
जब भी कोई परिवार अपना सपनों का घर खरीदने की योजना बनाता है, तो वित्तीय सलाहकारों द्वारा अक्सर यह सुझाव दिया जाता है कि प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री और होम लोन में पत्नी को सह-मालिक (Co-owner) या सह-आवेदक (Co-applicant) जरूर बनाएं। अधिकांश लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या सच में पत्नी का नाम शामिल करने से बैंक कम ब्याज पर लोन देते हैं? इसका सीधा उत्तर है—हाँ, यह पूरी तरह सच है। भारतीय बैंकिंग प्रणाली और राज्य सरकारों के राजस्व नियमों में महिला होम बायर्स को बढ़ावा देने के लिए विशेष वित्तीय रियायतें दी गई हैं।
यदि प्रॉपर्टी में पत्नी सह-मालिक है और वह होम लोन में को-बोरोअर (Co-borrower) के रूप में शामिल होती है, तो न केवल लोन की ब्याज दरें सस्ती हो जाती हैं, बल्कि रजिस्ट्री की लागत और आयकर में भी लाखों रुपये की सीधी बचत होती है।
भारत के अधिकांश प्रमुख बैंक (जैसे SBI, HDFC Bank, ICICI Bank, Bank of Baroda आदि) और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियां (HFCs) महिला आवेदकों को होम लोन की ब्याज दरों पर 0.05% (5 बेसिस पॉइंट्स) की विशेष रियायत देती हैं।
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लंबी अवधि में बड़ी बचत: देखने में 0.05% की छूट मामूली लग सकती है, लेकिन 20 या 25 साल के होम लोन पर यह लाखों रुपये का अंतर पैदा करती है।
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उदाहरण: मान लीजिए आप 20 साल के लिए ₹50 लाख का होम लोन लेते हैं। यदि सामान्य ब्याज दर 8.50% है और पत्नी के नाम पर यह घटकर 8.45% हो जाती है, तो कुल ब्याज भुगतान में लगभग ₹35,000 से ₹50,000 तक की सीधी बचत होती है।
होम लोन के अलावा, प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री के समय राज्य सरकारों द्वारा महिलाओं के नाम पर या पति-पत्नी के संयुक्त नाम (Joint Ownership) पर प्रॉपर्टी दर्ज कराने पर स्टांप ड्यूटी में भारी छूट दी जाती है:
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दिल्ली: पुरुषों के लिए स्टांप ड्यूटी 6% है, जबकि महिलाओं के नाम पर यह केवल 4% है (2% की सीधी बचत)।
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उत्तर प्रदेश और हरियाणा: महिला खरीदारों को स्टांप ड्यूटी में 1% से 2% तक की छूट प्रदान की जाती है।
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महाराष्ट्र और राजस्थान: यहां भी महिला खरीदारों के लिए रजिस्ट्री शुल्क में रियायत लागू है।
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लागत में बचत: यदि ₹80 लाख का फ्लैट खरीदा जा रहा है और 2% स्टांप ड्यूटी की बचत होती है, तो रजिस्ट्री के समय ही ₹1.60 लाख का सीधा फायदा मिल जाता है।
यदि पत्नी कामकाजी (Salaried / Self-employed) हैं और पति के साथ प्रॉपर्टी की संयुक्त मालिक व लोन में सह-आवेदक हैं, तो दोनों आयकर कानून के तहत अलग-अलग टैक्स छूट क्लेम कर सकते हैं:
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मूलधन (Principal Repayment) पर धारा 80C: पति और पत्नी दोनों अलग-अलग ₹1.5 – ₹1.5 लाख (कुल ₹3 लाख तक) की टैक्स कटौती क्लेम कर सकते हैं।
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ब्याज (Interest Payment) पर धारा 24(b): होम लोन के ब्याज भुगतान पर पति ₹2 लाख और पत्नी ₹2 लाख (कुल ₹4 लाख तक) की वार्षिक टैक्स छूट का लाभ उठा सकते हैं।
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कुल टैक्स बचत: दोनों मिलकर हर वित्त वर्ष ₹7 लाख तक की कुल होम लोन अदायगी पर टैक्स बेनिफिट ले सकते हैं।
यदि एक अकेले व्यक्ति की सैलरी के आधार पर बैंक ₹40 लाख का लोन मंजूर कर रहा है और आपको ₹60 लाख की जरूरत है, तो कामकाजी पत्नी को को-एप्लिकेंट बनाने से दोनों की मासिक आय (Combined Income) को एक साथ गिना जाता है। इससे आपकी कुल लोन पात्रता (Loan Eligibility) और लोन अप्रूवल की संभावना काफी बढ़ जाती है।
यदि पत्नी कामकाजी नहीं हैं (यानी गृहणी हैं), तब भी स्टांप ड्यूटी में मिलने वाली छूट और लोन ब्याज दर में मिलने वाला 0.05% का कंसेशन पूरी तरह लागू रहता है। इसके लिए बैंक केवल यह शर्त रखते हैं कि पत्नी प्रॉपर्टी में को-ओनर हो और लोन एग्रीमेंट में प्राथमिक या द्वितीयक सह-आवेदक के रूप में शामिल हो। हालांकि, आय न होने की स्थिति में डबल टैक्स बेनिफिट और लोन एलिजिबिलिटी बढ़ाने का फायदा केवल पति की इनकम पर ही निर्भर करेगा।
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