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RBI की राज्यों को दो टूक: ‘सोच-समझकर लें कर्ज, खर्च की गुणवत्ता सुधारें और DBT में लाएं डिजिटल रुपया’

देश की समग्र अर्थव्यवस्था को मजबूती देने और राज्यों के वित्तीय स्वास्थ्य को दीर्घकालिक रूप से सुरक्षित रखने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने राज्य सरकारों को कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है। मुंबई स्थित केंद्रीय बैंक के मुख्यालय में आयोजित राज्य वित्त सचिवों के 36वें सम्मेलन (36th Conference of State Finance Secretaries) को संबोधित करते हुए आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने राज्यों को आगाह किया कि वे केवल राजनीतिक या अल्पकालिक लोकलुभावन प्राथमिकताओं के लिए अंधाधुंध बाजार से कर्ज उठाने से बचें। सम्मेलन में देश के 27 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों के वित्त सचिवों के अलावा केंद्रीय वित्त मंत्रालय, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) और महालेखा नियंत्रक (CGA) के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। आरबीआई ने दो टूक शब्दों में रेखांकित किया कि बढ़ता हुआ राजकोषीय घाटा और अनियंत्रित ऋण राज्यों की आने वाली पीढ़ियों पर भारी वित्तीय बोझ डाल सकता है, इसलिए राज्यों को अपने कर्ज, नकदी प्रवाह और खर्च करने के तौर-तरीकों में तुरंत व्यापक सुधार लाने की जरूरत है।

आरबीआई गवर्नर ने इस बात पर विशेष बल दिया कि वित्तीय प्रबंधन में सिर्फ यह मायने नहीं रखता कि राज्य कितना पैसा खर्च कर रहे हैं, बल्कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि उस खर्च की ‘गुणवत्ता’ (Quality of Expenditure) क्या है। आमतौर पर यह देखा जाता है कि कई राज्य सरकारें अपने राजस्व का एक बड़ा हिस्सा गैर-उत्पादक सब्सिडी, चालू खर्चों और मुफ्त की रेवड़ियों में खपा देती हैं, जिससे सड़कें, स्कूल, अस्पताल, एक्सप्रेसवे और सिंचाई जैसी बुनियादी ढांचागत (Capital Capex) परियोजनाओं के लिए फंड की कमी हो जाती है। केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया कि जब राज्य सरकारें बाजार से ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज (Market Borrowings) उठाती हैं, तो उस पैसे को ऐसी पूंजीगत परियोजनाओं में लगाया जाना चाहिए जो भविष्य में राज्य के लिए राजस्व और रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकें। राजस्व घाटे की भरपाई के लिए कर्ज लेना एक खतरनाक चक्रव्यूह है, जिससे हर राज्य को बचना चाहिए।

राज्यों की वित्तीय स्थिति में पारदर्शिता और एकरूपता लाने के उद्देश्य से इस उच्चस्तरीय सम्मेलन में आरबीआई ने ‘कंपेंडियम ऑन कैश एंड डेट मैनेजमेंट फॉर स्टेट गवर्नमेंट्स’ (Compendium on Cash and Debt Management for State Governments) शीर्षक से एक विशेष पुस्तिका जारी की। इस आधिकारिक दस्तावेज में राज्यों के लिए नकदी प्रवाह के दैनिक असंतुलन को प्रबंधित करने, वेज एंड मीन्स एडवांसेज (WMA) और ओवरड्राफ्ट सुविधाओं का न्यूनतम व सही उपयोग करने के व्यावहारिक दिशा-निर्देश संकलित किए गए हैं। इसके अलावा, सम्मेलन में राज्यों द्वारा ‘बेंचमार्क इश्यूएंस स्ट्रैटेजी’ (Benchmark Issuance Strategy) को अपनाने पर भी गहन चर्चा हुई। इसका मकसद यह है कि राज्य सरकारें अलग-अलग तारीखों पर बिखरे हुए बॉन्ड जारी करने के बजाय एक मानकीकृत और लिक्विड बेंचमार्क डेट पोर्टफोलियो बनाएं, जिससे उन्हें बाजार से कम ब्याज दर पर उधारी मिल सके और निवेशकों का भरोसा भी मजबूत हो।

इस बैठक का सबसे क्रांतिकारी और तकनीकी सुझाव कल्याणकारी योजनाओं से जुड़ा रहा। आरबीआई ने राज्यों से आग्रह किया कि वे डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के तहत दी जाने वाली सरकारी आर्थिक सहायता में ‘प्रोग्रामेबल सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी’ यानी P-CBDC (डिजिटल रुपया – e₹) के उपयोग को तेजी से अपनाएं।

  • प्रोग्रामेबल सीबीडीसी से क्या बदलेगा: सामान्य बैंक ट्रांसफर में लाभार्थी को मिलने वाले पैसे का वह किसी भी अन्य मद (जैसे नशा या गैर-जरूरी खर्च) में इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन प्रोग्रामेबल डिजिटल रुपये के जरिए राज्य सरकारें पैसे को ‘उद्देश्य-विशिष्ट’ (Purpose-Specific) और ‘लोकेशन-विशिष्ट’ बना सकती हैं। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी किसान को खाद-बीज के लिए सब्सिडी दी गई है, तो वह डिजिटल रुपया केवल अधिकृत बीज भंडार या खाद केंद्र पर ही भुनाया जा सकेगा। इससे सरकारी योजनाओं में होने वाले लीकेज, बिचौलियों के दखल और फर्जीवाड़े पर 100% अंकुश लगेगा।

डिजिटल वित्तीय ढांचे का दायरा ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों तक पहुंचाने के लिए आरबीआई ने राज्यों को तत्काल ‘यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस’ (ULI) प्लेटफॉर्म पर ऑनबोर्ड होने का आह्वान किया। जिस तरह यूपीआई (UPI) ने देश में भुगतान प्रणाली की तस्वीर बदली है, उसी तरह आरबीआई द्वारा विकसित यूएलआई विभिन्न राज्यों के भूमि रिकॉर्ड, डिजिटल पहचान और क्रेडिट डेटा को एक क्लिक पर बैंकों से जोड़ता है। इसके जरिए किसानों, छोटे व्यापारियों और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को बिना किसी दलाली या कागजी दौड़-भाग के मिनटों में औपचारिक बैंक लोन मिलना संभव होता है। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति (SLBC) के मंच का पूरी सक्रियता से उपयोग करने को कहा, ताकि राज्य की प्राथमिकताओं वाले सेक्टरों में ऋण वितरण की गति तेज हो सके।

आरबीआई की यह सलाह ऐसे समय में आई है जब वैश्विक स्तर पर ब्याज दरें संवेदनशील बनी हुई हैं और घरेलू स्तर पर कई राज्यों पर कर्ज का बोझ उनके सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 30% से 40% तक के खतरनाक स्तर को छू रहा है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे बड़े राज्यों से लेकर पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों तक, वित्तीय संतुलन बनाए रखना देश की समग्र आर्थिक संप्रभुता के लिए जरूरी है। आरबीआई का यह रोडमैप साफ करता है कि वित्तीय अनुशासन का मतलब विकास रोकना नहीं है, बल्कि कर्ज का सही मोल समझना, डिजिटल तकनीकों के जरिए सरकारी धन की बर्बादी रोकना और भविष्योन्मुखी बुनियादी ढांचे में निवेश करके राज्यों को आत्मनिर्भर बनाना है।