हरियाणा निकाय चुनाव में उलटफेर, उकलाना में 23 साल की रीमा सोनी ने रोका भाजपा का विजय रथ

हिसार: हरियाणा विधानसभा और पंचायत चुनावों में शानदार प्रदर्शन के बाद नगर निकाय चुनावों में भी भारतीय जनता पार्टी ने पंचकूला, हिसार, अंबाला और सोनीपत समेत 6 जिलों में जीत का परचम लहराया है। लेकिन इन सबके बीच हिसार के उकलाना से आए एक चुनावी नतीजे ने न सिर्फ भाजपा, बल्कि पूरे प्रदेश के राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया है। यहां 23 साल की एक युवा लड़की रीमा सोनी ने भाजपा के कद्दावर नेताओं की मेहनत पर पानी फेरते हुए बड़ी जीत दर्ज की है।

मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्रियों की मेहनत नहीं आई काम

उकलाना चेयरमैन पद का मुकाबला बेहद दिलचस्प था। भाजपा ने यहां अपने वरिष्ठ नेता श्रीनिवास गोयल की बहू निकिता गोयल को चुनाव मैदान में उतारा था। निकिता के समर्थन में खुद मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने 4 जनसभाएं की थीं। इसके अलावा प्रदेश अध्यक्ष मोहन लाल बडोली, कैबिनेट मंत्री रणबीर सिंह गंगवा, कृष्ण बेदी और राज्यसभा सांसद सुभाष बराला व संजय भाटिया जैसे दिग्गजों ने भी पूरी ताकत झोंक दी थी। इसके बावजूद निकिता गोयल को हार का सामना करना पड़ा।

निर्दलीय रीमा सोनी ने 2806 वोटों से दी पटखनी

सिविल सेवा की तैयारी कर रही रीमा सोनी ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और भाजपा प्रत्याशी को 2806 मतों के भारी अंतर से हरा दिया। रीमा सोनी को कुल 7078 वोट मिले, जबकि भाजपा की निकिता गोयल महज 4272 वोटों पर सिमट गईं। हैरानी की बात यह है कि निकिता गोयल अपने खुद के वार्ड (उकलाना मंडी) में भी जीत दर्ज नहीं कर सकीं। वोटों की गिनती के दौरान शुरुआती दो राउंड में पिछड़ने के बाद निकिता ने मतगणना केंद्र ही छोड़ दिया था।

बनिया बनाम गैर-बनिया समीकरण ने बदला खेल

सूत्रों की मानें तो उकलाना में वैश्य समुदाय की अच्छी आबादी होने के बावजूद भाजपा की हार के पीछे सामाजिक ध्रुवीकरण एक बड़ी वजह रहा। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह चुनाव ‘बनिया बनाम गैर-बनिया’ में तब्दील हो गया था, जिसका सीधा फायदा रीमा सोनी को मिला। रीमा ने कुल 16 में से 14 वार्डों में बढ़त बनाई। रीमा के पिता महेंद्र सोनी, जो खुद 2006 से पार्षद हैं, उनके अनुभव और स्थानीय विधायक नरेश सेलवाल के समर्थन ने इस जीत में अहम भूमिका निभाई।

विपक्ष की एकजुटता और कांग्रेस-इनेलो का साथ

रीमा सोनी की जीत में विपक्षी एकजुटता का भी बड़ा हाथ रहा। कांग्रेस विधायक नरेश सेलवाल के समर्थन के चलते कांग्रेस के परंपरागत वोट रीमा के पक्ष में लामबंद हो गए। इसके साथ ही इंडियन नेशनल लोकदल (INLO) के समर्थन ने जीत की राह और आसान कर दी। 75 फीसदी मतदान वाले इस चुनाव में भाजपा के इतने बड़े झटके के बाद अब पार्टी के भीतर हार के कारणों की समीक्षा होना तय माना जा रहा है।