
महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे देश में गणेश चतुर्थी से शुरू हुआ पावन गणेशोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास और भक्तिमय वातावरण के साथ मनाया जा रहा है। शास्त्रों और कुल-परंपराओं के अनुसार कई श्रद्धालु अपने घरों और प्रतिष्ठानों में प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश की प्रतिमा को डेढ़ दिन, पांच दिन, सात दिन अथवा अनंत चतुर्दशी यानी दसवें दिन तक स्थापित रखने का धार्मिक संकल्प लेते हैं। इस वर्ष 18 सितंबर 2026 को 5 दिवसीय गणेश स्थापना का पांचवां दिन संपन्न हो रहा है। ऐसे में जिन भक्तों ने पंचम दिवस पर बप्पा की विदाई का संकल्प लिया था, उनमें से कई कामकाजी लोग सुबह की व्यस्त दिनचर्या और दफ्तर के काम के कारण प्रातःकाल या दोपहर के समय प्रतिमा विसर्जन नहीं कर पाए। वैदिक ज्योतिष गणना के अनुसार चिंता की कोई बात नहीं है, क्योंकि शाम और रात्रि के समय भी विघ्नहर्ता को भावभीनी विदाई देने के लिए अत्यंत कल्याणकारी और मंगलकारी चौघड़िया मुहूर्त उपलब्ध हैं।
वैदिक ज्योतिष और पंचांग गणना के विशेषज्ञ ज्योतिषाचार्य श्री चंद्रेश शर्मा के अनुसार, गणेश विसर्जन के लिए शास्त्रसम्मत चौघड़िया का विशेष महत्व माना गया है। दिनभर के समय चक्र में चर, लाभ, अमृत और शुभ के चौघड़िया में बप्पा की विदाई करना घर-परिवार के लिए अत्यंत सौभाग्यशाली होता है। 18 सितंबर 2026 को पांचवें दिन के लिए दिन के मुहूर्त बीत जाने के बाद भी शाम और रात के समय दो प्रमुख समय खंड उपलब्ध हैं, जिनमें भक्त अपनी सुविधानुसार गणपति बप्पा को विधिपूर्वक विसर्जित कर सकते हैं:
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प्रातःकालीन मुहूर्त (बीत चुका): सुबह 6:11 बजे से 10:45 बजे तक (चर, लाभ और अमृत का चौघड़िया)।
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दोपहर का मुहूर्त (बीत चुका): दोपहर 12:17 बजे से 1:48 बजे तक (शुभ का चौघड़िया)।
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शाम का शुभ मुहूर्त: शाम 4:51 बजे से 6:22 बजे तक (चर का चौघड़िया)।
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रात्रि का विशेष मुहूर्त: रात 9:19 बजे से 10:48 बजे तक (लाभ का चौघड़िया)। यदि आप नौकरी या व्यापार के सिलसिले में दिन में समय नहीं निकाल पाए हैं, तो शाम 4:51 से 6:22 बजे के बीच या फिर रात्रि में 9:19 से 10:48 बजे के मध्य पूरे आदर, ढोल-नगाड़ों और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ बप्पा को विसर्जित कर सकते हैं।
सनातन धर्म में गणेश विसर्जन केवल एक औपचारिक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह जीवन और ब्रह्मांड के शाश्वत सत्य का गहरा दार्शनिक प्रतीक है। धर्मशास्त्रों के अनुसार, विसर्जन प्रक्रिया हमें यह सार्वभौमिक संदेश देती है कि इस नश्वर संसार में कोई भी रूप, पद, वैभव या भौतिक वस्तु स्थायी नहीं है। जिस प्रकार प्राकृतिक मिट्टी से निर्मित भगवान गणेश की मनोहारी प्रतिमा कुछ दिनों की पूजा-अर्चना के बाद पुनः जलतत्व में विलीन हो जाती है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य का यह शरीर भी पंचतत्वों से मिलकर बना है और अंततः उसी प्रकृति में समाहित हो जाना है। यह पर्व सिखाता है कि सांसारिक उपलब्धियों से अत्यधिक आसक्ति और मोह रखने के बजाय कर्तव्य और निष्काम कर्म को प्राथमिकता देनी चाहिए। पांच दिनों तक बप्पा की सेवा कर उनके विसर्जन का संकल्प इसी निष्काम भक्ति और समर्पण भाव को दर्शाता है।
गणपति बप्पा को विदाई देने से पूर्व घर के पूजा स्थल पर विधि-विधान से अंतिम पूजन करना अनिवार्य है। इसके लिए परिवार के सभी सदस्यों को एकत्रित होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। सर्वप्रथम भगवान गणेश को अक्षत, रोली, चंदन और सिंदूर का तिलक लगाएं। इसके पश्चात उन्हें प्रिय दूर्वा की 21 गांठे, लाल गुड़हल या गेंदे के ताजे पुष्प और जनेऊ अर्पित करें। भोग के रूप में मोदक, बेसन के लड्डू, ऋतुफल और नारियल समर्पित करें। तत्पश्चात धूप और दीप प्रज्वलित कर परिवार सहित गणेश जी की आरती उतारें। विसर्जन यात्रा आरंभ करने से पूर्व हाथ में जल और पुष्प लेकर भगवान से हाथ जोड़कर प्रार्थना करें: “हे विघ्नहर्ता, अज्ञानतावश या भूलवश पूजा में हुई किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए हमें क्षमा करें और हमारे परिवार पर सदैव अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें।”
क्षमा प्रार्थना और आरती के उपरांत भगवान गणेश की प्रतिमा को दोनों हाथों से उठाकर अपने मस्तक से स्पर्श कराएं और फिर सम्मानपूर्वक एक लकड़ी के पाटे पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर उस पर विराजमान करें। इसके बाद घर से विसर्जन स्थल, पवित्र नदी, जलाशय या घर पर ही बनाए गए स्वच्छ जलकुंड की ओर प्रस्थान करें। रास्ते भर “गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ” के जयकारों के साथ वातावरण को गुंजायमान रखें। विसर्जन स्थल पर पहुंचकर प्रतिमा को झटके से फेंकने के बजाय अत्यंत आदर और प्रेम भाव से धीरे-धीरे जल में प्रवाहित करें। साथ ही भगवान से यह मंगल कामना करें कि वे घर के सारे संकट, रोग और दरिद्रता अपने साथ ले जाएं और सुख, शांति व समृद्धि का आशीर्वाद देकर जाएं।
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