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UPI पर 0.4% MDR चार्ज वापस नहीं होगा: सीनियर सरकारी अधिकारी का बड़ा बयान, क्या अब आम जनता और दुकानदारों पर पड़ेगा सीधा असर?

देशभर में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के जरिए रोजमर्रा का लेनदेन करने वाले करोड़ों नागरिकों और व्यापारियों के लिए एक बेहद अहम खबर सामने आई है। केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने साफ कर दिया है कि यूपीआई ट्रांजैक्शन पर 0.4 फीसदी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के प्रस्ताव अथवा फैसले को वापस लेने की सरकार की कोई योजना नहीं है। इस बयान के बाद डिजिटल पेमेंट सेक्टर, बैंकिंग उद्योग और खुदरा बाजार में हलचल तेज हो गई है। लंबे समय से चल रही इन अटकलों पर अब पूर्ण विराम लग गया है कि सरकार उद्योग जगत या व्यापारियों के दबाव में आकर इस निर्णय को टाल सकती है। अधिकारी के अनुसार, डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को लंबे समय तक टिकाऊ, सुरक्षित और आर्थिक रूप से सक्षम बनाए रखने के लिए यह कदम उठाना अनिवार्य हो गया है।

भारत में डिजिटल क्रांति का चेहरा बन चुके यूपीआई नेटवर्क ने पिछले कुछ वर्षों में कैशलेस इकोनॉमी को गांव-गांव और गली-मोहल्ले तक पहुंचाया है। सब्जी के ठेले से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल्स तक, यूपीआई हर भारतीय के स्मार्टफोन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। हालांकि, इतने बड़े नेटवर्क को निर्बाध गति से चलाने के लिए बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स (PSPs) और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) को सर्वर मेंटेनेंस, साइबर सिक्योरिटी और तकनीकी अपग्रेड पर भारी पूंजी निवेश करना पड़ता है। सरकार अब तक इस घाटे की भरपाई के लिए विशेष इंसेंटिव पैकेज देती रही थी, लेकिन वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी खजाने पर लगातार निर्भर रहने के बजाय इस मॉडल को आत्मनिर्भर बनाना जरूरी है।

मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर वह शुल्क होता है जो किसी डिजिटल लेनदेन की सुविधा उपलब्ध कराने के बदले मर्चेंट (दुकानदार या व्यापारी) से लिया जाता है। आसान शब्दों में समझें तो जब कोई ग्राहक क्यूआर कोड स्कैन करके या यूपीआई ऐप से भुगतान करता है, तो उस ट्रांजैक्शन को प्रोसेस करने में कई पक्ष शामिल होते हैं—ग्राहक का बैंक, मर्चेंट का बैंक, यूपीआई स्विच और ऐप प्रोवाइडर। 0.4% की दर का मतलब है कि प्रत्येक 1000 रुपये के लेनदेन पर अधिकतम 4 रुपये का चार्ज बनेगा।

वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने यह भी रेखांकित किया कि यह दर क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड पर लगने वाले पारंपरिक एमडीआर (जो अमूमन 1.5% से 2.5% तक होता है) की तुलना में काफी कम और संतुलित रखी गई है। इस शुल्क से एकत्रित होने वाला राजस्व सीधे तौर पर बैंकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने, साइबर धोखाधड़ी रोकने के आधुनिक टूल्स तैनात करने और सर्वर डाउनटाइम की समस्याओं को खत्म करने में खर्च किया जाएगा। सरकार का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल लेन-देन बिना किसी रुकावट के चौबीसों घंटे और सातों दिन सुरक्षित तरीके से काम करता रहे।

जैसे ही एमडीआर लागू होने की बात सामने आई, आम उपभोक्ताओं में यह संशय पैदा हो गया कि क्या अब हर बार चाय, राशन या पेट्रोल के लिए यूपीआई से पेमेंट करने पर उनकी जेब से अतिरिक्त पैसे कटेंगे। इस पर सरकारी अधिकारी ने स्थिति साफ करते हुए कहा कि एमडीआर का नियम मर्चेंट पेमेंट्स पर लागू होता है, न कि पर्सन-टू-पर्सन (P2P) ट्रांसफर पर। यदि आप अपने किसी मित्र, रिश्तेदार या परिवार के सदस्य को पैसे भेजते हैं, तो वह पूरी तरह से शून्य शुल्क पर ही रहेगा।

दुकानों पर होने वाले मर्चेंट पेमेंट्स (P2M) के मामले में भी तकनीकी रूप से यह चार्ज व्यापारी को वहन करना होता है, ग्राहक को नहीं। हालांकि, बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े व्यापारी और संगठित रिटेल स्टोर्स इस मामूली लागत को आसानी से अपने ऑपरेटिंग मार्जिन में समाहित कर लेंगे, लेकिन छोटे व्यापारी इसे अप्रत्यक्ष रूप से सामान की कीमतों में जोड़ सकते हैं। इसके बावजूद, नकदी संभालने की लागत, चोरी का जोखिम और बैंक में कैश जमा करने के झंझट की तुलना में 0.4% का यह मामूली शुल्क व्यापारियों के लिए भी अधिक किफायती और पारदर्शी साबित होगा।

भारत के टियर-2, टियर-3 शहरों और ग्रामीण इलाकों में फैले छोटे किराना दुकानदारों, चाय स्टॉल्स और स्थानीय वेंडर्स के बीच इस फैसले को लेकर चिंताएं थीं। इस संदर्भ में सरकारी सूत्रों का कहना है कि सरकार छोटे व्यापारियों के हितों की सुरक्षा के लिए थ्रेशोल्ड लिमिट (न्यूनतम सीमा) और विशिष्ट श्रेणियों पर छूट जैसे प्रावधानों पर पहले ही काम कर चुकी है। अधिकांश मामलों में कम मूल्य के लेन-देन पर किसी भी तरह के भारी शुल्क का बोझ छोटे दुकानदारों पर नहीं डाला जाएगा।

स्थानीय स्तर पर व्यापार करने वाले संगठनों का कहना है कि डिजिटल पेमेंट ने उनके बहीखाते को सुव्यवस्थित किया है और ग्राहकों को आकर्षित करने में मदद की है। यदि इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर होता है और फेल ट्रांजैक्शन की दर शून्य के करीब पहुंचती है, तो 0.4% का चार्ज स्वीकार्य हो सकता है। लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, जयपुर, पटना, इंदौर और अहमदाबाद जैसे वाणिज्यिक केंद्रों के स्थानीय व्यापारी संघों ने भी यह मांग रखी है कि बैंकों को अपने सेटलमेंट सिस्टम को और अधिक तेज करना चाहिए ताकि वर्किंग कैपिटल का संकट न खड़ा हो।

पिछले कई सालों से देश के प्रमुख बैंक और प्रमुख फिनटेक कंपनियां जैसे PhonePe, Google Pay और Paytm ‘जीरो एमडीआर’ नीति को लेकर चिंता जता रहे थे। उनका तर्क था कि बिना किसी राजस्व मॉडल के अरबों रुपये के इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाए रखना असंभव होता जा रहा है। उद्योग निकायों ने वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के समक्ष कई बार प्रतिवेदन दिया था कि जब तक यूपीआई से न्यूनतम राजस्व नहीं मिलेगा, तब तक वे नए फीचर्स और सुरक्षा नवाचारों में निवेश नहीं कर पाएंगे।

सरकार के इस दृढ़ रुख से फिनटेक इकोसिस्टम में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है। अधिकारी के अनुसार, एक मजबूत और आत्मनिर्भर वित्तीय तंत्र ही भारत को वैश्विक स्तर पर फिनटेक लीडर बनाए रख सकता है। अब जब 0.4% एमडीआर का मार्ग प्रशस्त हो चुका है, तो निजी और सरकारी दोनों ही बैंकों को डिजिटल पेमेंट सेक्टर में अपने निवेश पर उचित रिटर्न मिलने की उम्मीद है, जिससे रोजगार और तकनीकी विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।

सीनियर सरकारी अधिकारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नीतिगत स्थिरता किसी भी बढ़ती अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती है। सरकार बार-बार नीतियों में बदलाव करके अनिश्चितता का माहौल नहीं बनाना चाहती। 0.4% एमडीआर का निर्णय कई दौर की समीक्षा बैठकों, बैंकिंग समिति की सिफारिशों और भविष्य के डिजिटल लेनदेन के अनुमानों के गहन अध्ययन के बाद लिया गया है।

सरकार का दीर्घकालिक लक्ष्य भारत के यूपीआई नेटवर्क को न केवल घरेलू स्तर पर विश्वस्तरीय बनाना है, बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पूरी ताकत से स्थापित करना है। इसके लिए आवश्यक है कि घरेलू नेटवर्क वित्तीय रूप से सशक्त हो। अधिकारी ने भरोसा जताया कि भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी परिपक्व हो चुकी है कि वह इस मामूली संरचनात्मक बदलाव को सहजता से स्वीकार कर लेगी, बिना डिजिटल लेन-देन की कुल गति को धीमा किए।