
वैश्विक महाशक्तियों के आपसी समीकरण और भू-राजनीति (Geopolitics) में एक ऐसा हैरान कर देने वाला मोड़ आया है, जिसकी कुछ साल पहले तक कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। इतिहास ने एक ऐसा यू-टर्न लिया है जिसने पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। जिस सोवियत संघ (अब रूस) को कभी तालिबान ने अपना सबसे बड़ा दुश्मन माना और जिसके खिलाफ दशकों तक खूनी गुरिल्ला जंग लड़ी, आज उसी रूस को तालिबान ने अपना नया रणनीतिक साझेदार बना लिया है। दोनों पक्षों के बीच बीते 27 मई 2026 को एक बेहद ऐतिहासिक रक्षा-सहयोग समझौता हुआ है। इस बड़े बदलाव के पीछे पड़ोसी देश पाकिस्तान की अमेरिका परस्त नीतियां और अफगान शहरों पर हुए सैन्य हमले बड़ी वजह बनकर उभरे हैं, जिसने काबुल को मॉस्को के पाले में जाने के लिए मजबूर कर दिया।
पाकिस्तान और अमेरिका के चक्रव्यूह से घिरे तालिबान ने चला रूस का बड़ा कार्ड
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच पिछले कुछ महीनों से राजनयिक और सैन्य तनाव अपने चरम पर पहुंच चुका है। इस साल फरवरी में पाकिस्तान ने काबुल और कंधार सहित कई प्रमुख अफगान शहरों पर ताबड़तोड़ सैन्य और हवाई हमले किए थे, जिसके बाद से दोनों पड़ोसी देशों के रिश्ते इतिहास के सबसे निचले स्तर पर चले गए। इस विवाद में नया मोड़ तब आया जब अमेरिका ने पाकिस्तान के इन हमलों का खुलकर समर्थन किया और इसे पाकिस्तान का ‘आत्मरक्षा का अधिकार’ करार दिया। पाकिस्तान की इस कार्रवाई और वाशिंगटन के दोहरे रवैये को भांपते हुए तालिबान ने अपनी सुरक्षा के लिए नया रास्ता चुना। तालिबान को समझ आ गया कि यदि पाकिस्तान को अमेरिका का निरंतर समर्थन मिलता रहा, तो उसे अपनी संप्रभुता बचाने के लिए मॉस्को की ताकत की जरूरत पड़ेगी।
सीक्रेट डिफेंस डील: रूसी हथियारों और अमेरिका काल के हेलीकॉप्टरों को अपग्रेड करेगा मॉस्को
हालांकि 27 मई को हुए इस हाई-प्रोफाइल समझौते के सभी गुप्त विवरणों को सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन दोनों देशों ने इसे मुख्य रूप से एक तकनीकी-सैन्य सहयोग ढांचा बताया है। इसके तहत अफगानिस्तान में मौजूद सोवियत और रूसी मूल के भारी सैन्य उपकरणों, बख्तरबंद गाड़ियों और लड़ाकू विमानों की मरम्मत, रखरखाव और उन्हें फिर से संचालित करने का काम रूसी सैन्य विशेषज्ञ करेंगे। इस बेड़े में सबसे खास बात यह है कि इसमें अमेरिकी और नाटो (NATO) सेना द्वारा पूर्ववर्ती अफगान वायुसेना को दिए गए Mi-17 हेलीकॉप्टर भी शामिल हैं, जो 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के बाद तालिबान के कब्जे में आ गए थे। इस ऐतिहासिक समझौते पर अफगानिस्तान के रक्षा मंत्री मौलवी मोहम्मद याकूब मुजाहिद और रूस की सुरक्षा परिषद के सचिव सर्गेई शोइगु ने हस्ताक्षर किए हैं।
तालिबान के पास मौजूद है रूसी शस्त्रागार का विशाल जखीरा, शोइगु ने की कोशिशों की तारीफ
साल 2021 में जब अफ़ग़ान गणराज्य का पतन हुआ, तो अमेरिकी हथियारों के साथ-साथ सोवियत काल के हथियारों का एक बहुत बड़ा भंडार तालिबान के नियंत्रण में आ गया था। रूस के विशेष दूत जमीर काबुलोव के एक हालिया बयान के अनुसार, वर्तमान में तालिबान के schस्त्रागार में 100 से अधिक Mi-17 हेलीकॉप्टर और हजारों कामाज (Kamaz) ट्रक व बख्तरबंद गाड़ियां मौजूद हैं, जिनकी रीढ़ अब रूस के तकनीकी सहयोग से मजबूत होगी। समझौते के दौरान सर्गेई शोइगु ने स्पष्ट कहा कि रूस, अफगानिस्तान को एक स्वतंत्र, स्थिर और शांतिपूर्ण राष्ट्र के रूप में देखना चाहता है और आतंकवाद व ड्रग्स तस्करी के खिलाफ तालिबान के कड़े प्रयासों की सराहना करता है।
मॉस्को हमला और ISKP: दोनों शक्तियों को करीब लाया यह एक ‘साझा दुश्मन’
रूस और तालिबान के इस कूटनीतिक मिलन के पीछे केवल पाकिस्तान और अमेरिका का डर ही नहीं, बल्कि एक खतरनाक साझा दुश्मन भी है—इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रांत (ISKP)। साल 2024 में इसी आतंकी संगठन ISKP ने मॉस्को के क्रोकस सिटी हॉल पर बर्बर हमला किया था, जिसमें 151 बेकसूर रूसी नागरिक मारे गए थे। वहीं दूसरी तरफ, तालिबान भी अफगानिस्तान में अपने शासन और स्थिरता के लिए ISKP को सबसे बड़ा आंतरिक खतरा मानता है। रूस साल 2017 से ही इस आतंकी संगठन के खिलाफ तालिबान को खुफिया जानकारियां और रणनीतिक मदद मुहैया करा रहा है। यही वजह है कि साल 2025 में रूस ने एक बड़ा कदम उठाते हुए तालिबान शासन को औपचारिक रूप से राजनयिक मान्यता देने वाले दुनिया के पहले देशों की सूची में खुद को शामिल कर लिया था। क्षेत्रीय राजनीतिक विश्लेषक अब्दुल बसीर बसीरत का मानना है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में अपनी सुरक्षा और साझा हितों की रक्षा के लिए तालिबान का यह कदम बेहद आवश्यक है।
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