RBI Financial Stability Report 2026: भारतीय बीमा सेक्टर में बड़ा संकट! मैच्योरिटी से ज्यादा लोग बीच में ही सरेंडर कर रहे हैं लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी; जानें चौंकाने वाली वजहें

भारत में लाइफ इंश्योरेंस (जीवन बीमा) को हमेशा से भविष्य की वित्तीय सुरक्षा का सबसे भरोसेमंद और सुरक्षित साधन माना जाता रहा है। लेकिन हाल के दिनों में देश के इंश्योरेंस सेक्टर में एक बेहद हैरान करने वाला और चिंताजनक ट्रेंड सामने आया है। बड़ी संख्या में लोग अपनी बीमा पॉलिसी को उसकी मैच्योरिटी (अवधि पूरी होने) से पहले ही बंद यानी सरेंडर कर रहे हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ताजा फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट 2026 (FSR 2026) के आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2025-26 में बीमा कंपनियों ने मैच्योरिटी पर जितना कुल भुगतान किया, उससे कहीं अधिक रकम लोगों ने पॉलिसी को बीच में ही सरेंडर करके और आंशिक निकासी (Withdrawal) के रूप में कंपनियों से वापस निकाल ली। विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्थिति ग्राहकों के असंतोष, गलत तरीके से पॉलिसी बेचने (Mis-selling) और अवास्तविक उम्मीदों का सीधा परिणाम है।

RBI की रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़े (FY 2025-26)

केंद्रीय बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) में लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों द्वारा किए गए कुल क्लेम सेटलमेंट और भुगतानों का गणित पूरी तरह बदल गया है:

भुगतान का प्रकार (Payout Type) कुल भुगतान में हिस्सेदारी (Share %)
पॉलिसी सरेंडर और निकासी (Surrender & Withdrawal) 38.3%
मैच्योरिटी बेनिफिट (Maturity Benefit) 36.9%

आरबीआई ने इस ट्रेंड पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि लगातार बढ़ती सरेंडर दर (Surrender Rate) इस बात का साफ इशारा है कि या तो ग्राहक अपने इंश्योरेंस प्रॉडक्ट से संतुष्ट नहीं हैं, या उन्हें पॉलिसी बेचते समय सही और पारदर्शी जानकारी नहीं दी गई, अथवा वे बाजार में मौजूद अन्य आकर्षक निवेश विकल्पों (जैसे म्यूचुअल फंड या इक्विटी) की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं।

हर दो में से एक ग्राहक 5 साल से पहले तोड़ देता है दम; IRDAI की रिपोर्ट

बीमा नियामक आईआरडीएआई (IRDAI) के आंकड़े इस संकट की गंभीरता को और बढ़ा देते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में केवल करीब आधी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसियां ही अपने 5 साल (60 महीने) का सफर पूरा कर पाती हैं। इसका मतलब है कि देश का हर दूसरा पॉलिसीधारक अपनी पॉलिसी की पांचवीं वर्षगांठ आने से पहले ही या तो प्रीमियम भरना बंद कर देता है या भारी नुकसान उठाकर पॉलिसी सरेंडर कर देता है।

वित्त वर्ष 2024-25 (FY25) में देश की प्रमुख निजी बीमा कंपनियों के 61वें महीने के पर्सिस्टेंसी रेशियो (Persistency Ratio – ग्राहकों के टिके रहने की दर) के आंकड़े कुछ इस प्रकार रहे:

आखिर मैच्योरिटी से पहले क्यों दम तोड़ रही हैं पॉलिसियां? (मुख्य कारण)

  1. सुरक्षा के बदले ‘रिटर्न’ का लालच (Mis-selling): ‘इंश्योरेंस समाधान’ की सीओओ शिल्पा अरोड़ा के अनुसार, लाइफ इंश्योरेंस को अक्सर सुरक्षा (Protection) के बजाय एक शुद्ध निवेश उत्पाद (Investment Product) की तरह आक्रामक रूप से बेचा जाता है। ग्राहकों को मैच्योरिटी पर मिलने वाले भारी रिटर्न का सपना दिखाया जाता है, जबकि उन्हें यह नहीं समझाया जाता कि यह मूल रूप से लंबी अवधि की वित्तीय सुरक्षा के लिए बनाया गया साधन है।

  2. ग्राहकों के भरोसे में भारी कमी: ‘1 फाइनेंस’ की पार्टनर मंजू ढाके का मानना है कि इतनी ऊंची सरेंडर दर सीधे तौर पर ग्राहकों के भरोसे में कमी को दर्शाती है। जब लोग शुरुआती 2-3 वर्षों में ही पॉलिसी छोड़ते हैं, तो साफ है कि उन्हें वह उत्पाद नहीं मिला जिसकी एजेंट द्वारा उम्मीद जगाई गई थी।

  3. बदलती आर्थिक प्राथमिकताएं और इमरजेंसी: कोटक लाइफ इंश्योरेंस के चीफ डिस्ट्रीब्यूशन ऑफिसर पीयूष त्रिवेदी के मुताबिक, हर मामले में मिस-सेलिंग ही जिम्मेदार नहीं होती। कई बार जीवन में अचानक आई मेडिकल इमरजेंसी, नौकरी छूटना, बच्चों की उच्च शिक्षा, अचानक नकदी की जरूरत या भारी कर्ज चुकाने जैसी बदलती परिस्थितियों के कारण भी लोग विवश होकर पॉलिसी बंद कर देते हैं।

कंपनियों को भी दोहरा झटका: जल्दी पॉलिसी बंद होने से सिर्फ ग्राहकों का ही पैसा नहीं डूबता, बल्कि बीमा कंपनियों को भी भारी वित्तीय नुकसान होता है। नए नियामक नियमों के तहत कंपनियों को एजेंटों और बैंकों को शुरुआती कमीशन ज्यादा देना पड़ता है। ऐसे में अगर ग्राहक कुछ ही वर्षों में पॉलिसी छोड़ देता है, तो कंपनियों की ऑपरेशनल लागत (Cost) बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।

नई पॉलिसी खरीदने से पहले इन 4 बातों का रखें विशेष ध्यान

यदि आप भी अपने या परिवार के लिए नई लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी लेने का विचार कर रहे हैं, तो विशेषज्ञों द्वारा सुझाई गई इन बातों को गांठ बांध लें:

  • उद्देश्य साफ रखें: सबसे पहले यह समझें कि इंश्योरेंस निवेश नहीं, बल्कि जोखिम से सुरक्षा का माध्यम है। निवेश के लिए म्यूचुअल फंड या पीपीएफ (PPF) जैसे विकल्प बेहतर हैं।

  • पर्सिस्टेंसी रेशियो जरूर जांचें: पॉलिसी लेने से पहले उस कंपनी का पर्सिस्टेंसी रेशियो जरूर देखें। यह रेशियो जितना अधिक होगा, इसका मतलब है कि उस कंपनी के ग्राहक उतने ही लंबे समय तक जुड़े रहते हैं और संतुष्ट हैं।

  • नियम और शर्तें पढ़ें: प्रीमियम भरने की कुल अवधि, लॉक-इन पीरियड और बीच में पॉलिसी छोड़ने पर मिलने वाली ‘सरेंडर वैल्यू’ के नियमों को एजेंट के भरोसे छोड़ने के बजाय खुद दस्तावेज में अच्छी तरह पढ़ें।

  • अवास्तविक रिटर्न से बचें: यदि कोई एजेंट आपको 3 से 4 साल में पैसा दोगुना करने या गारंटीड असाधारण रिटर्न का दावा करता है, तो तुरंत सतर्क हो जाएं।

बीमा उद्योग के जानकारों का मानना है कि अब समय आ गया है जब इंश्योरेंस कंपनियों को सिर्फ नए टारगेट और पॉलिसियां बेचने के पीछे भागने के बजाय, ग्राहकों को उनकी वास्तविक जरूरत के हिसाब से सही सलाह देने और पूरी पारदर्शिता बरतने पर ध्यान केंद्रित करना होगा।