कब है सावन की हरियाली अमावस्या? पुष्य नक्षत्र के महासंयोग में स्नान-दान और तर्पण का जानें सही समय

हिंदू पंचांग और धार्मिक मान्यताओं में सावन मास का विशेष स्थान है, जो देवों के देव महादेव को समर्पित होता है। इस पवित्र महीने में आने वाली अमावस्या तिथि को ‘सावन अमावस्या’ या ‘हरियाली अमावस्या’ के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष सावन अमावस्या का पर्व बेहद खास रहने वाला है, क्योंकि इस दिन नक्षत्रों के राजा कहे जाने वाले पुष्य नक्षत्र के साथ-साथ कई दुर्लभ और मंगलकारी योगों का अद्भुत संयोग बन रहा है। इस खास अवसर पर पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य और पितरों के तर्पण का विशेष विधान है, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि और आरोग्यता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

सावन अमावस्या 2026 की सही तारीख और शुभ मुहूर्त

पंचांग की गणना के अनुसार, साल 2026 में सावन मास की अमावस्या तिथि की शुरुआत 11 अगस्त 2026, मंगलवार को देर रात 1 बजकर 54 मिनट पर होगी और इसका समापन 12 अगस्त 2026, बुधवार को रात 11 बजकर 7 मिनट पर होगा। उदया तिथि के आधार पर हरियाली अमावस्या का व्रत, पूजन और पितृ कर्म 12 अगस्त 2026, बुधवार को किया जाएगा। इस दिन स्नान और दान के लिए सुबह का समय अत्यंत उत्तम माना गया है, जिसमें साधक अपनी श्रद्धा के अनुसार अनुष्ठान कर सकते हैं।

नक्षत्रों के राजा पुष्य और दुर्लभ योगों का बन रहा है महासंयोग

ज्योतिष शास्त्र के जानकारों के अनुसार, इस बार की सावन अमावस्या पर बहुत ही शुभ योग बन रहे हैं। अमावस्या के दिन नक्षत्रों के राजा पुष्य नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जिसे सभी कार्यों के लिए अत्यंत मंगलकारी माना जाता है। इसके अलावा, इस दिन गौरी योग और गजकेसरी योग जैसे श्रेष्ठ ज्योतिषीय संयोग भी बन रहे हैं। इन शुभ योगों में भगवान शिव और माता पार्वती की उपासना करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और घर-परिवार में आ रही समस्त बाधाएं दूर होती हैं।

स्नान-दान और पितृ तर्पण का महत्व

सावन अमावस्या के दिन किसी पवित्र नदी, सरोवर या गंगा तट पर स्नान करने का विशेष महत्व है। स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य देकर जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करना चाहिए। इसके साथ ही, इस पावन तिथि पर दोपहर के समय अपने पितरों की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन कराना बेहद फलदायी माना गया है। इस दिन पर्यावरण संरक्षण के लिए पौधे (वृक्षारोपण) लगाने की भी प्राचीन परंपरा है,, जिससे प्रकृति के साथ-साथ पितृगण भी तृप्त होते हैं