अमेरिका की नाक के नीचे क्यूबा पर महा-संकट,कभी US जिसके नाम से कांपता था, आज वह दाने-दाने को तरसा

अमेरिका के फ्लोरिडा तट से महज 90 मील की दूरी पर स्थित कैरेबियाई द्वीप क्यूबा की हालत इन दिनों बद से बदतर हो चुकी है। यह कम्युनिस्ट देश इस समय अपने इतिहास के सबसे काले और भीषण संकट के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ जहां पूरा देश भयंकर ऊर्जा संकट (Power Crisis) की चपेट में है, फैक्ट्रियां बंद हैं और लोग दाने-दाने को मोहताज हो चुके हैं; वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संभावित सैन्य कार्रवाई की धमकियों ने क्यूबा के वजूद पर ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।

चारों तरफ से घिरने के बाद अब क्यूबा ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का दरवाजा खटखटाया है। हालांकि, क्यूबा का इतिहास हमेशा से ऐसा लाचार नहीं था। एक वो दौर भी था जब महाशक्ति अमेरिका भी क्यूबा के नाम से थर-थर कांपता था और पूरी दुनिया में इस छोटे से द्वीप की तूती बोलती थी।

जब अमेरिका भी क्यूबा से डरता था: फिदेल कास्त्रो और 1962 का वो ‘मिसाइल संकट’

इतिहास गवाह है कि क्यूबा ने दशकों तक लैटिन अमेरिका से लेकर अफ्रीका तक अपना मजबूत राजनीतिक और सैन्य दबदबा कायम रखा था। क्यूबा के इस रसूख की शुरुआत साल 1959 की ऐतिहासिक क्रांति से हुई थी। इस दौरान फिदेल कास्त्रो और चे गेवेरा ने मिलकर क्यूबा में अमेरिका समर्थित बतिस्ता की क्रूर तानाशाही को उखाड़ फेंका और एक कट्टर कम्युनिस्ट सरकार की नींव रखी। अमेरिका की नाक के नीचे एक कम्युनिस्ट देश का उदय होना वाशिंगटन के लिए सबसे बड़ी रणनीतिक और कूटनीतिक दुर्घटना थी।

इसके बाद साल 1962 में वह ऐतिहासिक ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ आया, जिसने पूरी दुनिया को परमाणु युद्ध (Nuclear War) के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया था। यह क्यूबा के इतिहास का सबसे ताकतवर दौर था, जब सोवियत संघ (USSR) ने गुपचुप तरीके से क्यूबा की धरती पर अपनी परमाणु मिसाइलें तैनात कर दी थीं। तब अमेरिका सीधे क्यूबा पर हाथ डालने से डरता था। क्यूबा ने न केवल अमेरिका को दशकों तक खुली चुनौती दी, बल्कि अफ्रीका के कई क्रांतिकारी आंदोलनों में अपनी सेना भेजकर वैश्विक स्तर पर अपनी सैन्य ताकत का लोहा मनवाया था।

महाशक्ति का हमसाया कैसे बन गया कंगाल? सोवियत संघ के टूटते ही अनाथ हुआ क्यूबा

क्यूबा के पतन की शुरुआत तब हुई जब क्यूबा की क्रांति के पोस्टर बॉय चे गेवेरा लैटिन अमेरिका में समाजवाद की नई अलख जगाने बोलीविया पहुंचे। वहां उन्हें बंधक बना लिया गया और अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) की मदद से उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई। यह क्यूबा के वैश्विक प्रभाव के लिए एक बहुत बड़ा वैचारिक झटका था।

इसके बाद सबसे बड़ा झटका 1991 में लगा। दरअसल, क्यूबा की पूरी अर्थव्यवस्था और सैन्य मशीनरी सोवियत संघ की भारी वित्तीय मदद और बेहद सस्ते तेल पर टिकी हुई थी। साल 1991 में जैसे ही सोवियत संघ का विघटन हुआ, क्यूबा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पूरी तरह अनाथ हो गया। इसके बाद क्यूबा में जो दौर आया, उसे इतिहास में ‘स्पेशल पीरियड’ (Special Period) कहा जाता है। इस दौरान देश में ईंधन की भयंकर किल्लत हो गई, सामाजिक अशांति फैल गई और भुखमरी से तंग आकर लाखों लोग समुद्र के रास्ते देश छोड़कर अमेरिका भागने पर मजबूर हो गए।

30 साल पुराने विमान हादसे का बदला लेंगे ट्रंप? मंडरा रहा है तख्तापलट का खतरा

साल 1996 में क्यूबा ने अपनी हवाई सीमा का उल्लंघन करने वाले अमेरिका के दो छोटे विमानों को मार गिराया था। अब, करीब 30 साल बाद डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने इसी पुरानी घटना को ढाल बनाकर क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति राउल कास्त्रो के खिलाफ अदालती वारंट जारी कर दिया है। क्यूबा को अब यह डर सता रहा है कि वेनेजुएला में निकोलस मादुरो को सत्ता से बेदखल करने के बाद अब अमेरिका कोई भी बहाना बनाकर उस पर सीधा सैन्य हमला (US Military Attack) कर सकता है।

आज का क्यूबा इस स्थिति में बिल्कुल नहीं है कि वह 1962 की तरह अमेरिका से मुकाबला कर सके। वेनेजुएला में मचे राजनीतिक घमासान के कारण वहां से क्यूबा को होने वाली तेल की सप्लाई पूरी तरह ठप हो चुकी है, जिससे क्यूबा के पावर ग्रिड पूरी तरह बैठ गए हैं। पूरे देश में दिनों-दिन ब्लैकआउट (Blackout) रहना अब आम बात है, फैक्ट्रियां पूरी तरह ठप हैं और अस्पताल सिर्फ छोटे जनरेटरों के भरोसे सांसें गिन रहे हैं।

तबाही के कगार पर हवाना: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रो पड़े विदेश मंत्री

इसी खौफ और लाचारी के बीच क्यूबा ने दुनिया के सामने झोली फैलाई है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की आपातकालीन बैठक में मंगलवार को क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिग्ज पारिला ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से क्यूबा को इस भीषण मानवीय त्रासदी से बचाने के लिए तत्काल कूटनीतिक और आर्थिक मदद की गुहार लगाई।

क्यूबा के विदेश मंत्री ने वैश्विक मंच से बेहद भावुक अपील करते हुए कहा, “मैं अंतरराष्ट्रीय समुदाय से प्रार्थना करता हूं कि इस मानवीय आपदा को रोकने के लिए तुरंत एकजुट हो। यह क्यूबा के निर्दोष लोगों के साथ एकजुटता दिखाने का समय है।” दरअसल, क्यूबा की यह छटपटाहट बेवजह नहीं है; अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस कम्युनिस्ट देश में तख्तापलट करने की अपनी इच्छा को सरेआम जाहिर कर चुके हैं। ट्रंप ने खुले तौर पर चेतावनी दी है कि वेनेजुएला के बाद अब क्यूबा की राजधानी हवाना उनका अगला सैन्य टारगेट है, जिसने कैरेबियाई क्षेत्र में युद्ध की आहट तेज कर दी है।