ऑनलाइन दवाओं की बिक्री पर नियामक एजेंसियों की सख्त कार्रवाई: बिना वैध लाइसेंस और नियमों के उल्लंघन पर ई-फार्मेसी कारोबार पर मंडराया संकट

देश में तेजी से बढ़ते डिजिटल हेल्थकेयर और ई-फार्मेसी (E-Pharmacy) सेक्टर पर सरकार, केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) और स्वास्थ्य मंत्रालय का कड़ा रुख देखने को मिल रहा है। लंबे समय से बिना वैधानिक नियमों और वैध ऑनलाइन लाइसेंसिंग व्यवस्था के संचालित हो रहे ई-फार्मेसी प्लेटफॉर्म्स पर कड़े प्रतिबंध और नोटिस की कार्रवाई की गई है। ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 और रूल्स 1945 के तहत वर्तमान में ऑनलाइन दवा बिक्री के लिए कोई अलग से वैधानिक व संहिताबद्ध कानून अधिसूचित नहीं है। इसके चलते कई ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स द्वारा शेड्यूल्ड दवाओं (Schedule H, H1 और X) की बिक्री, भारी छूट के विज्ञापन और डॉक्टर के वैध पर्चे (Prescription) के बिना दवाओं की होम डिलीवरी को लेकर गंभीर कानूनी व सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंताएं खड़ी हो गई हैं।

भारत में पारंपरिक मेडिकल स्टोर्स और दवा विक्रेताओं के सबसे बड़े संगठन ‘ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स’ (AIOCD) द्वारा ई-फार्मेसी कंपनियों के खिलाफ लगातार विरोध दर्ज कराया जा रहा है।

  • अनियंत्रित डिस्काउंट और बाजार पर असर: ऑफलाइन केमिस्टों का आरोप है कि बड़ी ई-फार्मेसी कंपनियां विदेशी निवेश के दम पर 20% से लेकर 70% तक की भारी छूट (Predatory Pricing) देकर स्थानीय दवा दुकानों के कारोबार को खत्म कर रही हैं।

  • दवाओं के दुरुपयोग का खतरा: ऑनलाइन माध्यम से नारकोटिक्स, एंटीबायोटिक्स और डिप्रेशन की हैबिट-फॉर्मिंग दवाओं (Habit-forming drugs) को बिना सख्त सत्यापन के मंगाए जाने का खतरा बना रहता है।

  • अदालतों के अंतरिम आदेश: दिल्ली हाईकोर्ट और अन्य उच्च न्यायालयों में दायर जनहित याचिकाओं में दवाओं की अवैध ऑनलाइन बिक्री पर पूरी तरह रोक लगाने और सख्त ई-फार्मेसी नियम (E-Pharmacy Rules) लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।

दूसरी तरफ, देश की प्रमुख ऑनलाइन फार्मेसी कंपनियों का कहना है कि वे केवल एक डिजिटल प्लेटफॉर्म या ‘इंटरमीडियरी’ (Intermediary) के रूप में कार्य करती हैं।

  • लाइसेंस्ड रिटेलर्स से सप्लाई: कंपनियों का दावा है कि उनके जरिए बेची जाने वाली 100% दवाएं राज्य खाद्य एवं औषधि प्रशासन (State FDA) द्वारा लाइसेंस प्राप्त स्थानीय मेडिकल स्टोर्स से ही डिस्पैच होती हैं और पंजीकृत फार्मासिस्ट की देखरेख में ही बिल बनती हैं।

  • रिमोट एरियाज में लाइफ-सेविंग सपोर्ट: ऑनलाइन दवाओं की होम डिलीवरी से बुजुर्गों, गंभीर रूप से बीमार मरीजों और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को घर बैठे किफायती व प्रामाणिक दवाएं प्राप्त करने में बड़ी मदद मिलती है।

स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा तैयार किए जा रहे प्रस्तावित नियामक ढांचे के तहत ऑनलाइन दवा बिक्री को पूरी तरह बंद करने के बजाय कड़े नियमों के दायरे में लाने की तैयारी है:

  • केंद्रीय पंजीकरण अनिवार्य: केवल वही ई-पोर्टल दवाएं बेच सकेंगे, जो ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) के पास पंजीकृत होंगे।

  • शेड्यूल X और नशीली दवाओं पर पूर्ण बैन: किसी भी प्रकार की नशीली, ट्रांक्विलाइजर और गंभीर साइकोट्रोपिक दवाओं की ऑनलाइन बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी।

  • कड़ा प्रिस्क्रिप्शन वेरिफिकेशन: हर ऑर्डर के साथ रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर (RMP) का सत्यापित डिजिटल पर्चा अपलोड करना और रिकॉर्ड मेंटेन करना अनिवार्य होगा।

  • भ्रामक विज्ञापनों पर रोक: दवाओं की बिक्री बढ़ाने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर भ्रामक छूट और विज्ञापन देने पर सख्त जुर्माने का प्रावधान होगा।

नियामक अनिश्चितता और कानूनी सख्ती के चलते ऑनलाइन हेल्थकेयर और मेडिसिन डिलीवरी सेक्टर में काम कर रहे स्टार्टअप्स के वैल्यूएशन और पूंजी प्रवाह पर सीधा असर पड़ा है। कई कंपनियों को अपने बिजनेस मॉडल में बदलाव करते हुए हाइब्रिड मॉडल (ऑनलाइन + ऑफलाइन स्टोर्स) अपनाना पड़ रहा है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सरकार आधिकारिक ई-फार्मेसी नीति को अंतिम रूप देकर अधिसूचित नहीं कर देती, तब तक नियमों का उल्लंघन करने वाले अनधिकृत प्लेटफॉर्म्स पर कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई जारी रहेगी।