OTT Film Certification Row: बिना सेंसर सर्टिफिकेट के फिल्म की स्ट्रीमिंग गैरकानूनी; ‘सतलुज’ विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र और राज्य सरकारों को दिए कड़े निर्देश

डिजिटल प्लेटफॉर्म और ओटीटी (OTT Platforms) पर परोसे जा रहे कंटेंट के नियमन (Regulation) को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाया है। फिल्म प्रमाणन नियमों (Film Certification Rules) के खुले उल्लंघन पर गहरी नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि बिना वैध सेंसर सर्टिफिकेट (Valid Censor Certificate) के किसी भी फिल्म की स्क्रीनिंग करना या उसे ओटीटी पर स्ट्रीम करना पूरी तरह से गैरकानूनी है।

अदालत की यह तीखी टिप्पणी विवादित फिल्म ‘सतलुज’ (Satluj) को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान आई। इस फिल्म पर बिना आवश्यक कानूनी सर्टिफिकेशन के एक प्रमुख ओटीटी प्लेटफॉर्म पर प्रदर्शित किए जाने का आरोप है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और खुद डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की कानूनी जवाबदेही तय करते हुए उनके अधिकारों और कर्तव्यों का पूरा खाका स्पष्ट कर दिया है।

बिना आवश्यक सर्टिफिकेट के स्क्रीनिंग पूरी तरह गैरकानूनी: सर्वोच्च अदालत

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश का कानून सभी के लिए बराबर है। किसी भी फिल्म को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने या डिजिटल माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाने से पहले केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) का सर्टिफिकेट होना अनिवार्य है। बिना इसके कोई भी स्ट्रीमिंग कानून का सीधा उल्लंघन (Violation of Law) मानी जाएगी।

भविष्य में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फिल्मों की रिलीज और कानूनी जवाबदेही के लिहाज से सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों को बेहद अहम माना जा रहा है:

1. आपराधिक कार्रवाई करना राज्य सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई फिल्म बिना सेंसर बोर्ड की मंजूरी के या नियमों को ताक पर रखकर प्रदर्शित की जाती है, तो कानून व्यवस्था बनाए रखने और दोषियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई (Criminal Action) करने की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की होती है। राज्य सरकारों को ऐसे मामलों में बिना किसी ढिलाई के तुरंत सख्त कदम उठाने चाहिए।

2. केंद्र सरकार के पास है कंटेंट हटाने (Take Down) का पूरा अधिकार

अदालत ने यह भी साफ किया कि नियमों का उल्लंघन होने की स्थिति में केंद्र सरकार मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती। केंद्र सरकार के पास यह कानूनी अधिकार है कि वह बिना सर्टिफिकेशन के स्ट्रीम की जा रही किसी भी फिल्म या आपत्तिजनक कंटेंट को तुरंत प्लेटफॉर्म से हटाने (Remove) का निर्देश दे सकती है।

केंद्र की त्वरित भूमिका की सराहना: सर्वोच्च अदालत ने माना कि ‘सतलुज’ फिल्म के मामले में केंद्र सरकार ने समय रहते हस्तक्षेप किया और फिल्म को हटाने के लिए आवश्यक कदम उठाए। इससे यह साफ हो जाता है कि डिजिटल स्पेस की निगरानी में केंद्र की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।

3. कटघरे में ओटीटी प्लेटफॉर्म; इंटरमीडियरी (Intermediary) भूमिका की होगी जांच

अदालत ने संकेत दिया कि इस पूरे विवाद में सिर्फ फिल्म मेकर्स ही नहीं, बल्कि उस डिजिटल प्लेटफॉर्म (इंटरमीडियरी) की भूमिका की भी गहन जांच की जा सकती है जिसने बिना वैध कागजात के फिल्म को अपने ऐप पर लाइव किया। कोर्ट ने कहा कि डिजिटल युग में प्लेटफॉर्म्स अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते। ऐसे मामलों में संबंधित प्लेटफॉर्म की लायबिलिटी (जवाबदेही) तय करना जरूरी है और उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई किए जाने पर विचार किया जा रहा है।

फिर गरमाई ओटीटी रेगुलेशन और सेंसरशिप पर बहस

सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद एक बार फिर देश में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के रेगुलेशन और सेंसरशिप के दायरे को लेकर बहस तेज हो गई है। अब तक ओटीटी प्लेटफॉर्म्स काफी हद तक सेल्फ-रेगुलेशन (स्व-नियमन) के तहत काम करते आए हैं, लेकिन इस नए मामले के बाद यह तय माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में डिजिटल माध्यमों पर रिलीज होने वाली फिल्मों और वेब सीरीज के लिए सर्टिफिकेशन के नियम और अधिक सख्त कर दिए जाएंगे।