कौन थे प्रोफेसर टीआर खान? जिन्होंने कॉकरोच के दिमाग पर किया था क्रांतिकारी शोध

विज्ञान और अनुसंधान की दुनिया में जब भी कीट-न्यूरोलॉजी (Insect Neurobiology) का जिक्र होता है, तो भारत के दिग्गज वैज्ञानिक और पटना साइंस कॉलेज के पूर्व प्राध्यापक प्रोफेसर डॉ. टीआर खान का नाम बेहद सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता है। डॉ. टीआर खान ने अपना पूरा जीवन जीव विज्ञान, खास तौर पर कॉकरोच (तिलचट्टे) के जटिल तंत्रिका तंत्र और दिमाग की संरचना को समझने में समर्पित कर दिया था। उनका यह मानना था कि धरती पर करोड़ों वर्षों से विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में जीवित रहने वाले कॉकरोच का मस्तिष्क मानव तंत्रिका तंत्र और दवाओं के असर को समझने के लिए विज्ञान की दुनिया में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है। उनके द्वारा लिखे गए शोध पत्रों और सिद्धांतों को न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक बिरादरी द्वारा स्वीकार किया गया और खूब सराहा गया।

डॉ. टीआर खान के जीवन का एक ऐसा रोमांचक और अविश्वसनीय किस्सा है जो उनकी अद्भुत जिजीविषा और भाग्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है। अपने उच्चस्तरीय शोध पत्र को पेश करने और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए डॉ. खान दिल्ली से जर्मनी के लिए रवाना हुए थे। यात्रा के दौरान उनका विमान एक भीषण दुर्घटना का शिकार हो गया। विमान में सवार कई यात्रियों के लिए यह यात्रा अंतिम साबित हुई, लेकिन कुदरत को डॉ. खान से विज्ञान के क्षेत्र में अभी और बड़े काम करवाने थे। इस भयानक प्लेन क्रैश में डॉ. टीआर खान चमत्कारिक रूप से सुरक्षित बच गए। इस जानलेवा हादसे में चोटिल होने के बावजूद उन्होंने अपनी हिम्मत नहीं हारी और अपने बुलंद हौसलों के दम पर तय समय पर जर्मनी पहुंचकर अपने अंतरराष्ट्रीय शोध को दुनिया के सामने सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया। इस ऐतिहासिक घटना ने उनके व्यक्तित्व को दुनिया भर में एक अलग पहचान दिलाई।

बिहार की राजधानी पटना स्थित प्रतिष्ठित पटना साइंस कॉलेज में प्राणीशास्त्र (Zoology) विभाग के प्रोफेसर के रूप में डॉ. टीआर खान ने हजारों छात्रों का मार्गदर्शन किया और उनमें शोध के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित किया। कॉकरोच के मस्तिष्क में मौजूद न्यूरो-सीक्रेटरी कोशिकाओं और हार्मोनल बदलावों पर उनकी रिसर्च ने कीट विज्ञान और न्यूरोबायोलॉजी के कई अनसुलझे रहस्यों पर से पर्दा उठाया था। आज भी विज्ञान जगत में जब कभी प्लेन क्रैश जैसी महाआपदाओं को मात देकर अपने लक्ष्य को हासिल करने वाले समर्पित वैज्ञानिकों की बात होती है, तो डॉ. टीआर खान की यह प्रेरक दास्तान सबसे पहले याद की जाती है। उनके योगदान ने भारतीय शोधकर्ताओं को यह सिखाया कि साधन सीमित हो सकते हैं और राह में परिस्थितियां कितनी भी विकट हों, अटूट इच्छाशक्ति के बल पर वैश्विक पटल पर झंडा गाड़ा जा सकता है।