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गणेश चतुर्थी 2026: बप्पा की मूर्ति घर लाने से लेकर स्थापना तक इन 5 बातों का रखें खास ध्यान, वरना पूजा का नहीं मिलेगा पूरा फल

सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म में विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का आगमन हर साल भक्तों के जीवन में नई उमंग, सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा लेकर आता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होने वाले इस दस दिवसीय महापर्व गणेश उत्सव का इंतजार देश और दुनिया में बसे करोड़ों सनातन प्रेमियों को पूरे साल रहता है। इस साल गणेश चतुर्थी 2026 का यह पावन पर्व बेहद खास संयोग लेकर आया है, जिसे लेकर घरों से लेकर बड़े-बड़े पंडालों तक तैयारियां अभी से शुरू हो चुकी हैं। बप्पा के स्वागत के लिए लोग अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं, फूलों और लाइटों से भव्य सजावट करते हैं और पूरे विधि-विधान से गणेश जी को अपने घर विराजमान करते हैं। हालांकि, धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार बप्पा की मूर्ति घर लाने से लेकर उनकी स्थापना और विसर्जन तक कुछ कड़े नियम और विशेष सावधानियां बताई गई हैं, जिनका पालन करना हर भक्त के लिए बेहद अनिवार्य माना जाता है। यदि इन नियमों या छोटी-छोटी बातों में कोई अनजाने में भी चूक हो जाए, तो उसका नकारात्मक प्रभाव पूजा के पूर्ण फल पर पड़ सकता है। इसलिए, बप्पा की कृपा पाने और घर में रिद्धि-सिद्धि का वास बनाए रखने के लिए जरूरी है कि आप गणेश चतुर्थी से जुड़े इन सभी महत्वपूर्ण दिशा-निर्देशों और स्थापना के नियमों को अच्छी तरह जान लें।

गणेशोत्सव के दौरान घर में गणपति स्थापना के लिए मूर्ति का चयन करना सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। बाजार में आपको प्लास्टर ऑफ पेरिस यानी पीओपी, चिकनी मिट्टी, धातु या लकड़ी से बनी तमाम तरह की सुंदर मूर्तियां मिल जाएंगी, लेकिन शास्त्रों के अनुसार पर्यावरण और घर की सुख-शांति के लिए हमेशा प्राकृतिक इको-फ्रेंडली यानी शुद्ध मिट्टी से बनी गणेश जी की प्रतिमा ही घर लानी चाहिए। मूर्ति खरीदते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बप्पा की सूंड हमेशा बाईं तरफ मुड़ी हुई होनी चाहिए क्योंकि बाईं सूंड वाले गणेश जी को वक्रतुंड और मोदक प्रिय माना जाता है, जो घर में सुख और शांति का प्रतीक होते हैं। इसके अलावा, मूर्ति में भगवान गणेश अपने वाहन मूषक के साथ और हाथों में मोदक धारण किए हुए होने चाहिए। मूर्ति को घर लाते समय ध्यान रखें कि वह खंडित या कहीं से टूटी हुई बिल्कुल न हो। प्रतिमा को घर लाते समय सिर पर साफ वस्त्र या चुन्नी रखकर सम्मान के साथ पूरे परिवार के सदस्यों को जयकारे लगाते हुए प्रवेश करना चाहिए, जिससे घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मकता का संचार होता है।

घर में बप्पा की स्थापना के लिए पूजा घर या लिविंग रूम की सही दिशा का चुनाव करना वास्तु शास्त्र के दृष्टिकोण से बेहद आवश्यक माना जाता है। सनातन परंपरा के अनुसार घर के ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा को सबसे पवित्र और देवताओं का स्थान माना गया है, इसलिए हमेशा गणेश जी की स्थापना इसी दिशा में करनी चाहिए। यदि ईशान कोण में जगह न हो, तो आप पूर्व या उत्तर दिशा का चयन भी कर सकते हैं, लेकिन इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बप्पा का मुख कभी भी दक्षिण दिशा की तरफ न हो। स्थापना के दिन सबसे पहले चौकी पर साफ लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाएं और उस पर थोड़े से अक्षत यानी चावल रखकर उस पर गणपति को स्थापित करें। स्थापना हमेशा अभिजीत मुहूर्त या पंडित द्वारा बताए गए शुभ चौघड़िया समय में ही करनी चाहिए, क्योंकि शुभ काल में की गई पूजा और स्थापना का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है। चौकी के पास एक कलश में जल भरकर रखें, उसमें सुपारी, आम के पत्ते और नारियल रखें, जो वरुण देवता की उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है।

गणेश स्थापना के बाद प्राण प्रतिष्ठा और षोडशोपचार विधि से भगवान गणेश की पूजा शुरू की जाती है। सबसे पहले बप्पा को जल से स्नान कराएं, इसके बाद उन्हें शुद्ध वस्त्र या जनेऊ अर्पित करें। भगवान गणेश को सिंदूर, रोली, अक्षत, दूर्वा घास और लाल पुष्प बेहद प्रिय हैं, इसलिए पूजा के दौरान दूर्वा की 21 गांठों का जोड़ा बनाकर उन्हें जरूर अर्पित करें। भोग की बात करें तो विघ्नहर्ता को मोदक और लड्डू का भोग सबसे ज्यादा पसंद है, इसलिए पहले दिन से लेकर अनंत चतुर्दशी तक रोज उन्हें अलग-अलग प्रकार के मोदक और फलों का भोग लगाना चाहिए। पूजा के अंत में गणेश चालीसा का पाठ, अथर्वशीर्ष का पाठ और विधि-विधान से आरती करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। पूजा के दौरान मन में किसी के प्रति द्वेष या नकारात्मक भाव न रखें और पूरी श्रद्धा के साथ केवल भगवान के ध्यान में लीन रहें।

गणेश उत्सव के इन दस दिनों के दौरान घर की पवित्रता और अनुशासन का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। जिस घर में बप्पा विराजमान होते हैं, उस घर में या उसके आसपास तामसिक भोजन यानी प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा या किसी भी प्रकार के नशे का सेवन पूरी तरह से वर्जित माना जाता है। इसके अलावा, घर को कभी भी सूना नहीं छोड़ना चाहिए, यानी 24 घंटे में से कम से कम कोई न कोई सदस्य घर पर मौजूद रहना चाहिए और रात को भी एक छोटा दीपक अखंड रूप से जलता रहना चाहिए। गणेश जी की पूजा में कभी भी तुलसी के पत्तों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि पौराणिक कथा के अनुसार तुलसी जी ने गणेश जी को शाप दिया था, इसलिए तुलसी को वर्जित माना गया है। इसके अलावा, भगवान गणेश की मूर्ति की पीठ के दर्शन कभी नहीं करने चाहिए क्योंकि ऐसी मान्यता है कि पीठ के दर्शन करने से घर में दरिद्रता आती है, इसलिए मूर्ति को दीवार से सटाकर या आगे की तरफ ही स्थापित करें ताकि हमेशा उनके मुख और पेट के ही दर्शन हो सकें।

दस दिनों तक पूरी भव्यता और श्रद्धा के साथ गणेश जी की सेवा करने के बाद अनंत चतुर्दशी के दिन बप्पा को विदाई दी जाती है। विसर्जन के दिन सुबह के समय स्नान करके दोबारा विधि-विधान से गणेश जी की पूजा करें, उन्हें दही, मोदक और फलों का भोग लगाएं तथा क्षमा प्रार्थना करें कि अनजाने में हुई किसी भी भूल के लिए वे क्षमा करें। विसर्जन से पहले बप्पा की आरती उतारकर उनसे अगले बरस जल्दी आने की प्रार्थना की जाती है। यदि आपने इको-फ्रेंडली मिट्टी की मूर्ति स्थापित की है, तो आप उसे अपने घर के गमले में या किसी पवित्र नदी व तालाब में विसर्जित कर सकते हैं, जिससे मूर्ति जल में आसानी से घुल जाती है और पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है। इन सभी नियमों का सही तरीके से पालन करने पर बप्पा अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं और उनके जीवन से सारे संकटों को दूर कर देते हैं।