
बॉलीवुड की चकाचौंध के पीछे संघर्ष और आंसुओं की अनगिनत कहानियां छिपी होती हैं। मायानगरी मुंबई हर रोज हजारों युवाओं को अपनी ओर खींचती है, लेकिन सफलता उन्हीं के कदम चूमती है जिनके इरादे फौलादी होते हैं। ऐसी ही एक असाधारण और रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी है फिल्म ‘आवारापन 2’ में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाने वाले उस मंझे हुए अभिनेता की, जो कभी अपने गृह नगर से जेब में सिर्फ 5,000 रुपये का एक अदद नोट रखकर मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर उतरा था। न सिर पर छत का ठिकाना था, न ही इंडस्ट्री में कोई गॉडफादर। आंखों में बस एक ही जुनून था—कैमरे के सामने अपनी कला को जीवंत करना।
पेट पालने के लिए बेचीं बीमा पॉलिसियां और किए छोटे-मोटे काम
मुंबई के महंगे खर्चों और ऑडिशन के अनवरत चक्रव्यूह में जब घर से लाए पांच हजार रुपये चंद दिनों में खत्म हो गए, तो पेट भरने का संकट सामने आ खड़ा हुआ। अभिनेता ने कभी हार नहीं मानी और अपने स्वाभिमान को झुकने नहीं दिया। थियेटर के रिहर्सल के बीच उन्होंने घर-घर और दफ्तरों के चक्कर काटकर जीवन बीमा (Life Insurance Policies) बेचने का काम शुरू किया।
हर रिजेक्शन और हर बंद दरवाजे ने उनके भीतर के कलाकार को और अधिक तराशा। कई बार ऐसी नौबत भी आई जब दो वक्त की रोटी के लिए सिर्फ वड़ा पाव खाकर पूरी रात रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म या दोस्तों के साथ एक संकरे चॉल के कमरे में गुजारनी पड़ी। बीमा एजेंट बनकर मिलने वाले मामूली कमीशन से वह अपने पोर्टफोलियो की फोटोकॉपी कराते और अंधेरी व बांद्रा के कास्टिंग डायरेक्टर्स के दफ्तरों में घंटों कतार में खड़े रहते थे।
रिजेक्शन का लंबा दौर और छोटे रोल से पहचान की तलाश
वर्षों तक सैकड़ों ऑडिशन देने के बाद भी उन्हें केवल ‘भीड़ का हिस्सा’ या एक-दो डायलॉग वाले छोटे रोल ही मिलते रहे। कास्टिंग डायरेक्टर्स अक्सर उन्हें ‘लीड मटेरियल नहीं’ कहकर रिजेक्ट कर देते थे। कई समकालीन कलाकारों ने हिम्मत हारकर मायानगरी छोड़ दी, लेकिन इस अभिनेता ने थियेटर को अपनी ढाल बनाए रखा।
उन्होंने नुक्कड़ नाटकों और क्षेत्रीय सिनेमा में बैकग्राउंड आर्टिस्ट के रूप में काम करते हुए अपनी डायलॉग डिलीवरी, बॉडी लैंग्वेज और फेशियल एक्सप्रेशंस को निखारना जारी रखा। उनका मानना था कि अगर आपकी कला में गहराई है, तो उम्र कभी आपके रास्ते का पत्थर नहीं बन सकती।
50 की उम्र में ओटीटी और फिल्मों ने बदली किस्मत
कहते हैं कि वक्त जब करवट लेता है, तो सालों का अंधेरा एक ही पल में रोशनी में बदल जाता है। 40 की उम्र पार करने के बाद जब अधिकांश लोग उम्मीद छोड़ देते हैं, तब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स (OTT) के उदय ने भारतीय सिनेमा की रूपरेखा बदल दी। वेब सीरीज और कंटेंट-ड्रिवन सिनेमा के दौर में जब रियलिस्टिक एक्टर्स की मांग बढ़ी, तो इस अभिनेता को एक दमदार किरदार निभाने का मौका मिला।
उनके द्वारा निभाए गए एक इंटेंस और ग्रे-शेड कैरेक्टर ने आलोचकों और दर्शकों दोनों को चौंका दिया। उस एक परफॉर्मेंस ने इंडस्ट्री के बड़े-बड़े निर्देशकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। पचास की उम्र की दहलीज पर आकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि स्टारडम चेहरे की चमक से नहीं, बल्कि अभिनय की परिपक्वता से हासिल होता है।
‘आवारापन 2’ में मिला बड़ा ब्रेक और स्टारडम का नया मुकाम
इमरान हाशमी स्टारर कल्ट क्लासिक फ्रैंचाइजी की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘आवारापन 2’ में इस अभिनेता को एक बेहद अहम और लेयर्ड किरदार के लिए चुना गया है। फिल्म के निर्देशक और निर्माताओं का कहना है कि जिस गहराई और गंभीरता की इस किरदार को जरूरत थी, वह केवल एक ऐसा कलाकार ही ला सकता था जिसने जिंदगी की धूप-छांव को इतने करीब से देखा हो।
आज जब वह बड़े पर्दे और ओटीटी पर प्रमुख किरदारों में नजर आते हैं, तो वह उन लाखों युवाओं के लिए एक जिंदा मिसाल बन चुके हैं जो सपनों के टूटने के डर से जल्दी हार मान लेते हैं। 5 हजार रुपये की मामूली पूंजी, बीमा पॉलिसी बेचने की तंगहाली और दशकों के अनथक संघर्ष के बाद 50 की उम्र में स्टार बनने का यह सफर बताता है कि सिनेमा में हुनर और सब्र से बड़ा कोई शॉर्टकट नहीं होता।
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