
महाभारत के पन्नों में अनगिनत ऐसी गाथाएं दर्ज हैं, जिनके प्रसंग आज भी हर किसी की आंखें नम कर देते हैं। कुरुक्षेत्र के मैदान में लड़ा गया वह महासंग्राम ऐसा समय था, जिसने अपनों को ही एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया था। इस युद्ध का सबसे ज्यादा भावुक और हृदयविदारक दृश्य तेरहवें दिन देखने को मिला था, जब महज सोलह साल के चक्रव्यूह भेदने वाले वीर बालक अभिमन्यु की निर्मम हत्या कर दी गई थी। एक निहत्था और कम उम्र का बच्चा जो सिर्फ चक्रव्यूह के भीतर प्रवेश करना जनता था, लेकिन उसे सुरक्षित बाहर निकलने की पूरी जानकारी नहीं थी, उसे कई महारथियों ने मिलकर घेर लिया था। अभिमन्यु की इस छलपूर्ण मृत्यु ने न केवल उसके पिता अर्जुन बल्कि पांडव सेना को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था, और आज भी लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने उस छोटे से बालक को बचाया क्यों नहीं था।
जब गांडीवधारी अर्जुन बैठ गए थे घुटनों के बल
कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में अंधेरा होने से ठीक पहले जब अर्जुन को अपने प्रिय पुत्र अभिमन्यु की वीरगति का दुखद समाचार मिला, तो दुनिया का सबसे महान और अजय धनुर्धर पूरी तरह टूट चुका था। दुश्मनों के दिलों में खौफ पैदा करने वाला उनका ‘गांडीव’ धनुष जमीन पर बेजान पड़ा था और अर्जुन बेसुध होकर घुटनों के बल बैठ गए थे। उनकी आंखों से आंसुओं की अनवरत धारा बह रही थी और उनके कांपते हुए होंठों से बस एक ही नाम निकल रहा था—अभिमन्यु। ऐसी विकट और शोकपूर्ण स्थिति में भगवान श्रीकृष्ण उनके शिविर में पहुंचे। श्री कृष्ण की आहट पाकर जब अर्जुन ने अपनी नम आंखें ऊपर उठाईं, तो उनमें आंसुओं के साथ-साथ अपनों द्वारा दिए गए धोखे की एक तीव्र आग भी सुलग रही थी। अर्जुन की इस व्यथा को शांत करते हुए वासुदेव ने उन्हें समझाया कि आज जो कुछ भी हुआ है, वह कौरवों की कोई बड़ी जीत या तुम्हारी हार नहीं है, बल्कि यह महाकाल के उस अटल चक्र का एक अनिवार्य नियम था, जिसे रोकना स्वयं सृष्टि के संतुलन को बिगाड़ने के समान था।
महर्षि वेद व्यास रचित द्रोण पर्व में मिलता है यह अमर प्रसंग
अभिमन्यु की शहादत के बाद अर्जुन के असीम विलाप और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उनके मार्गदर्शन का यह अत्यंत भावुक और दार्शनिक प्रसंग महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाकाव्य महाभारत के ‘द्रोण पर्व’ के अंतर्गत आने वाले ‘अभिमन्यु-वध पर्व’ में विस्तार से मिलता है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए कहा कि संसार में जो भी जीव जन्म लेता है, उसकी मृत्यु इस सृष्टि का सबसे बड़ा और अटल सत्य है, और जो मृत्यु को प्राप्त होता है, उसका पुनर्जन्म भी निश्चित रूप से होता है। कृष्ण ने उन्हें याद दिलाया कि जयद्रथ द्वारा पूर्व में किए गए अपमान और घटनाओं का चक्र पहले से तय था। उन्होंने अर्जुन को उपदेश दिया कि एक सच्चे क्षत्रिय का धर्म मोह और शोक के सागर में डूबना नहीं, बल्कि तमाम दुखों और प्रलोभनों को पीछे छोड़कर धर्म के मार्ग पर अडिग रहकर अपने कर्तव्य का पालन करना है। भगवान कृष्ण के इन पावन और ज्ञानवर्धक वचनों को सुनकर अर्जुन ने अपने भीतर की शोक रूपी दुर्बलता का त्याग किया और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए अपने गांडीव को फिर से थामकर युद्ध भूमि की ओर प्रस्थान किया।
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