
भारत के दक्षिणी राज्यों कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच दशकों से चला आ रहा कावेरी जल बंटवारे का विवाद एक बार फिर से देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर पहुंच चुका है। इस बहुचर्चित और संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु की सत्तारूढ़ सरकार को बेहद महत्वपूर्ण और दो टूक सलाह दी है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जब बात राज्यों के बीच जल आवंटन और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन की आती है, तो सभी पक्षों को कानूनी और व्यावहारिक दोनों पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए। कावेरी नदी के पानी का यह मामला सिर्फ दो राज्यों के बीच सिंचाई और पीने के पानी की जरूरत का नहीं है, बल्कि यह देश के संघीय ढांचे और आपसी सहयोग की एक बड़ी परीक्षा भी बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट के इस हालिया रुख के बाद दोनों राज्यों के राजनीतिक गलियारों और किसानों के बीच हलचल तेज हो गई है, क्योंकि हर कोई यह जानना चाहता है कि इस लंबी कानूनी और प्रशासनिक जंग का आगामी समय में क्या असर पड़ने वाला है।
क्या है कावेरी जल विवाद और क्यों भड़कता रहता है यह मुद्दा
कावेरी नदी जल विवाद की कहानी काफी पुरानी है, जिसकी जड़ें ब्रिटिश काल के समझौतों तक जाती हैं। कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों ही राज्य अपनी कृषि भूमि की सिंचाई और शहरी आबादी की प्यास बुझाने के लिए कावेरी नदी के पानी पर भारी रूप से निर्भर हैं। समस्या तब गंभीर हो जाती है जब मानसून के मौसम में कम बारिश होती है या कावेरी बेसिन के जलाशयों में पानी का स्तर तय कोटे से नीचे चला जाता है। ऐसी स्थिति में तमिलनाडु सरकार यह मांग करती है कि उसे उसके निर्धारित हिस्से का पूरा पानी समय पर मिलना चाहिए, ताकि उसके डेल्टा क्षेत्रों के किसानों की फसलें बर्बाद न हों। वहीं दूसरी ओर, कर्नाटक का यह तर्क रहता है कि उसके अपने किसानों और बेंगलुरु जैसे बड़े महानगर की पेयजल जरूरतों को पूरा करने के लिए भी पानी की सख्त जरूरत है, जिससे दोनों सरकारों और किसान संगठनों के बीच हर साल खींचतान की स्थिति पैदा हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और तमिलनाडु सरकार के सामने रखी गई बातें
ताजा कानूनी प्रक्रिया के तहत जब तमिलनाडु सरकार ने कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के निर्देशों और पानी छोड़े जाने के मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तो अदालत ने बेहद संतुलित और तार्किक दृष्टिकोण अपनाया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने मामले की गंभीरता को समझते हुए कहा कि केवल अदालती आदेशों के भरोसे हर बार जल संकट का समाधान नहीं ढूंढा जा सकता है, बल्कि इसके लिए वैज्ञानिक डेटा, मॉनसून की स्थिति और दोनों राज्यों की जमीनी वास्तविकताओं को भी स्वीकार करना होगा। अदालत ने तमिलनाडु सरकार से कहा कि उसे अपने हिस्से के पानी के प्रबंधन और कृषि पद्धतियों में आधुनिक तकनीक, जैसे कि ड्रिप इरिगेशन या कम पानी की खपत वाली फसलों को बढ़ावा देने पर ध्यान देना चाहिए, ताकि सूखे या कम बारिश के वर्षों में भी अत्यधिक संकट की स्थिति उत्पन्न न हो।
दोनों राज्यों के किसानों और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं
इस पूरे घटनाक्रम पर कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों ही राज्यों के किसान संघों और राजनीतिक दलों की तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। तमिलनाडु के किसानों का कहना है कि यदि उन्हें समय पर कावेरी का पानी नहीं मिलेगा, तो कावेरी डेल्टा क्षेत्र का धान का कटोरा कहे जाने वाला इलाका बंजर होने की कगार पर पहुंच जाएगा। दूसरी तरफ, कर्नाटक के किसानों और नेताओं का यह मानना है कि राज्य के बांधों में जब खुद ही पानी का जलस्तर बेहद कम है, तो वे अपनी जनता को प्यासा रखकर पड़ोसी राज्य को पानी कैसे दे सकते हैं। दोनों राज्यों के बीच का यह भाषाई, क्षेत्रीय और राजनीतिक तनाव अक्सर चुनावी मौसम में और भी अधिक भड़क जाता है, जिससे आम जनता और किसान पिसते रहते हैं।
जल संकट का दीर्घकालिक समाधान और भविष्य की राह
विशेषज्ञों का लंबे समय से यह मानना रहा है कि कावेरी जैसे अंतर-राज्यीय जल विवादों का स्थायी समाधान किसी एक आदेश या राजनीतिक बयानबाजी से नहीं निकल सकता है। इसके लिए देश को वाटरशेड मैनेजमेंट, भूजल संचयन (Groundwater Recharge), नदी जोड़ो परियोजना और वर्षा जल संचयन जैसी दीर्घकालिक रणनीतियों पर तेजी से काम करने की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट का यह हालिया रुख भी इसी बात की ओर इशारा करता है कि राज्यों को पानी की एक-एक बूंद का सदुपयोग करना सीखना होगा। जब तक भारत के राज्य कृषि और जल उपयोग के पारंपरिक और पानी बर्बाद करने वाले तौर-तरीकों को नहीं बदलेंगे, तब तक इस तरह के जल विवाद समय-समय पर अदालत और सड़कों पर सिर उठाते रहेंगे, जिस पर नीति निर्माताओं को गंभीरता से विचार करना होगा।
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