
हमारे देश भारत में विविध संस्कृतियों के साथ-साथ लोगों के शारीरिक रंगों में भी काफी विविधता देखने को मिलती है— कोई गोरा है, कोई सांवला, तो कोई गेहुंआ। लेकिन जब भी हमारे दिमाग में अफ्रीका महाद्वीप का नाम आता है, तो वहां के लोगों का गहरा काला रंग सबसे पहले जेहन में आता है। दुनिया के कई हिस्सों में अज्ञानता और रूढ़िवादी सोच के कारण लोग इसे दुर्भाग्य या कोई अभिशाप समझ लेते हैं, लेकिन विज्ञान की नजर से देखें तो सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है।
असल में, यह गहरा रंग अफ्रीका के लोगों के लिए प्रकृति का एक अनमोल और वैज्ञानिक वरदान है, जो उन्हें वहां के बेहद कठिन मौसम में भी पूरी तरह सुरक्षित रखता है। आइए जानते हैं इसके पीछे के दिलचस्प वैज्ञानिक कारणों को।
मेलेनिन (Melanin) है हमारी त्वचा का असली सुपरहीरो
हमारी त्वचा, बालों और आंखों का रंग कैसा होगा, यह हमारे शरीर में मौजूद ‘मेलेनिन’ (Melanin) नाम के एक प्राकृतिक पिगमेंट से तय होता है। शरीर की कोशिकाओं में मेलेनिन की मात्रा जितनी ज्यादा होगी, त्वचा का रंग उतना ही गहरा या काला दिखाई देगा।
अफ्रीका की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वहां सूरज की सीधी और बहुत तेज किरणें पड़ती हैं, जिसके कारण वहां वातावरण में खतरनाक अल्ट्रावायलेट (UV) किरणों की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। ऐसे में वहां के लोगों के शरीर में मौजूद अत्यधिक मेलेनिन एक बेहतरीन ढाल की तरह काम करता है। यह इन खतरनाक किरणों को त्वचा की गहराई में जाने से पहले ही सोख लेता है, जिससे त्वचा की अंदरूनी कोशिकाएं और डीएनए (DNA) पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं। यही वजह है कि अफ्रीकी मूल के लोगों में स्किन कैंसर (त्वचा का कैंसर) होने का खतरा दुनिया में सबसे कम होता है।
त्वचा के गहरे रंग से मिलने वाले मुख्य फायदे
प्रकृति ने गहरे रंग की त्वचा वाले लोगों को कई ऐसे सुरक्षात्मक लाभ दिए हैं, जो ठंडे इलाकों में रहने वाले लोगों के पास नहीं होते:
हजारों साल पहले कैसे बदला इंसानों का रंग?
जैव विकास (Evolution) के सिद्धांतों और वैज्ञानिकों के अनुसार, अफ्रीका को पूरी मानव सभ्यता का उद्गम स्थल (पालना) माना जाता है। यानी लाखों साल पहले हम सभी के पूर्वज वहीं रहते थे और उन सभी का रंग गहरा था। लेकिन जैसे-जैसे इंसानी आबादी बढ़ी, लोगों ने अफ्रीका से निकलकर यूरोप और एशिया के ठंडे व कम धूप वाले इलाकों की ओर पलायन करना शुरू किया।
रंग बदलने की विकास यात्रा
जब इंसान ऐसे देशों में पहुंचे जहां सर्दियों का मौसम लंबा होता था और धूप बहुत कम निकलती थी, तो वहां के माहौल के हिसाब से उनके शरीर की जरूरतें बदल गईं। कम धूप वाले इलाकों में शरीर को हड्डियों की मजबूती के लिए आवश्यक विटामिन-डी बनाने में दिक्कत होने लगी। ऐसे में, प्रकृति ने हजारों सालों की विकास प्रक्रिया के दौरान उनके शरीर में मेलेनिन के स्तर को धीरे-धीरे कम कर दिया, ताकि बची-खुची धूप को भी शरीर आसानी से सोख सके। मेलेनिन कम होने के कारण ही ठंडे देशों के लोगों का रंग गोरा हो गया।
भारत की भौगोलिक विविधता और हमारा रंग
अगर हम भारत की बात करें, तो हमारी भौगोलिक स्थिति इतनी अनोखी है कि यहां आपको रंगों का एक बेहद खूबसूरत और विविध मिश्रण देखने को मिलता है। उत्तर भारत का क्षेत्र पहाड़ी और ठंडे इलाकों के करीब है, इसलिए वहां के लोगों का रंग थोड़ा गोरा या गेहुंआ होता है। इसके विपरीत, जैसे-जैसे हम दक्षिण भारत की ओर बढ़ते हैं, भूमध्य रेखा (Equator) की निकटता के कारण धूप तेज और सीधी होने लगती है। इसी वजह से दक्षिण भारत के लोगों की त्वचा में मेलेनिन का स्तर स्वाभाविक रूप से थोड़ा अधिक होता है, जो उनके सांवले या गहरे रंग की मुख्य वजह है।
आधुनिक दौर में गहरे रंग की अहमियत
आज के समय में जब ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) के चलते पूरी दुनिया का तापमान बढ़ रहा है और ओजोन परत के नुकसान से यूवी किरणें अधिक खतरनाक हो रही हैं, तब गहरे रंग की त्वचा वाले लोग प्रकृति के इस सुरक्षा कवच के कारण सबसे ज्यादा सुरक्षित हैं। विज्ञान साफ कहता है कि दुनिया का हर रंग सुंदर है और हर रंग के पीछे प्रकृति की अपनी एक बहुत ही सोची-समझी और जरूरी वजह छिपी हुई है।
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