
सनातन धर्म में एकादशी तिथि को आध्यात्मिक रूप से सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी (Yogini Ekadashi) का व्रत इस साल दो दिन यानी 10 जुलाई और 11 जुलाई 2026 को रखा जा रहा है। 10 जुलाई को गृहस्थ जन यह व्रत रख रहे हैं, जबकि 11 जुलाई को वैष्णव संप्रदाय के लोग उपवास रखेंगे।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी के दिन केवल उपवास रखना ही काफी नहीं है, बल्कि पूजा के समय इसकी पौराणिक व्रत कथा सुनना या पढ़ना अनिवार्य माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख है कि योगिनी एकादशी की कथा सुनने मात्र से मनुष्य को अपने अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है, मृत्यु के बाद स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है और 88 हजार ब्राह्मणों को सामूहिक भोज कराने के बराबर महापुण्य प्राप्त होता है। आइए जानते हैं भगवान श्रीकृष्ण के मुख से सुनी गई यह अमर कथा।
अलकापुरी नगरी और कुबेर के सेवक हेममाली की कथा
इस पावन व्रत की कथा का वर्णन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर के संशय को दूर करने के लिए किया था।
पौराणिक कथा के अनुसार, धन के देवता राजा कुबेर की भव्य और स्वर्णमयी नगरी अलकापुरी थी। राजा कुबेर भगवान भोलेनाथ (शिव जी) के अनन्य और परम भक्त थे। वे रोज नियमपूर्वक महादेव की विशेष आराधना करते थे। राजा कुबेर की पूजा के लिए पवित्र मानसरोवर से रोज ताजे और अत्यंत सुंदर पुष्प (फूल) लाने की जिम्मेदारी हेममाली नाम के एक यक्ष की थी।
प्रेमपाश में कर्तव्य की अनदेखी
हेममाली की पत्नी का नाम विशालाक्षी था, जो अप्सराओं के समान रूपवान और दिव्य सुंदरी थी। हेममाली अपनी पत्नी से अगाध और अत्यधिक प्रेम करता था। एक दिन हमेशा की तरह हेममाली सुबह-सुबह मानसरोवर से पूजा के सुंदर पुष्प तोड़कर लाया, लेकिन वह राजा के राजमहल जाने के बजाय अपनी रूपवती पत्नी के मोह में आकर सीधे अपने घर रुक गया। पत्नी के साथ आमोद-प्रमोद और हास-परिहास में व्यस्त हेममाली को समय बीतने का भान ही नहीं रहा।
उधर राजमहल में राजा कुबेर भगवान शिव के सिंहासन के सामने बैठे रहे और दोपहर हो गई, लेकिन फूल नहीं पहुंचे। महादेव की पूजा का समय बीत जाने पर राजा कुबेर का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने तुरंत अपने गुप्तचरों और सेवकों को हेममाली का पता लगाने के लिए भेजा।
राजा कुबेर का भयानक श्राप: सेवकों ने महल लौटकर राजा से कहा, “हे राजन! हेममाली अपनी पत्नी के प्रेमपाश में पूरी तरह अंधा हो चुका है। वह कर्तव्य को भूलकर अपने घर पर पत्नी के साथ रमण कर रहा है।” यह सुनते ही कुबेर क्रोध से लाल-पीले हो गए और उन्होंने हेममाली को जंजीरों में जकड़कर दरबार में पेश करने का हुक्म दिया। कांपता हुआ हेममाली जैसे ही हाजिर हुआ, कुबेर ने दहाड़ते हुए कहा, “अरे पापी! तूने मेरे आराध्य देवों के देव महादेव की पूजा का घोर अनादर किया है। तू काम के वश में होकर अपने कर्तव्य से च्युत हुआ है, इसलिए मैं तुझे श्राप देता हूं कि तू इसी क्षण अपनी प्रिय स्त्री के वियोग को भोगेगा और मृत्युलोक (पृथ्वी) पर जाकर एक भयानक कोढ़ी (कुष्ठ रोगी) बन जाएगा।”
श्राप का प्रभाव और जंगलों में भटकाव
राजा कुबेर के मुख से श्राप निकलते ही एक जोरदार बिजली चमकी और हेममाली उसी पल स्वर्गलोक से सीधे पृथ्वी पर आ गिरा। श्राप के भयानक प्रभाव से उसका दिव्य और सुंदर शरीर गलने लगा, उसकी त्वचा कुष्ठ रोग से ग्रसित हो गई और उससे दुर्गंध आने लगी। उसकी पत्नी विशालाक्षी भी उससे हमेशा के लिए बिछड़ गई।
वह भूख, प्यास और भयंकर शारीरिक वेदना से तड़पता हुआ पृथ्वी के घने जंगलों और पहाड़ों में भटकने लगा। हालांकि, पूर्व में की गई शिव पूजा के पुण्य के कारण उसकी याददाश्त (स्मृति) नष्ट नहीं हुई थी, इसलिए वह दिन-रात अपने किए गए अपराध पर पश्चाताप के आंसू रोता रहता था।
ऋषि मार्कण्डेय के आश्रम में मिला मुक्ति का मार्ग
1.हिमालय की गोद में पहुंचे हेममाली:आश्रम आगमन.
कई वर्षों तक नरक जैसी यातना भोगते हुए भटकते-भटकते एक दिन हेममाली का भाग्य जागा और वह हिमालय पर्वत पर स्थित त्रिकालदर्शी मार्कण्डेय ऋषि के पावन आश्रम में जा पहुंचा।
2.ऋषि के सामने खोला अपना दिल:सत्य की स्वीकारोक्ति.
हेममाली की त्वचा को गलते हुए और उसकी दयनीय स्थिति देखकर ऋषि मार्कण्डेय का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने दयापूर्वक पूछा कि तुमने ऐसा कौन सा घोर पाप किया है जो यह दशा हुई? हेममाली ने बिना कुछ छुपाए राजा कुबेर के श्राप और अपनी कामुक भूल की पूरी कहानी सच-सच बता दी।
3.ऋषि ने बताया योगिनी एकादशी का महत्व:मुक्ति का महाउपाय.
ऋषि मार्कण्डेय हेममाली की सत्यवादिता से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, “चूंकि तुमने मेरे सामने बिना किसी कपट के सत्य स्वीकार किया है, इसलिए मैं तुम्हें इस कष्ट से मुक्ति का अचूक मार्ग बताता हूँ। तुम आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की ‘योगिनी एकादशी’ का पूर्ण निष्ठा से व्रत करो।”
व्रत का चमत्कारी परिणाम और सुखद अंत
ऋषि की आज्ञा पाकर हेममाली ने आषाढ़ एकादशी के दिन पूरे विधि-विधान, श्रद्धा और उपवास के साथ योगिनी एकादशी का व्रत रखा और भगवान नारायण की प्रसन्नता के लिए रात्रि में संकीर्तन और जागरण किया।
इस महाव्रत के पुण्य प्रताप से हेममाली के शरीर का सारा कुष्ठ रोग जड़ से समाप्त हो गया और उसकी त्वचा दोबारा सोने जैसी चमकीली और दिव्य हो गई। वह अपने पुराने सुंदर यक्ष स्वरूप को प्राप्त कर वापस अलकापुरी नगरी लौट गया, जहाँ राजा कुबेर ने भी उसे क्षमा कर दिया और वह अपनी पत्नी विशालाक्षी के साथ पुनः आनंदपूर्वक रहने लगा।
महा मुहूर्त और संयोग (Quick Info)
इस वर्ष योगिनी एकादशी पर त्रिपुष्कर योग के साथ भरणी नक्षत्र का एक अत्यंत दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिससे आज के दिन किया गया दान और सुनी गई यह कथा हजार गुना अधिक फल प्रदान करेगी।
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