के उस हिस्से में वापस आ गई हैं, जिसे वह यहीं छोड़ गई थीं। साल 2007 में तत्कालीन वाममोर्चा सरकार के दौरान उनकी आत्मकथा ‘द्विखंडितो’ के कुछ हिस्सों पर हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद उन्हें यह शहर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। तसलीमा ने कहा कि ‘मैं कोलकाता लौट आई हूं’, यह वाक्य कहने में उन्हें 19 साल लग गए और उन्होंने हर दिन अपना पता खोने का दर्द झेला है।

बांग्लादेश के मौजूदा हालात और अल्पसंख्यकों पर चिंता

तसलीमा ने बांग्लादेश के मौजूदा हालातों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वहां धार्मिक कट्टरवाद बेहद खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है और अभिव्यक्ति की आजादी पर लगातार हमले हो रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि वह किसी राजनीतिक एजेंडे के तहत नहीं, बल्कि महिलाओं के अधिकारों और धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए अपनी आवाज उठा रही हैं। साल 1994 में कट्टरपंथियों की धमकियों के कारण बांग्लादेश से निकाली गईं तसलीमा ने कहा कि यूरोप ने उन्हें नागरिकता तो दी, लेकिन दुख इस बात का है कि उन्हें किसी भी बंगाल (पश्चिम बंगाल या बांग्लादेश) में रहने के लिए एक छोटी सी जगह तक नसीब नहीं हुई। उन्होंने उम्मीद जताई कि एक दिन ऐसा आएगा जब किसी भी लेखक को अपने विचार व्यक्त करने के लिए देश से नहीं निकाला जाएगा।