सोमनाथ मंदिर और नेहरू: क्यों 75 साल पहले उद्घाटन समारोह से दूर रहे थे देश के पहले PM?

नई दिल्ली। भारत की सांस्कृतिक विरासत में सोमनाथ मंदिर का स्थान बेहद अद्वितीय है। 11 मई, 1951 का दिन आजाद भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, जब सोमनाथ मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा का भव्य कार्यक्रम हुआ था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस ऐतिहासिक पल से देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने खुद को पूरी तरह अलग रखा था? आज इस घटना के 75 साल पूरे होने पर ‘सोमनाथ अमृत महोत्सव’ मनाया जा रहा है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल हो रहे हैं। आइए जानते हैं आखिर नेहरू और सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर क्या विवाद था।

सरदार पटेल का संकल्प और नेहरू की ‘असहजता’

9 नवंबर, 1947 को जब जूनागढ़ रियासत का भारत में विलय हुआ, तब तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के खंडहरों को देखकर इसे फिर से भव्य रूप देने का संकल्प लिया था। सरदार पटेल के इस ऐलान ने पंडित नेहरू को असहज कर दिया था। नेहरू का मानना था कि सरकारी स्तर पर किसी धार्मिक ढांचे का निर्माण भारत की ‘सेक्यूलर’ छवि को वैश्विक स्तर पर नुकसान पहुंचा सकता है। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री एन.वी. गाडगिल ने अपनी किताब ‘गवर्नमेंट फ्रॉम इनसाइड’ में नेहरू की इस नाराजगी का विस्तार से जिक्र किया है।

गांधी जी का सुझाव और ‘हिंदू पुनरुत्थानवाद’ का डर

महात्मा गांधी सरदार पटेल के विचार से सहमत थे, लेकिन उनका एक विशेष आग्रह था। बापू चाहते थे कि मंदिर का निर्माण सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि जनता के दान से होना चाहिए। गांधी जी की हत्या और सरदार पटेल के निधन के बाद इस कार्य का जिम्मा कन्हैयालाल माणिकलाल (के.एम.) मुंशी ने संभाला। के.एम. मुंशी ने अपनी पुस्तक ‘पिलग्रिमेज टू फ्रीडम’ में लिखा है कि नेहरू ने उनसे स्पष्ट कहा था कि वह सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से खुश नहीं हैं, क्योंकि उन्हें यह ‘हिंदू पुनरुत्थानवाद’ (Hindu Revivalism) जैसा लग रहा था।

राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को भी नेहरू ने दी थी सलाह

नेहरू की असहमति इतनी गहरी थी कि जब उन्हें उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया गया, तो उन्होंने न केवल जाने से इनकार किया, बल्कि तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भी वहां न जाने की सलाह दी। नेहरू का तर्क था कि भारत को गरीबी और भुखमरी मिटाने जैसे आधुनिक लक्ष्यों पर ध्यान देना चाहिए, न कि धार्मिक प्रोजेक्ट्स पर। उन्हें डर था कि पाकिस्तान इसका इस्तेमाल भारत के अल्पसंख्यकों को डराने के लिए कर सकता है। हालांकि, राजेंद्र बाबू नेहरू की सलाह के बावजूद 11 मई, 1951 को सोमनाथ पहुंचे और मंदिर का उद्घाटन किया।

धर्मनिरपेक्ष छवि और अंतरराष्ट्रीय जगत का दबाव

नेहरू अपनी आधुनिक और पंथनिरपेक्ष छवि को लेकर बहुत सतर्क थे। उन्होंने कई देशों के राजदूतों को पत्र लिखकर स्पष्ट किया था कि सोमनाथ मंदिर के निर्माण में भारत सरकार का कोई हाथ नहीं है। उनका मानना था कि नए बांध, उद्योग और फैक्ट्रियां ही आधुनिक भारत के ‘मंदिर’ होने चाहिए। आज 75 साल बाद, जब पीएम मोदी सोमनाथ में जलाभिषेक कर रहे हैं, तो नेहरू का वह विरोध एक बार फिर इतिहास के पन्नों में चर्चा का विषय बन गया है।