
देश के विभिन्न हिस्सों से लगातार आ रही अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की खबरों के बीच एक बड़ा कानूनी और संवैधानिक सवाल खड़ा हो गया है। हाल ही में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां इन घुसपैठियों के पास से भारतीय पासपोर्ट बरामद हुए हैं। इस संवेदनशील विषय पर अब भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने एक बड़ा और महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण जारी किया है।
विदेश मंत्रालय ने दो टूक शब्दों में साफ कर दिया है कि पासपोर्ट (Passport) को भारतीय नागरिकता का अंतिम या अचूक प्रमाण नहीं माना जा सकता। मंत्रालय के अनुसार, पासपोर्ट मूल रूप से केवल एक ‘ट्रैवल डॉक्युमेंट’ (यात्रा दस्तावेज) है और महज इसके होने के आधार पर कोई भी व्यक्ति देश की नागरिकता पर अपना अंतिम दावा नहीं ठोक सकता। इससे पहले सरकार आधार और वोटर आईडी कार्ड को लेकर भी यही रुख साफ कर चुकी है। ऐसे में आम जनता के मन में यह उलझन पैदा हो गई है कि अगर ये प्रमुख दस्तावेज ही नागरिकता का पक्का सबूत नहीं हैं, तो फिर वह कौन सा कागज है जो किसी को कानूनी रूप से ‘भारतीय’ साबित करता है? आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
भारत में नागरिकता तय करने के 5 कानूनी तरीके
भारत में किसी भी व्यक्ति की नागरिकता किसी कार्ड या सिंगल दस्तावेज से नहीं, बल्कि ‘भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955’ (Citizenship Act, 1955) के कड़े कानूनी प्रावधानों के तहत तय होती है। इस कानून के मुताबिक, भारत की नागरिकता मुख्य रूप से 5 तरीकों से हासिल की जा सकती है:
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जन्म से (By Birth)
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वंशानुगत (By Descent)
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पंजीकरण (By Registration)
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प्राकृतिक रूप से (By Naturalisation)
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क्षेत्र के शामिल होने पर (By Incorporation of Territory)
इस अधिनियम के नियमों को थोड़ा गहराई से समझना जरूरी है। कानून के मुताबिक, भारत में 1 जुलाई 1987 से पहले जन्म लेने वाला हर व्यक्ति प्राकृतिक रूप से जन्म से ही भारत का नागरिक माना जाता था। लेकिन 1987 के बाद पैदा हुए लोगों के लिए नियम बदला गया और शर्त रखी गई कि जन्म के समय माता-पिता में से कम से कम किसी एक का भारतीय नागरिक होना अनिवार्य है।
इसके बाद, 3 दिसंबर 2004 को नियमों को और सख्त कर दिया गया। अब के नियम के अनुसार, बच्चे के जन्म के समय माता-पिता दोनों का भारतीय होना जरूरी है, या फिर उनमें से एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा ‘अवैध प्रवासी’ (Illegal Migrant) न हो। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी संसद में स्पष्ट किया है कि नागरिकता एक कानूनी स्थिति है जो केस-बाय-केस (परिस्थितियों के आधार पर) तय होती है, इसके लिए कोई एक यूनिवर्सल डॉक्यूमेंट लिस्ट नहीं है।
आधार, वोटर आईडी और पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण क्यों नहीं हैं?
अदालतों और विभिन्न मंत्रालयों ने समय-समय पर स्पष्ट किया है कि ये लोकप्रिय कार्ड आखिर क्यों नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं:
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आधार कार्ड (Aadhaar Card): सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) और बॉम्बे हाईकोर्ट अपने कई फैसलों में यह व्यवस्था दे चुके हैं कि आधार कार्ड केवल एक विशिष्ट पहचान और निवास का प्रमाण (Proof of Identity & Residence) है। यह नागरिकता का दस्तावेज नहीं है, क्योंकि भारत में वैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिक भी इसे बनवा सकते हैं और कई बार घुसपैठिए भी गलत तरीकों से इसे हासिल कर लेते हैं।
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वोटर आईडी (Voter ID): भारत निर्वाचन आयोग (ECI) इसे केवल मतदान करने की पात्रता के लिए जारी करता है। हालांकि यह मतदाता सूची में नाम होने को दर्शाता है, लेकिन कई न्यायिक फैसलों में इसे भी नागरिकता का पक्का और अंतिम प्रमाण नहीं माना गया है।
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पासपोर्ट (Passport): विदेश मंत्रालय और बॉम्बे हाईकोर्ट के अनुसार, यह अंतरराष्ट्रीय यात्राओं के लिए जारी किया जाने वाला एक आधिकारिक दस्तावेज है। खासकर 1987 के बाद जन्मे लोगों के मामलों में, अकेला पासपोर्ट नागरिकता सिद्ध करने के लिए कानूनी रूप से काफी नहीं माना जाता।
तो फिर भारत में नागरिकता साबित करने वाले असली कागज़ात कौन से हैं?
अगर कभी किसी व्यक्ति की नागरिकता पर कानूनी रूप से संदेह पैदा होता है, तो उसे साबित करने के लिए निम्नलिखित दस्तावेजों की श्रृंखला (Chain of Documents) या विशिष्ट प्रमाण पत्रों की आवश्यकता होती है:
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नागरिकता प्रमाण-पत्र (Citizenship Certificate): यह भारत में नागरिकता का सबसे अकाट्य और सर्वोच्च दस्तावेज है। इसे सीधे देश का केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) जारी करता है। यह आमतौर पर उन विदेशी मूल के लोगों को दिया जाता है जो पंजीकरण या प्राकृतिक रूप से भारत की नागरिकता के लिए आवेदन करते हैं और सभी शर्तों को पूरा करते हैं।
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जन्म प्रमाण-पत्र (Birth Certificate): इसे नागरिकता साबित करने का एक बेहद मजबूत आधार माना जाता है, बशर्ते इसमें माता-पिता का सही और प्रामाणिक विवरण दर्ज हो। 1987 के बाद जन्मे लोगों को इसके साथ अपने माता-पिता के भी भारतीय होने के साक्ष्य देने पड़ सकते हैं।
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डोमिसाइल या नेटिविटी सर्टिफिकेट (Domicile Certificate): संबंधित राज्य सरकारों द्वारा जारी किया जाने वाला यह प्रमाण पत्र प्रमाणित करता है कि व्यक्ति उस राज्य का स्थायी निवासी है। संकट के समय इसे भी नागरिकता के सहायक साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, हालांकि कानूनी विवाद की स्थिति में अदालतें इसकी गहन जांच कर सकती हैं।
‘लीगेसी डॉक्यूमेंट्स’ और असम एनआरसी (NRC) का उदाहरण
भारत में नागरिकता की प्रामाणिकता को जांचने के लिए अधिकारी ‘नैचुरलाइजेशन’ और पुराने ‘लीगेसी डॉक्यूमेंट्स’ (निरंतरता दर्शाने वाले कागजात) की मदद लेते हैं। इसके तहत आपके जीवन के पुराने दस्तावेजों की एक पूरी श्रृंखला की जांच की जाती है, जैसे:
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पुराने स्कूल और कॉलेज के सर्टिफिकेट (मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट)
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पुश्तैनी जमीनी रिकॉर्ड या लैंड डीड्स (Land Records)
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दशकों पुराने राशन कार्ड और सरकारी रिकॉर्ड
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माता-पिता या दादा-दादी के नागरिकता से जुड़े दस्तावेज
इस पूरी प्रक्रिया को आप असम में लागू हुए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के उदाहरण से समझ सकते हैं। वहां लोगों से साल 1971 से पहले के लीगेसी डॉक्यूमेंट्स मांगे गए थे, जिससे यह साबित हो सके कि उनके पूर्वज उस समय से पहले से भारत में रह रहे थे। हालांकि, देश के बाकी हिस्सों में राष्ट्रव्यापी एनआरसी (Nationwide NRC) लागू नहीं है, लेकिन भविष्य में किसी भी असमंजस की स्थिति में इसी प्रकार के ऐतिहासिक और कानूनी दस्तावेजों की मांग की जा सकती है।
आम भारतीय नागरिकों को क्या घबराने की जरूरत है?
विदेश मंत्रालय के इस बयान के बाद देश के आम और वास्तविक नागरिकों को बिल्कुल भी घबराने या परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। देश के लगभग 99.99 प्रतिशत लोग प्राकृतिक रूप से और पीढ़ियों से यहीं रह रहे सहज भारतीय हैं।
भले ही उनके पास कोई अलग से ‘नागरिकता कार्ड’ न हो, लेकिन उनके पास जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल सर्टिफिकेट, माता-पिता के कागजात, लैंड रिकॉर्ड और सरकारी दस्तावेजों की एक ऐसी अटूट कड़ी (Chain) मौजूद होती है, जिससे उनकी भारतीयता अपने आप सिद्ध हो जाती है। हालांकि, समझदारी इसी में है कि हर नागरिक को अपने और अपने माता-पिता के पुराने व जरूरी दस्तावेजों को हमेशा सुरक्षित और संभालकर रखना चाहिए, ताकि भविष्य में किसी भी सरकारी या कानूनी काम में कोई बाधा न आए।
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