छोटे कारोबारियों के लिए जीरो MDR क्यों जरूरी? इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स ने बताए बड़े फायदे, देखें आंकड़े

भारत में डिजिटल क्रांति को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) और रुपे (RuPay) डेबिट कार्ड पर लागू ‘जीरो एमडीआर’ (Zero Merchant Discount Rate) नीति ने रीढ़ की हड्डी की तरह काम किया है। एमडीआर वह शुल्क होता है, जो कोई व्यापारी डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के बदले बैंक या पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को देता है। जब केंद्र सरकार ने जनवरी 2020 में छोटे खुदरा विक्रेताओं, चाय-नाश्ते के ठेलों और रेहड़ी-पटरी वालों के लिए यूपीआई और रुपे लेनदेन पर लगने वाले इस शुल्क को पूरी तरह समाप्त (Zero MDR) किया, तो देश के कोने-कोने में डिजिटल क्यूआर कोड का जाल बिछ गया। हालांकि, समय-समय पर बैंकों और फिनटेक कंपनियों द्वारा इसे दोबारा लागू करने की मांग उठती रही है, लेकिन नीति विश्लेषकों और उद्योग विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि छोटे कारोबारियों की आर्थिक मजबूती और वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) को बनाए रखने के लिए जीरो एमडीआर अनिवार्य शर्त है।

जीरो एमडीआर से कैसे बदला छोटे दुकानदारों का कारोबार?

पारंपरिक समय में जब क्रेडिट या डेबिट कार्ड से भुगतान पर 1 से 2 प्रतिशत तक का एमडीआर कटता था, तब कम मार्जिन पर काम करने वाले छोटे दुकानदार डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने से कतराते थे। जीरो एमडीआर ने इस सबसे बड़े डर को खत्म कर दिया।

  • मार्जिन की पूरी सुरक्षा: फल-सब्जी विक्रेता, किराना स्टोर और स्ट्रीट वेंडर्स अमूमन 5 से 8 प्रतिशत के शुद्ध मुनाफे पर काम करते हैं। यदि उन पर 1.5% का शुल्क भी लगाया जाए, तो उनके कुल मुनाफे का 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ ट्रांजैक्शन फीस में चला जाता। जीरो एमडीआर ने उनकी गाढ़ी कमाई को सुरक्षित रखा।

  • नकदी प्रबंधन और छुट्टे पैसों की झंझट से मुक्ति: ₹5, ₹10 और ₹20 के छोटे लेन-देन में छुट्टे पैसों की कमी एक बड़ी बाधा थी। क्यूआर कोड से सीधे बैंक खाते में भुगतान आने से समय और नकदी संभालने की लागत दोनों बची।

  • आसान संस्थागत लोन (Formal Credit Access): डिजिटल फुटप्रिंट बनने से बैंकों के पास इन छोटे व्यापारियों का वास्तविक टर्नओवर रिकॉर्ड दर्ज होने लगा। इससे पीएम स्वनिधि (PM SVANidhi) और मुद्रा योजना के तहत बिना किसी गारंटी के बैंक लोन पाना इनके लिए संभव हुआ।

आंकड़ों की जुबानी: जीरो एमडीआर का अभूतपूर्व प्रभाव

नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़े बताते हैं कि जीरो एमडीआर नीति ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम पेमेंट बाजार बना दिया है:

  • मासिक लेन-देन का स्तर: देश में हर महीने लगभग 15 से 16 अरब (1500+ करोड़) यूपीआई ट्रांजैक्शन हो रहे हैं, जिनकी कुल वैल्यू ₹20 लाख करोड़ से भी अधिक है।

  • मर्चेंट पेमेंट्स में उछाल: कुल यूपीआई वॉल्यूम में से लगभग 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी ‘पर्सन-टू-मर्चेंट’ (P2M) भुगतानों की है, जिसमें अधिकांश हिस्सेदारी छोटे और सूक्ष्म कारोबारियों की है।

  • स्ट्रीट वेंडर्स की डिजिटल पहुंच: पीएम स्वनिधि योजना के तहत जुड़े 80 लाख से अधिक रेहड़ी-पटरी वाले सक्रिय रूप से क्यूआर कोड का उपयोग कर रहे हैं और डिजिटल लेनदेन पर कैशबैक भी प्राप्त कर रहे हैं।

  • वैश्विक हिस्सेदारी: दुनिया भर में होने वाले कुल रियल-टाइम डिजिटल ट्रांजैक्शन में भारत की हिस्सेदारी लगभग 46 प्रतिशत के पार पहुंच चुकी है।

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स की राय: यदि दोबारा लगा चार्ज तो क्या होगा नुकसान?

फिनटेक और रिटेल सेक्टर के जानकारों का मानना है कि छोटे कारोबारियों पर एमडीआर लगाना डिजिटल इंडिया की प्रगति को पीछे धकेल सकता है:

  • कैश की ओर वापसी (Cash Reversal Risk): अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यदि सूक्ष्म व्यापारियों पर किसी भी रूप में ट्रांजैक्शन चार्ज थोपा गया, तो वे डिजिटल क्यूआर बोर्ड हटाकर दोबारा केवल ‘कैश’ में लेनदेन शुरू कर देंगे। इससे अर्थव्यवस्था में अनौपचारिक लेन-देन और ब्लैक मनी का चलन फिर बढ़ेगा।

  • वित्तीय समानता का साधन: थिंक टैंक विशेषज्ञों का तर्क है कि डिजिटल पेमेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर को एक ‘पब्लिक गुड’ (सार्वजनिक सुविधा) माना जाना चाहिए, जैसे सड़कें या राष्ट्रीय राजमार्ग। सरकार द्वारा हर साल बजटीय आवंटन के जरिए बैंकों और फिनटेक कंपनियों को दिए जाने वाले वित्तीय प्रोत्साहन (UPI Incentive Scheme) को जारी रखना चाहिए, न कि इसका बोझ रेहड़ी-पटरी वालों पर डाला जाए।

  • फिनटेक कंपनियों का वैकल्पिक मॉडल: उद्योग विश्लेषकों का सुझाव है कि फिनटेक प्लेटफॉर्म्स को केवल एमडीआर पर निर्भर रहने के बजाय साउंडबॉक्स सब्सक्रिप्शन, मर्चेंट लोन डिस्ट्रीब्यूशन, इंश्योरेंस और वैल्यू-एडेड सॉफ्टवेयर सर्विसेज के जरिए अपना रेवेन्यू मॉडल मजबूत करना चाहिए।

आगे की राह: मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और संतुलित नीतियां

भारत का डिजिटल मॉडल आज पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन चुका है। विकसित देशों में जहां आज भी छोटे-छोटे भुगतानों पर भारी इंटरचेंज और स्वाइप फीस वसूली जाती है, वहीं भारत की जीरो एमडीआर व्यवस्था ने गरीब से गरीब तबके को मुख्यधारा की बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा है। नीति निर्माताओं का फोकस अब ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में डिजिटल पेमेंट की सुरक्षा, साइबर फ्रॉड से बचाव और सर्वर इंफ्रास्ट्रक्चर को और मजबूत करने पर होना चाहिए, ताकि बिना किसी अतिरिक्त वित्तीय बोझ के डिजिटल भारत का यह पहिया अबाध गति से घूमता रहे।