लखनऊ: विश्व नृत्य दिवस के अवसर पर आज हम आपको रूबरू करवा रहे हैं एक ऐसी शख्सियत से, जिन्होंने न केवल शास्त्रीय नृत्य की बारीकियों को जिया है, बल्कि समाज की रूढ़ियों और भेदभाव के खिलाफ एक मौन युद्ध भी लड़ा है। यह कहानी है देविका देवेंद्र एस मंगलामुखी की, जो एक ट्रांसजेंडर महिला होने के साथ-साथ कथक की एक समर्पित साधिका हैं। अपनी कला और संघर्ष के संगम को साझा करते हुए देविका बताती हैं कि कैसे लखनऊ घराने की समृद्ध विरासत को आगे बढ़ाना उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन गया है।
महान गुरुओं की विरासत और साधना का सफर
देविका का नृत्य के प्रति समर्पण गहरा है। वे कथक की उस विरासत का हिस्सा हैं, जिसे ‘लास्य सम्राट’ और अभिनय के जादूगर कहे जाने वाले महान आचार्य पंडित लछू महाराज जी ने सींचा था। अपनी गुरु, स्वर्गीय श्रृंगार मनी श्रीमती कपिला राज शर्मा जी के मार्गदर्शन में देविका ने लखनऊ घराने की बारीकियों को सीखा। उनकी साधना केवल पैरों की थाप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनकी आत्मा की अभिव्यक्ति है, जिसे उन्होंने वर्षों के कठोर परिश्रम और अटूट भक्ति से निखारा है।
प्रतिभा पर भारी पड़ा भेदभाव का दंश
एक कुशल कलाकार होने के बावजूद देविका का सफर आसान नहीं रहा। उन्होंने साझा किया कि किस तरह उन्हें अपनी लैंगिक पहचान (Gender Identity) के कारण कई बार वरिष्ठ गुरुओं और प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा तिरस्कार और भेदभाव का सामना करना पड़ा। देविका का कहना है कि संस्कृति मंत्रालय की जूनियर फेलोशिप से उन्हें वंचित रखा गया और उन्हें संदेह है कि उनकी पहचान ही इस अस्वीकृति की मुख्य वजह रही। इतना ही नहीं, इस वर्ष उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार के लिए आवेदन करने के बाद भी उनका चयन नहीं हुआ, जिसने उन्हें मानसिक रूप से काफी आहत किया।
कला की शक्ति: लिंग और जाति की सीमाओं से परे
तमाम मुश्किलों और उपेक्षा के बाद भी देविका के हौसले पस्त नहीं हुए हैं। वे दृढ़ता से मानती हैं कि कला किसी लिंग, जाति या सीमा की मोहताज नहीं होती। उनके अनुसार, “कला हर उस आत्मा की पुकार है जो खुद को व्यक्त करना चाहती है।” इन कड़वे अनुभवों ने देविका को और अधिक मजबूत बनाया है। आज विश्व नृत्य दिवस पर वे अपने गुरुओं की विरासत को नमन करते हुए संकल्प लेती हैं कि वे साहस और सम्मान के साथ अपने कला-पथ पर निरंतर आगे बढ़ती रहेंगी।
समाज के लिए एक प्रेरणादायक संदेश
देविका मंगलामुखी का जीवन उन सभी के लिए एक मिसाल है जो भेदभाव के कारण अपने सपनों को छोड़ने का विचार कर रहे हैं। वे समाज को प्रेरित करती हैं कि रूढ़िवादिता की बेड़ियां तोड़कर अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ना ही सच्ची सफलता है। उनका यह सफर केवल एक नृत्य यात्रा नहीं, बल्कि सम्मान और पहचान की वह लड़ाई है जिसे वे अपनी कला के माध्यम से लड़ रही हैं।
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