Women’s Reservation Bill 2026 : मौलाना बरेलवी का समर्थन और सियासी दलदल से बचने की सलाह

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News India Live, Digital Desk: महिला आरक्षण को लेकर देश की सियासत में एक नया अध्याय जुड़ गया है। जहां केंद्र सरकार 16 अप्रैल 2026 को लोकसभा में तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश कर चुकी है, वहीं समाज के विभिन्न वर्गों से इस पर प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। उत्तर प्रदेश के बरेली से आल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शाहबुद्दीन रजवी बरेलवी का बयान इस समय चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

1. मौलाना बरेलवी का रुख: समर्थन और चेतावनी का संगम

मौलाना रजवी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस पहल का स्वागत किया है, लेकिन साथ ही मुस्लिम महिलाओं के लिए एक ‘लक्ष्मण रेखा’ भी खींची है:

आरक्षण का समर्थन: मौलाना ने इसे ‘आधी आबादी’ को हक दिलाने वाला एक सराहनीय और सकारात्मक कदम बताया। उन्होंने माना कि इससे भारतीय लोकतंत्र अधिक समावेशी बनेगा।

सियासत को बताया ‘दलदल’: समर्थन के साथ ही उन्होंने एक गंभीर सलाह भी दी। मौलाना का तर्क है कि आज की राजनीति ‘चालाकी और धोखे’ से भरी है। उनके अनुसार, सक्रिय राजनीति में आने पर महिलाओं को अपनी इज्जत, गरिमा और पर्दे की मर्यादा के साथ समझौता करना पड़ सकता है।

इस्लामिक दृष्टिकोण: उन्होंने कहा कि इस्लाम में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को सर्वोपरि माना गया है, इसलिए उन्हें इस सियासी दलदल से दूर रहकर घर की गरिमा बनाए रखनी चाहिए।

2. संसद में पेश हुए 3 ऐतिहासिक विधेयक

सरकार ने 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले महिला आरक्षण को जमीन पर उतारने के लिए ठोस खाका तैयार कर लिया है:

विधेयक मुख्य उद्देश्य
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करना। (815 राज्यों के लिए, 35 केंद्र शासित प्रदेशों के लिए)।
परिसीमन विधेयक, 2026 2011 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना ताकि प्रतिनिधित्व संतुलित हो।
UT कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी जैसे विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों में भी 33% महिला आरक्षण लागू करना।

3. 2029 का लक्ष्य: प्रतिनिधित्व का नया ढांचा

इन विधेयकों के जरिए सरकार का लक्ष्य केवल आरक्षण देना ही नहीं, बल्कि संसद की पूरी संरचना को बदलना है। सीटों की संख्या में वृद्धि (850 तक) होने से न केवल महिलाओं के लिए 33% का रास्ता साफ होगा, बल्कि बढ़ती आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व भी बढ़ेगा।

खासकर जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ने से वहां के स्थानीय नेतृत्व में बड़े बदलाव की उम्मीद जताई जा रही है।

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