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खुदरा के बाद अब थोक महंगाई का भयंकर झटका, सितंबर में 11.39% पर पहुंची दर

भारतीय अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर एक के बाद एक महंगाई की दोहरी मार पड़नी शुरू हो गई है। हाल ही में खुदरा महंगाई के मोर्चे पर बुरी खबर सामने आने के बाद अब थोक मूल्य सूचकांक (WPI – Wholesale Price Index) पर आधारित महंगाई के आंकड़ों ने देश भर में चिंता की लहर दौड़ा दी है। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, सितंबर महीने में देश की थोक महंगाई दर में जबरदस्त उछाल दर्ज किया गया है और यह बढ़कर सीधे 11.39% के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। थोक महंगाई के इस बेकाबू आंकड़े ने उद्योग जगत से लेकर आम उपभोक्ताओं तक के होश उड़ा दिए हैं। जानकारों का मानना है कि जब थोक स्तर पर चीजें इतनी तेजी से महंगी होती हैं, तो आने वाले हफ्तों में उसका सीधा असर बाजार में बिकने वाले सामानों, सब्जियों, दालों और पैक्ड फूड्स के खुदरा दामों पर भी पड़ता है, जिससे घर चलाना और कठिन हो जाता है।

सितंबर महीने में थोक महंगाई में हुई इस ऐतिहासिक बढ़ोतरी के पीछे मुख्य रूप से खाद्य पदार्थों (Food Articles), मैन्युफैक्चरिंग गुड्स और ईंधन (Fuel and Power) की कीमतों में आई बेतहाशा तेजी जिम्मेदार है। रसोई में इस्तेमाल होने वाली हर जरूरी चीज जैसे दालें, सब्जियां, फल, दूध, और खाद्य तेलों के थोक दाम लगातार आसमान छू रहे हैं। इसके अलावा, ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में उतार-चढ़ाव और घरेलू स्तर पर डीजल-पेट्रोल तथा बिजली की बढ़ती लागत ने परिवहन (Transportation) को महंगा कर दिया है। जब फैक्ट्रियों से सामान बाजार तक लाने का ढुलाई खर्च बढ़ जाता है, तो थोक विक्रेताओं को चीजों के दाम बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ता है। आलू, प्याज और टमाटर जैसी रोजमर्रा की सब्जियों के थोक मूल्यों में हुई भारी वृद्धि ने आम आदमी की रसोई का पूरा बजट बिगाड़ कर रख दिया है।

महंगाई के इन आंकड़ों का सीधा और सबसे गहरा असर देश के मध्यम वर्ग और गरीब परिवार पर पड़ रहा है। लगातार बढ़ रही थोक महंगाई के कारण कंपनियों ने अपने तैयार उत्पादों (Manufactured Products) की कीमतें भी बढ़ानी शुरू कर दी हैं, जिसका असर एफएमसीजी (FMCG) सेक्टर, ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है। आम आदमी की आय जहां की तहां स्थिर है, वहीं बाजार में हर चीज के दाम रॉकेट की रफ्तार से भाग रहे हैं। बच्चों की स्कूल फीस, घर का किराया, बिजली का बिल और अब खाने-पीने का सामान—सब कुछ इतना महंगा हो गया है कि परिवार की मासिक बचत (Monthly Savings) पूरी तरह से शून्य होने की कगार पर पहुंच गई है। लोग अब अपनी जरूरत के सामानों की खरीदारी में कटौती करने को मजबूर हो रहे हैं, जिससे बाजार में डिमांड पर भी नकारात्मक असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

थोक महंगाई के 11.39% के इस खतरनाक स्तर पर पहुंच जाने के बाद अब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और केंद्र सरकार के नीति निर्माताओं के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। केंद्रीय बैंक लगातार ब्याज दरों (Interest Rates) और रेपो रेट के जरिए बाजार में लिक्विडिटी को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन सप्लाई चेन की समस्याओं और ग्लोबल कारणों से महंगाई काबू में आने का नाम नहीं ले रही है। आर्थिक विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को आपूर्ति पक्ष (Supply Side) को मजबूत करने के लिए तुरंत प्रभावी कदम उठाने होंगे, जमाखोरी और कालाबाजारी पर सख्त रोक लगानी होगी तथा कृषि और परिवहन क्षेत्र में लागत कम करने के उपाय करने होंगे। जब तक थोक महंगाई के मोर्चे पर राहत नहीं मिलती, तब तक आम आदमी को बढ़ती कीमतों के इस दौर से जूझना ही पड़ेगा।