
युवाओं के बीच पिछले कुछ वर्षों में पारंपरिक सिगरेट की जगह ई-सिगरेट या वेपिंग (Vaping) का चलन काफी तेजी से बढ़ा है। इसे अक्सर तंबाकू वाली सिगरेट का एक ‘सुरक्षित विकल्प’ (Safe Alternative) या स्मोकिंग छोड़ने का आसान जरिया मानकर धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है। खासकर मेट्रो सिटीज और कॉलेज जाने वाले युवाओं के बीच इसे एक आधुनिक ट्रेंड और स्टेटस सिंबल के रूप में देखा जाता है। बाजार में मिलने वाले विभिन्न फ्लेवर और इसकी स्टाइलिश बनावट लोगों को आसानी से अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। लेकिन क्या वाकई ई-सिगरेट सुरक्षित है? क्या इससे जानलेवा बीमारियां जैसे लंग्स कैंसर (Lung Cancer) हो सकता है? इस गंभीर सवाल का जवाब हर उस व्यक्ति के लिए जानना बेहद जरूरी है जो या तो इसका सेवन कर रहा है या इसके संपर्क में है। देश के जाने-माने पल्मोनोलॉजिस्ट और कैंसर विशेषज्ञों ने इस विषय पर बेहद चौंकाने वाले और चिंताजनक खुलासे किए हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना सेहत के लिए भारी पड़ सकता है।
क्या सच में ई-सिगरेट से होता है लंग्स कैंसर?
आम तौर पर लोगों में यह भ्रम फैला हुआ है कि ई-सिगरेट में तंबाकू का धुआं नहीं होता, इसलिए यह कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी का कारण नहीं बन सकती। डॉक्टर इस धारणा को पूरी तरह खारिज करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि ई-सिगरेट में पारंपरिक सिगरेट की तरह तंबाकू की पत्तियां नहीं जलाई जातीं, लेकिन इसमें मौजूद लिक्विड को गर्म करने पर जो एरोसोल (Aerosol) या भाप बनती है, उसमें कई प्रकार के कार्सिनोजेनिक (कैंसर पैदा करने वाले) केमिकल्स होते हैं। जब कोई व्यक्ति वेपिंग करता है, तो ये जहरीले रसायन सीधे उसके फेफड़ों की गहराई तक जाते हैं। लगातार इन केमिकल्स के संपर्क में आने से फेफड़ों की कोशिकाओं (Lung Cells) का डीएनए डैमेज होने लगता है, जो आगे चलकर म्यूटेशन का कारण बनता है और अंततः लंग्स कैंसर का रूप ले सकता है। इसके अलावा, ई-सिगरेट के लिक्विड में फॉर्मेल्डिहाइड (Formaldehyde) और एक्रोलीन (Acrolein) जैसे खतरनाक रसायन पाए जाते हैं, जो फेफड़ों के टिशू को बुरी तरह झुलसा देते हैं और क्रॉनिक रेस्पिरेटरी डिजीज का जोखिम कई गुना बढ़ा देते हैं।
पारंपरिक सिगरेट से कितनी अलग और खतरनाक है ई-सिगरेट?
यह एक बड़ा मिथक है कि ई-सिगरेट, ट्रेडिशनल सिगरेट से कम हानिकारक है। पारंपरिक सिगरेट पीने वाले को निकोटीन के साथ-साथ टार (Tar) और कार्बन मोनोऑक्साइड मिलता है, लेकिन ई-सिगरेट अपने आप में एक अलग तरह का केमिकल कॉकटेल है। ई-सिगरेट में उपयोग होने वाले फ्लेवरिंग एजेंट्स (Flavoring Agents) जब गर्म होते हैं, तो वे बेहद जहरीले टॉक्सिन्स छोड़ते हैं। उदाहरण के लिए, डायसिटाइल (Diacetyl) नामक फ्लेवरिंग केमिकल, जो खाने की चीजों में मक्खन जैसा स्वाद देने के लिए इस्तेमाल होता है, जब वेपिंग के जरिए फेफड़ों में जाता है, तो यह ‘पॉपकॉर्न लंग्स’ (Bronchiolitis Obliterans) नामक एक लाइलाज और गंभीर फेफड़ों की बीमारी का कारण बन जाता है। इस बीमारी में फेफड़ों की एयरवेज़ सिकुड़ जाती हैं और मरीज को सांस लेने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। डॉक्टर्स का साफ कहना है कि किसी भी प्रकार का धुआं या वाष्प जो प्राकृतिक हवा के अलावा फेफड़ों के अंदर जाता है, वह फेफड़ों के नाजुक तंत्र को नुकसान ही पहुंचाता है।
युवाओं में तेजी से बढ़ रहा है वेपिंग का क्रेज और इसके गंभीर दुष्परिणाम
शहरी भारत और महानगरों में स्कूल-कॉलेज के छात्रों के बीच ई-सिगरेट का बढ़ता क्रेज पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गया है। फ्लेवरफुल क्लाउड और आकर्षक डिजाइन की वजह से किशोर बहुत कम उम्र में ही निकोटीन की लत (Nicotine Addiction) के शिकार हो रहे हैं। निकोटीन मस्तिष्क के विकास को बुरी तरह प्रभावित करता है, विशेषकर किशोरों में जो अभी मानसिक रूप से पूरी तरह विकसित नहीं हुए हैं। इसके सेवन से याददाश्त कमजोर होना, एकाग्रता में कमी, और अत्यधिक चिंता या डिप्रेशन जैसी मानसिक समस्याएं भी उत्पन्न होने लगती हैं। कई रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि जो युवा पहले कभी पारंपरिक सिगरेट नहीं पीते थे, वे ई-सिगरेट के जरिए निकोटीन के आदी हो जाते हैं और बाद में वे आम सिगरेट या अन्य खतरनाक नशों की तरफ आसानी से आकर्षित हो जाते हैं, जिसे ‘गेटवे इफ़ेक्ट’ कहा जाता है।
लंग्स कैंसर के अलावा शरीर के अन्य अंगों पर क्या पड़ता है असर?
ई-सिगरेट का नुकसान केवल फेफड़ों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर के कार्डियोवैस्कुलर और नर्वस सिस्टम को तबाह करता है। जब आप वेपिंग करते हैं, तो निकोटीन और अन्य टॉक्सिन्स रक्त वाहिकाओं (Blood Vessels) को सिकोड़ देते हैं, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है और दिल की धड़कन तेज हो जाती है। इससे भविष्य में हार्ट अटैक, स्ट्रोक और ब्लड सर्कुलेशन से जुड़ी गंभीर समस्याएं होने का जोखिम अत्यधिक बढ़ जाता है। इसके अलावा, ई-सिगरेट के कण शरीर की इम्युनिटी को कमजोर करते हैं, जिससे शरीर इन्फ्लूएंजा, निमोनिया और अन्य वायरल संक्रमणों के प्रति बेहद संवेदनशील हो जाता है। ओरल हेल्थ पर भी इसका बुरा असर पड़ता है, जिससे मसूड़ों की बीमारियां और मुंह के छाले जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं।
ई-सिगरेट की लत से कैसे पाएं मुक्ति, क्या कहते हैं डॉक्टर्स?
अगर कोई व्यक्ति ई-सिगरेट या वेपिंग की लत में फंस चुका है, तो इससे बाहर निकलना नामुमकिन नहीं है, हालांकि इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और मेडिकल सपोर्ट की जरूरत पड़ती है। डॉक्टर सलाह देते हैं कि अचानक से लत छोड़ने पर ‘निकोटीन विदड्रॉल सिम्पटम्स’ (Nicotine Withdrawal Symptoms) जैसे सिरदर्द, बेचचिनी और चिड़चिड़ापन महसूस हो सकते हैं, ऐसे में निकोटीन रिप्लेसमेंट थेरेपी (NRT) जैसे पैच या गम्स का सहारा लिया जा सकता है। बिहेवियरल काउंसलिंग और योग-ध्यान की मदद से मानसिक लालसा को नियंत्रित किया जा सकता है। परिवार और दोस्तों का सहयोग भी इस लत से छुटकारा पाने में बहुत अहम भूमिका निभाता है। यदि किसी को लगातार खांसी, सांस फूलने या सीने में दर्द की शिकायत है, तो तुरंत किसी अच्छे पल्मोनोलॉजिस्ट से संपर्क कर सीटी स्कैन और चेस्ट एक्स-रे करवाएं ताकि समय रहते किसी भी बड़े खतरे को टाला जा सके।
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