
पर्दे पर किसी भी किरदार को इस तरह जीना कि दर्शक उसे सच मान बैठें, हर कलाकार के बस की बात नहीं होती। खासकर जब किरदार भावनात्मक रूप से थका देने वाला या बेहद गंभीर (इंटेंस) हो, तो चुनौती और बढ़ जाती है। बॉलीवुड और साउथ सिनेमा में अपनी दमदार एक्टिंग के लिए पहचान बना रहीं अभिनेत्री शीना चौहान के अभिनय में यही खास बात दिखती है। शीना का मानना है कि अभिनय का मतलब सिर्फ रटे-रटाए संवाद बोलना नहीं है, बल्कि उस किरदार के सुख-दुख और उसकी पूरी मानसिक यात्रा को खुद के भीतर महसूस करना है। यही वजह है कि वह हर रोल को निभाने के लिए खुद को मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से पूरी तरह झोंक देती हैं।
जब तक किरदार की आत्मा को न छू लूं, तब तक चैन नहीं मिलता
अपने काम के प्रति बेहद संजीदा रहने वाली शीना चौहान ने अपनी एक्टिंग प्रोसेस को लेकर खुलकर बात की है। उनका कहना है कि जैसे ही वह किसी स्क्रिप्ट को पढ़कर फिल्म के लिए हामी भरती हैं, उसी सेकंड से उनके दिमाग में वह किरदार अपनी जगह बनाने लगता है। वह सीधे सेट पर जाकर एक्टिंग करने में यकीन नहीं रखतीं, बल्कि उससे पहले उस किरदार की पूरी बैकस्टोरी और उसकी दुनिया को समझने में हफ्तों का समय बिताती हैं ताकि डायरेक्टर ने जो सपना देखा है, उसे पर्दे पर सच किया जा सके।
गांव की चौपाल से लेकर बांद्रा के चर्च तक: जमीन पर उतरकर की तैयारी
शीना की इस कड़ी मेहनत का अंदाजा आप उनके कुछ किरदारों से लगा सकते हैं। फिल्म ‘संत तुकाराम’ में ‘अवली’ का बेहद चुनौतीपूर्ण रोल निभाने के लिए शीना ने चकाचौंध से दूर सीधे गांवों का रुख किया। वहां उन्होंने आम ग्रामीण महिलाओं के साथ वक्त बिताया, उनके बात करने के लहजे को समझा, उनके रोजमर्रा के संघर्षों और उनकी भावनाओं को बहुत करीब से महसूस किया।
इसी तरह, जब उन्हें डिज्नी+ हॉटस्टार की मशहूर वेब सीरीज ‘द ट्रायल’ में काजोल के साथ एक ईसाई लड़की की भूमिका निभानी थी, तो वह मुंबई के बांद्रा इलाके के अलग-अलग चर्चों में जाकर घंटों बैठी रहीं। वहां उन्होंने लोगों के उठने-बैठने, प्रार्थना करने के तौर-तरीकों और उनके कल्चर को बारीकी से नोटिस किया। वहीं अपनी आने वाली बहुप्रतीक्षित साउथ इंडियन फिल्म ‘JMD’ में एक कड़क पुलिस अधिकारी का रोल निभाने के लिए शीना ने एक रियल लाइफ महिला पुलिस अफसर के साथ काफी समय गुजारा, ताकि वह खाकी वर्दी के अनुशासन, ड्यूटी के भारी दबाव और उनकी बॉडी लैंग्वेज को पूरी सच्चाई के साथ पर्दे पर उतार सकें।
इंटेंस सीन से पहले सोशल मीडिया से बना लेती हैं दूरी
अपनी इस अनोखी अभिनय प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए शीना कहती हैं कि जब वह किसी बहुत ज्यादा इमोशनल या सीरियस रोल पर काम कर रही होती हैं, तो वह बाहरी दुनिया से अपना संपर्क पूरी तरह काट लेती हैं। वह इस दौरान सोशल मीडिया का इस्तेमाल बंद कर देती हैं और किसी भी तरह के फालतू के शोर-शराबे या पार्टियों से दूर रहती हैं। उनका मानना है कि खुद को शांत और एकांत में रखकर ही उस किरदार के दर्द या गुस्से को भीतर जगाया जा सकता है। तैयारी का मतलब सिर्फ किरदार जैसे कपड़े पहनना या मेकअप करना नहीं है, बल्कि उसकी रूह को महसूस करना है।
जब फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं, जिम्मेदारी बन जाती हैं
शीना के मुताबिक, स्क्रीन पर किसी गहरे और संवेदनशील इंसान का रोल प्ले करना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी का काम है। वह कहती हैं कि कोई भी फिल्म सिर्फ एक इंसान की नहीं, बल्कि पूरी टीम का एक सामूहिक सपना होती है। एक सच्चे एक्टर के तौर पर हमारा फर्ज है कि हम डायरेक्टर की सोच के साथ पूरा इंसाफ करें। असली जादू तब होता है जब थियेटर में बैठा दर्शक वही दर्द या खुशी महसूस करने लगे, जो स्क्रीन पर चल रहा किरदार महसूस कर रहा है। शीना चौहान का यह समर्पण साफ दिखाता है कि बेहतरीन और यादगार अभिनय सिर्फ गॉड-गिफ्टेड टैलेंट से नहीं, बल्कि कड़े अनुशासन, कड़ी मेहनत और अपने काम के प्रति बेइंतहा मोहब्बत से पैदा होता है।
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