Supreme Court on Abusive Language: किसी को गाली देना या अपशब्द कहना कब बनता है गंभीर अपराध? सुप्रीम कोर्ट का आया बड़ा और ऐतिहासिक फैसला

नई दिल्ली/लखनऊ। हमारे समाज और रोजमर्रा के जीवन में कई बार आपसी विवाद या गुस्से में लोग एक-दूसरे के खिलाफ अपशब्दों या गाली-गलौज का इस्तेमाल कर बैठते हैं। अक्सर लोग इसे एक सामान्य बहस मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन अब ऐसा करना भारी कानूनी मुसीबत में डाल सकता है। टीवी9 हिंदी की एक विशेष कानूनी रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने अपशब्दों और अपमानजनक भाषा (Abusive Language) के इस्तेमाल को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ किया है कि किसी को भी सार्वजनिक या व्यक्तिगत रूप से गाली देना कब और किन परिस्थितियों में एक गंभीर और दंडनीय अपराध (Punishable Offense) की श्रेणी में आ जाता है। कानून की समझ रखने वाले हर नागरिक के लिए देश की सर्वोच्च अदालत की यह गाइडलाइन जानना बेहद जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या: केवल गाली देना ही अपराध नहीं, बल्कि ‘इरादा’ है अहम

जस्टिस की पीठ ने इस मामले की गहन कानूनी व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी बहस में केवल अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल हो जाना ही सीधे तौर पर एफआईआर (FIR) या आपराधिक मुकदमे का आधार नहीं बन सकता। इसके लिए कानून में कुछ खास शर्तें और इरादे का होना अनिवार्य है:

  • शांति भंग करने का स्पष्ट उद्देश्य: कोर्ट के मुताबिक, अपशब्द इस तरह और ऐसे इरादे से कहे गए हों जिससे सामने वाले व्यक्ति को उकसाया (Provoke) जा सके, ताकि वह सार्वजनिक शांति को भंग करे या कोई अन्य अपराध करने के लिए मजबूर हो जाए।

  • अपमान की गंभीरता: कहे गए शब्द केवल मामूली नाराजगी वाले न होकर इतने गंभीर होने चाहिए जो किसी भी सामान्य व्यक्ति के आत्मसम्मान और गरिमा को ठेस पहुंचाएं और उसे कानून हाथ में लेने पर विवश कर दें।

नए कानून (BNS) के तहत क्या हैं सजा के प्रावधान?

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि भारतीय न्याय प्रणाली में हुए बदलावों के बाद अब ये मामले भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के तहत संचालित होते हैं:

  1. धारा 352 (BNS) – जानबूझकर अपमान करना: यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को जानबूझकर अपमानित करने के इरादे से गाली-गलौज करता है और उसे उकसाता है, तो यह कानूनन अपराध है। इसके तहत दोषी पाए जाने पर 2 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है।

  2. धारा 351 (BNS) – आपराधिक धमकी: यदि अपशब्दों के साथ-साथ सामने वाले को जान से मारने या शारीरिक नुकसान पहुंचाने की धमकी भी दी जाती है, तो यह मामला और गंभीर हो जाता है, जिसमें कड़ी सजा का प्रावधान है।

आम जनता के लिए कोर्ट का बड़ा संदेश और कानूनी उपाय

टीवी9 हिंदी की रिपोर्ट में कानूनी विशेषज्ञों के हवाले से बताया गया है कि इस फैसले का मुख्य उद्देश्य अदालतों में आने वाले मामूली और आपसी बोलचाल के छोटे-मोटे मुकदमों के बोझ को कम करना है, साथ ही नागरिकों को अपनी भाषा की मर्यादा के प्रति सचेत करना भी है।

अदालत ने साफ किया कि अगर दो लोगों के बीच सामान्य कहासुनी हुई है जिसमें बिना किसी दुर्भावना या गंभीर उकसावे के अपशब्द निकल गए हैं, तो उस पर सीधे आपराधिक मुकदमा चलाना कानून का दुरुपयोग होगा। लेकिन, यदि कोई जानबूझकर किसी को प्रताड़ित करने, नीचा दिखाने या दंगा भड़काने के इरादे से अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करता है, तो कानून उसे कतई नहीं बख्शेगा। इस लैंडमार्क जजमेंट के बाद अब पुलिस और निचली अदालतों को भी गाली-गलौज से जुड़े मामलों में एफआईआर दर्ज करने से पहले इन तय मानकों और ‘अपराधिक इरादे’ की बारीकी से जांच करनी होगी।