
देश के लोकतांत्रिक ढांचे और निर्वाचन प्रक्रिया की शुचिता को लेकर राष्ट्रीय राजनीति में एक बहुत बड़ा संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है। मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर (SIR) अभियान को लेकर चुनाव आयोग के भीतर उपजे गहरे आंतरिक मतभेदों के सार्वजनिक होने के बाद कांग्रेस पार्टी ने बेहद आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद के दोनों सदनों में औपचारिक महाभियोग प्रस्ताव लाने की ठोस तैयारी शुरू कर दी है और इसके लिए संसद में मौजूद तमाम विपक्षी दलों से उच्च स्तरीय संपर्क साधा है। विपक्षी खेमे का आरोप है कि निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पूरी तरह से संदिग्ध हो चुकी है और मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने साथी चुनाव आयुक्तों को अंधेरे में रखकर एकतरफा और असंवैधानिक निर्णय लिए हैं।
समाचार एजेंसी एएनआई (ANI) और पार्टी सूत्रों के अनुसार, विपक्षी दल संसद के आगामी सत्र के दौरान या नियमों के तहत अगले दो सप्ताह के भीतर लोकसभा और राज्यसभा में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग का औपचारिक नोटिस प्रस्तुत करेंगे। कांग्रेस संसदीय दल ने इस गंभीर कदम को उठाने से पहले विपक्षी गठबंधन के तमाम घटक दलों से विस्तृत विचार-विमर्श किया है ताकि इस प्रस्ताव को सदन के पटल पर पूरे विपक्ष का संयुक्त समर्थन मिल सके। केवल विधायी स्तर पर ही नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे को सीधे जनता की अदालत में ले जाने की भी व्यापक रणनीति बना चुकी है। पार्टी आलाकमान ने अपनी सभी प्रदेश कांग्रेस कमेटियों और राज्य इकाइयों को सख्त निर्देश जारी किए हैं कि वे 25 सितंबर को अपने-अपने राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालयों तक विशाल विरोध मार्च निकालें। कांग्रेस की मांग है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल उनके संवैधानिक पद से हटाया जाए और पूरे मामले की निष्पक्ष आपराधिक और प्रशासनिक जांच कराई जाए।
इस पूरे सियासी बवंडर की शुरुआत प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक विस्फोटक खोजी रिपोर्ट से हुई, जिसने चुनाव आयोग के बंद कमरों में चल रही खींचतान की परतें खोलकर रख दीं। रिपोर्ट में पुख्ता प्रशासनिक दस्तावेजों के हवाले से खुलासा किया गया कि तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग में शामिल चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार आधिकारिक रूप से कड़े विरोध पत्र दर्ज कराए थे। हैरानी की बात यह रही कि इनमें से चार गंभीर आपत्तियां तो महज एक ही दिन में दर्ज कराई गई थीं। दोनों वरिष्ठ चुनाव आयुक्तों ने आधिकारिक तौर पर लिखा था कि मतदाता सूची संशोधन, प्रशासनिक नियुक्तियों और नीतिगत निर्देशों से जुड़े कई अहम फैसले उनकी जानकारी या सहमति के बिना एकतरफा रूप से लिए गए और उन्हें जारी कर दिया गया। इस खुलासे के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं; जहां विपक्ष इसे लोकतंत्र पर सीधा आघात बता रहा है, वहीं भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि किसी भी बहु-सदस्यीय संस्था में विभिन्न विचारों का होना एक स्वस्थ लोकतंत्र का स्वाभाविक प्रमाण है।
रिपोर्ट में सामने आया है कि विवाद की सबसे बड़ी जड़ नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े ‘फॉर्म-6’ में किया गया अप्रत्याशित फेरबदल था। नए नियमों के तहत आवेदन करने वाले मतदाताओं से उनके पिता और दादा के वोटर लिस्ट की विस्तृत जानकारी मांगी गई थी। दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस पर सख्त तकनीकी और विधिक आपत्ति जताते हुए कहा था कि चुनाव पंजीकरण नियमों या फॉर्म में ऐसा कोई भी बदलाव केवल तभी वैध माना जा सकता है जब केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय की ओर से आधिकारिक राजपत्र (गजट) में बाकायदा संशोधन अधिसूचित किया जाए। दूसरा सबसे गंभीर विवाद निर्वाचन आयोग के नए एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘ईसीआई नेट’ (ECINet) और ‘ईआरओ नेट’ (ERONet) के केंद्रीकरण को लेकर उठा। आरोप है कि इस सॉफ्टवेयर को पूरी तरह से केंद्रीकृत करके जमीनी स्तर पर चुनावी प्रक्रिया का संचालन करने वाले इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (ERO) और असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (AERO) के अधिकार सीमित कर दिए गए, जिससे निचले स्तर पर पारदर्शिता प्रभावित हुई और गोवा समेत कई राज्यों में तकनीकी व्यवधान की स्थिति बनी। इसके अलावा दोनों चुनाव आयुक्तों ने आयोग के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी मनीष गर्ग के कामकाज और कार्य विभाजन को लेकर सीधे कैबिनेट सचिव से भी शिकायत दर्ज कराई थी।
आयोग के अंदरूनी मतभेदों और एकतरफा फैसलों की खबरें सुर्खियां बनने के बाद निर्वाचन आयोग ने आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपनी विस्तृत सफाई दी है। आयोग ने कहा कि एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय के रूप में विभिन्न नीतिगत विषयों पर अलग-अलग राय या मतभिन्नता होना कोई असामान्य बात नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र विचार-विमर्श का हिस्सा है। आयोग ने दावा किया कि हाल के महीनों में देश भर में शुरू किए गए एसआईआर अभियान सहित कुल 40 नई नीतिगत और तकनीकी पहलों को पूर्ण सर्वसम्मति से ही अंतिम रूप दिया गया था। फॉर्म-6 के विवाद पर आयोग के सूत्रों ने स्पष्ट किया कि मूल फॉर्म में कोई कानूनी बदलाव नहीं किया गया था, बल्कि सत्यापन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए केवल एक अतिरिक्त घोषणापत्र संलग्न किया गया था। वहीं ईसीआई नेट के केंद्रीकरण पर आयोग ने तर्क दिया कि यह कदम अनधिकृत डेटा छेड़छाड़ को रोकने और कड़े राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करने के उद्देश्य से उठाया गया था, ताकि चुनावी डेटाबेस पूरी तरह सुरक्षित रह सके। आयोग ने यह भी याद दिलाया कि देश में एसआईआर की प्रक्रिया कोई पहली बार नहीं अपनाई जा रही है बल्कि यह इससे पहले भी नौ बार सफलतापूर्वक आयोजित की जा चुकी है और मई 2026 में देश की सर्वोच्च अदालत ने भी एसआईआर की निष्पक्षता और संवैधानिक वैधता की समीक्षा कर इसे पूरी तरह सही ठहराया था।
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