
भारतीय बैंकिंग और सामाजिक कल्याण के इतिहास में प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY) का शुभारंभ एक युगांतरकारी मोड़ साबित हुआ। वर्षों तक देश की एक बहुत बड़ी आबादी औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से पूरी तरह कटी हुई थी। पारंपरिक बैंकिंग व्यवस्था में न्यूनतम बैलेंस बनाए रखने की अनिवार्यता और जटिल कागजी औपचारिकताओं के चलते गरीब और ग्रामीण तबका बैंक की चौखट तक जाने से झिझकती थी। लेकिन जब ‘सबका साथ, सबका विकास’ के विजन के साथ जन धन योजना की शुरुआत हुई, तो इसने केवल बैंक खातों की संख्या नहीं बढ़ाई, बल्कि देश के अंतिम छोर पर खड़े नागरिक के हाथ में आर्थिक सशक्तीकरण का सबसे मजबूत औजार थमा दिया।
शून्य से 50 करोड़ पार: आंकड़ों में वित्तीय क्रांति का सफर
प्रधानमंत्री जन धन योजना की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण इसके आंकड़े हैं, जो किसी भी वैश्विक वित्तीय समावेशन अभियान से कहीं बड़े हैं। देश भर में 53 करोड़ से अधिक जन धन बैंक खाते खोले जा चुके हैं, जिनमें कुल जमा राशि 2.3 लाख करोड़ रुपये के ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर चुकी है।
योजना की शुरुआत में आलोचकों का मानना था कि ये खाते सिर्फ ‘जीरो बैलेंस’ बनकर रह जाएंगे। हालांकि, समय के साथ इन खातों में लगातार बढ़ती बचत ने यह साबित कर दिया कि भारत का निम्न-आय वर्ग भी छोटी-छोटी बचत करने और बैंकिंग प्रणाली में भरोसा जताने के लिए पूरी तरह तैयार था। आज औसतन हर जन धन खाते में 4,000 रुपये से अधिक की परिचालन राशि जमा है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती क्रय शक्ति और वित्तीय जागरूकता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
आधी आबादी का पूरा हक: 55% से अधिक महिला खातेदार
जन धन योजना का सबसे प्रेरणादायक पहलू महिलाओं की व्यापक भागीदारी रहा है। कुल खुले खातों में से 55% से अधिक खाते ग्रामीण और अर्ध-शहरी महिलाओं के हैं। सदियों से घर के चूल्हे-चौके तक सीमित और नकद लेन-देन में पुरुषों पर निर्भर रहने वाली महिलाओं के नाम जब खुद का बैंक पासबुक और एटीएम कार्ड आया, तो उनके भीतर निर्णय लेने का एक नया आत्मविश्वास पैदा हुआ।
महिलाएं अब अपनी निजी बचत को परिवार के अन्य खर्चों से अलग सुरक्षित रखने लगी हैं। इसके अलावा, स्वयं सहायता समूहों (SHG), सूक्ष्म ऋण और सरकारी योजनाओं का सीधा पैसा महिला लाभार्थियों के खातों में पहुंचने से ग्रामीण स्तर पर महिला उद्यमिता को अप्रत्याशित बढ़ावा मिला है।
JAM ट्रिनिटी और डीबीटी: बिचौलियों का खेल हुआ पूरी तरह खत्म
जन धन योजना ने भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर—’JAM ट्रिनिटी’ (Jan Dhan, Aadhaar, Mobile) की सबसे मजबूत पहली कड़ी का निर्माण किया। आधार कार्ड के जरिए बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और मोबाइल बैंकिंग के जुड़ाव ने डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) को जमीन पर उतारा।
पहले जहां सरकारी सब्सिडी और राहत पैकेज के पैसों में बड़े पैमाने पर लीकेज और बिचौलियों के कमीशन की शिकायतें आती थीं, वहीं अब पीएम किसान सम्मान निधि, एलपीजी सब्सिडी (पहल योजना), मनरेगा मजदूरी और मातृत्व वंदना जैसी 300 से अधिक कल्याणकारी योजनाओं का शत-प्रतिशत पैसा सीधे लाभार्थी के खाते में एक क्लिक पर पहुंचता है। कोरोना महामारी के संकट के दौरान इसी जन धन नेटवर्क के जरिए करोड़ों गरीब परिवारों और महिलाओं के खातों में सीधे आपातकालीन वित्तीय सहायता पहुंचाना संभव हो सका था।
रूपे डेबिट कार्ड और माइक्रो-इंश्योरेंस: सुरक्षा का दोहरा कवच
जन धन खाताधारकों को केवल पैसा जमा करने की सुविधा ही नहीं मिली, बल्कि उन्हें ‘रूपे डेबिट कार्ड’ (RuPay Card) के जरिए डिजिटल भुगतान की मुख्यधारा में लाया गया। 34 करोड़ से अधिक रूपे कार्ड धारकों को 2 लाख रुपये तक का इन-बिल्ट दुर्घटना बीमा कवर (Accident Insurance) बिना किसी अतिरिक्त प्रीमियम के मिलता है।
इसके साथ ही, इन खातों को प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (PMJJBY), प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (PMSBY) और अटल पेंशन योजना (APY) जैसी किफायती माइक्रो-इंश्योरेंस और पेंशन स्कीमों से सीधे जोड़ा गया। मात्र कुछ रुपयों के मामूली ऑटो-डेबिट प्रीमियम पर गरीब परिवारों को जीवन सुरक्षा और वृद्धावस्था पेंशन का भरोसा मिला, जिसने उनके वित्तीय जीवन को एक सुरक्षित आधार दिया।
बैंक मित्र और डिजिटल क्रांति: चौखट तक पहुंची बैंकिंग सेवाएं
इस विशाल अभियान को सफल बनाने में ‘बैंक मित्र’ (Business Correspondents) और आधार इनेबल्ड पेमेंट सिस्टम (AePS) ने क्रांतिकारी भूमिका निभाई। दूर-दराज के पहाड़ी, रेगिस्तानी और जनजातीय क्षेत्रों में जहां ईंट-पत्थर की बैंक शाखाएं खोलना आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं था, वहां माइक्रो-एटीएम और बायोमेट्रिक डिवाइस लेकर बैंक मित्र सीधे ग्रामीणों के घर तक पहुंचे।
अंगूठे के निशान से नकदी निकासी और जमा की सुविधा ने निरक्षर और बुजुर्ग ग्रामीणों के लिए बैंकिंग को बेहद आसान बना दिया। आज यूपीआई (UPI) और क्यूआर कोड आधारित डिजिटल लेनदेन जिस तेजी से ग्रामीण हाट-बाजारों में फल-फूल रहा है, उसकी वास्तविक जमीन जन धन खातों ने ही तैयार की थी।
आगे की राह: माइक्रो-क्रेडिट और धन सृजन की ओर कदम
वित्तीय समावेशन के पहले चरण में बैंक खाता खोलना और बचत जुटाना मुख्य लक्ष्य था, जो पूरी तरह सफल रहा है। अब यह योजना अपने अगले चरण—’फाइनेंशियल डीपनिंग’ (Financial Deepening) में प्रवेश कर चुकी है।
अब फोकस जन धन खाताधारकों को उनकी नियमित बैंकिंग हिस्ट्री के आधार पर आसान माइक्रो-क्रेडिट (छोटे लोन), मुद्रा लोन, किसान क्रेडिट कार्ड और म्यूचुअल फंड की माइक्रो-एसआईपी (SIP) जैसे आधुनिक वित्तीय उत्पादों तक आसान पहुंच दिलाने पर है। जब देश का अंतिम नागरिक केवल बचतकर्ता ही नहीं बल्कि एक निवेशक और उद्यमी बनेगा, तभी जन धन योजना का आर्थिक सशक्तीकरण का यह सफर अपनी पूर्णता को प्राप्त करेगा।
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