क्या आपकी सुबह की चाय में जहर घुल रहा है? FSSAI ने तय की कीटनाशकों की नई सेफ लिमिट, नया ड्राफ्ट जारी कर नियमों पर कसा शिकंजा

भारत में सुबह की शुरुआत बिना कड़क चाय की चुस्की के अधूरी मानी जाती है। चाहे दिल्ली की नुक्कड़ वाली टपरी हो, कोलकाता का मिट्टी का कुल्हड़ हो या लखनऊ और कानपुर के चौक, चाय सिर्फ एक पेय नहीं बल्कि करोड़ों भारतीयों का दैनिक भावनात्मक जुड़ाव है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस चाय की प्याली से आपको दिनभर की ताजगी मिलती है, उसमें स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले केमिकल या कीटनाशक भी घुले हो सकते हैं? इसी गंभीर स्वास्थ्य चिंता पर कड़ा संज्ञान लेते हुए भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी FSSAI ने बड़ा कदम उठाया है। नियामक संस्था ने चाय की पत्तियों में पेस्टिसाइड्स की सुरक्षित मात्रा तय करने के लिए एक विस्तृत मसौदा यानी ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। इस नए कदम का सीधा मकसद आम उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा करना और भारतीय चाय की अंतरराष्ट्रीय साख को दोबारा मजबूत बनाना है।

देश की सर्वोच्च खाद्य नियामक संस्था FSSAI ने खाद्य सुरक्षा और मानक (संदूषक, विषाक्त पदार्थ और अवशेष) विनियमों में संशोधन का प्रस्ताव रखते हुए विभिन्न कीटनाशकों की अधिकतम अवशेष सीमा यानी मैक्सिमम रेजिड्यू लिमिट (MRL) को वैज्ञानिक आधार पर तय किया है। अक्सर चाय के पौधों को कीटों, फफूंद और विभिन्न बीमारियों से बचाने के लिए बागानों में कीटनाशकों और फंगीसाइड्स का छिड़काव किया जाता है। असम, पश्चिम बंगाल के तराई व दार्जिलिंग, और दक्षिण भारत के नीलगिरि के विशाल चाय बागानों में नमी के कारण कीटों का प्रकोप आम है। कई बार किसान व उत्पादक कीटों से फसल बचाने के चक्कर में अत्यधिक या असंतुलित मात्रा में पेस्टिसाइड्स का इस्तेमाल कर बैठते हैं। यह रसायन पत्तियों की प्रोसेसिंग के बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं होते और पैकेटबंद चायपत्ती के जरिए सीधे आपकी रसोई और चायदानी तक पहुंच जाते हैं। इसी को रोकने के लिए FSSAI ने स्पष्ट कर दिया है कि किस रसायन की कितनी मात्रा को चाय में स्वीकार्य माना जाएगा और किस स्तर के बाद उत्पाद को सीधे तौर पर असुरक्षित घोषित कर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक रसायनों और भारी कीटनाशक अवशेषों वाली चाय का सेवन शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर धीमा जहर बनकर असर करता है। इनमें मौजूद कुछ यौगिक लिवर और किडनी पर दबाव बढ़ाते हैं, पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचाते हैं और हार्मोनल असंतुलन का कारण भी बन सकते हैं। वैज्ञानिक शोधों में यह बात सामने आई है कि पेस्टिसाइड्स के अनियंत्रित अवशेष शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर सकते हैं। FSSAI का यह नया नियामक ढांचा सीधे तौर पर उपभोक्ता सुरक्षा को केंद्र में रखता है, ताकि जब कोई नागरिक सुबह चाय की चुस्की ले, तो उसे यह भरोसा रहे कि कप में घुली चाय कड़े सुरक्षा परीक्षणों और शुद्धता के सख्त मानकों से गुजरकर आई है।

भारत दुनिया के सबसे बड़े चाय उत्पादक और उपभोक्ता देशों में शुमार है। घरेलू खपत के साथ-साथ भारत से यूरोप, अमेरिका, रूस और खाड़ी देशों को बड़े पैमाने पर प्रीमियम चाय निर्यात की जाती है। पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चाय की खेपों में अत्यधिक केमिकल मिलने के कारण कई बार भारतीय निर्यात को कड़े सवालों और अस्वीकृति का सामना करना पड़ा था। FSSAI के नए ड्राफ्ट नियमों से घरेलू बाजार और वैश्विक निर्यात दोनों में संतुलन बनेगा। इंडियन टी एसोसिएशन और छोटे चाय उत्पादक संघों के लिए अब यह अनिवार्य होगा कि वे बागान स्तर पर कीटनाशकों के छिड़काव के समय, उनकी मात्रा और तुड़ाई के बीच के सुरक्षित अंतराल का कड़ाई से पालन करें। इस कड़े कदम से असम के डिब्रूगढ़, जोरहाट, बंगाल के सिलीगुड़ी व जलपाईगुड़ी और दक्षिण भारत के मुन्नार क्षेत्र के उत्पादकों को आधुनिक, जैविक व सुरक्षित कृषि पद्धतियों की ओर तेजी से बढ़ना होगा।

FSSAI ने इस ड्राफ्ट को तुरंत लागू करने से पहले सार्वजनिक डोमेन में रखा है, जिससे सभी हितधारकों को अपनी बात रखने का पूरा मौका मिले। ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी होने की तारीख से 60 दिनों की अवधि के भीतर किसान, चाय बागान मालिक, वैज्ञानिक, खाद्य विशेषज्ञ और आम उपभोक्ता अपनी राय, सुझाव या आपत्तियां आधिकारिक पोर्टल के जरिए दर्ज करा सकते हैं। प्राप्त प्रतिक्रियाओं और तकनीकी समीक्षा के बाद ही इस मसौदे को अंतिम रूप देकर पूरे देश में कानूनन लागू किया जाएगा। नियमों के प्रभावी होते ही खाद्य सुरक्षा अधिकारी बाजार से रैंडम सैंपल लेकर लैब्स में जांच करेंगे और मानक टूटने पर कड़े जुर्माने व लाइसेंस रद्द करने जैसी सजा का प्रावधान होगा।

नियामक के कड़े नियमों के बीच जागरूक नागरिक के तौर पर उपभोक्ताओं को भी कुछ बुनियादी सावधानियां बरतनी चाहिए। हमेशा FSSAI लाइसेंस नंबर और पैकेजिंग पर गुणवत्ता चिह्न देखकर ही चाय खरीदें। अनब्रांडेड या बिना लेबल वाली खुली चायपत्ती से बचें, क्योंकि उसमें मिलावट और अप्राकृतिक रंगों का जोखिम अधिक रहता है। चाय बनाते समय पहली उबाल के नियमों का ध्यान रखें और संभव हो तो प्रमाणित जैविक यानी ऑर्गेनिक चाय विकल्पों को भी अपनी दैनिक दिनचर्या में शामिल करें। FSSAI की यह नई पहल भारतीय चाय संस्कृति को सुरक्षित, पारदर्शी और स्वस्थ बनाने की दिशा में एक बेहद जरूरी कदम साबित होगी।