
भारत में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के जरिए रोजाना करोड़ों वित्तीय लेन-देन होते हैं। आम उपभोक्ताओं के लिए बैंक-टू-बैंक यूपीआई ट्रांसफर पूरी तरह नि:शुल्क रहता है, लेकिन बड़े मर्चेंट लेन-देन या प्रीपेड पेमेंट इंस्ट्रूमेंट्स (PPI/वॉलेट्स) तथा क्रेडिट कार्ड ऑन यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) का नियम लागू होता है। जब किसी व्यापारी या सेवा प्रदाता से एमडीआर के रूप में शुल्क लिया जाता है, तो सवाल उठता है कि इस कमाई का पैसा किसकी जेब में जाता है।
डिजिटल भुगतान के इस विशाल तंत्र में कोई एक संस्था पूरे राजस्व की हकदार नहीं होती। इसके पीछे नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI), पैसा काटने वाला बैंक (Issuer Bank), पैसा जमा करने वाला बैंक (Acquirer Bank) और थर्ड-पार्टी पेमेंट ऐप्स (TPAP) मिलकर काम करते हैं। इन सभी साझेदारों के बुनियादी ढांचे और परिचालन खर्च को पूरा करने के लिए राजस्व का एक तय अनुपात निर्धारित किया गया है, जिसे उद्योग जगत में ’40-28-12-8 फॉर्मूले’ के रूप में समझा जाता है।
जब भी किसी योग्य यूपीआई ट्रांजैक्शन पर एमडीआर वसूला जाता है, तो एकत्र किए गए प्रत्येक 1 रुपये (या कुल रेवेन्यू पूल) का बंटवारा पूर्व-निर्धारित प्रतिशत के आधार पर होता है। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि ट्रांजैक्शन में शामिल हर तकनीकी और वित्तीय कड़ी को उसका उचित हिस्सा मिले।
इस राजस्व बंटवारे के तहत विभिन्न पक्षों की हिस्सेदारी का प्रत्यक्ष ब्यौरा इस प्रकार है:
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40% (इशूअर बैंक – 40 पैसे): ग्राहक का बैंक, जहां से पैसा कटता है। सुरक्षा जोखिम, कोर बैंकिंग सिस्टम (CBS) के रखरखाव और प्रमाणीकरण की जिम्मेदारी इसी बैंक की होती है।
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28% (एक्वायरर बैंक – 28 पैसे): दुकानदार या मर्चेंट का बैंक, जो मर्चेंट खाता संभालता है और रकम का क्रेडिट सुनिश्चित करता है।
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12% (थर्ड पार्टी ऐप्लिकेशन प्रोवाइडर्स – 12 पैसे): Google Pay, PhonePe, Paytm जैसे ऐप, जो यूजर और मर्चेंट को आसान इंटरफेस और सॉफ्टवेयर सुविधा देते हैं।
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8% (एनपीसीआई नेटवर्क – 8 पैसे): केंद्रीय स्विचिंग नेटवर्क और यूपीआई आर्किटेक्चर संचालित करने वाली संस्था का हिस्सा।
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शेष 12% (ऑपरेशनल व मर्चेंट पार्टनर पूल – 12 पैसे): पॉइंट ऑफ सेल (POS) वेंडर्स, साउंडबॉक्स सर्विसिंग और फील्ड सपोर्ट ऑपरेशंस का हिस्सा।
इस राजस्व आवंटन के पीछे केवल वित्तीय लाभ नहीं, बल्कि भारी तकनीकी और परिचालन लागत की भरपाई का सिद्धांत काम करता है।
इशूअर बैंक (40% हिस्सा क्यों?): ग्राहक के बैंक को सबसे बड़ा हिस्सा इसलिए दिया जाता है क्योंकि उसे सबसे भारी सर्वर ट्रैफिक, 256-बिट सुरक्षा एन्क्रिप्शन, फ्रॉड डिटेक्शन और टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (UPI PIN) को संभालना होता है। सर्वर डाउनटाइम का सीधा जोखिम इसी बैंक के सिर होता है।
एक्वायरर बैंक (28% हिस्सा क्यों?): मर्चेंट का बैंक जोखिम प्रबंधन (KYC, एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग) और मर्चेंट सेटलमेंट का काम करता है। इसके अलावा चार्जबैक और रिफंड जैसी स्थितियों को निपटाने का वित्तीय दायित्व भी इसी बैंक का होता है।
पेमेंट ऐप्स / TPAP (12% हिस्सा क्यों?): तकनीक और यूजर इंटरफेस विकसित करने वाले ऐप्स को यूजर बेस बनाए रखने, सर्वर एपीआई को जोड़े रखने और ऐप स्तर पर सुरक्षा ऑडिट पूरा करने के लिए यह हिस्सा मिलता है।
एनपीसीआई (8% हिस्सा क्यों?): नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया पूरे देश के यूपीआई स्विच को 24×7 चलाता है। इंटर-बैंक नेट सेटलमेंट और नए फीचर्स (जैसे UPI Lite, UPI AutoPay) का अनुसंधान इसी कोष से पोषित होता है।
इस राजस्व बंटवारे को लेकर आम नागरिकों और छोटे दुकानदारों के मन में अक्सर यह आशंका रहती है कि क्या उनके सामान्य लेन-देन पर भी यह शुल्क कटेगा।
आरबीआई और एनपीसीआई के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अनुसार:
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सामान्य व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) बैंक खाता ट्रांसफर पर शून्य शुल्क (Zero MDR) लागू रहता है।
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छोटे खुदरा व्यापारियों (किराना, फल-सब्जी विक्रेता आदि) के सामान्य क्यूआर कोड पर बैंक ट्रांसफर पर कोई एमडीआर नहीं काटा जाता।
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यह शुल्क मुख्य रूप से 2,000 रुपये से अधिक के वॉलेट/पीपीआई (Prepaid Payment Instruments) आधारित मर्चेंट ट्रांजैक्शन या रूपे क्रेडिट कार्ड (RuPay Credit Card on UPI) के बड़े व्यावसायिक भुगतानों पर ही लागू होता है, जिसका वहन बड़े मर्चेंट करते हैं।
इस पारदर्शी राजस्व ढांचे से जहां डिजिटल भुगतान कंपनियों की वित्तीय स्थिरता बनी रहती है, वहीं भारत का डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर बिना किसी रुकावट के लगातार विस्तार कर रहा है।
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