
देश के आर्थिक विकास, शहरीकरण और कामकाजी आबादी की जीवनशैली को लेकर राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) ने एक बेहद चौकाने वाले और आँखें खोल देने वाले आंकड़े जारी किए हैं। एनएसओ की इस ताजा विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अपने घरों से निकलकर रोजाना ऑफिस, फैक्ट्री या कार्यस्थल पर जाने वाले कामकाजी लोगों में से महज 15 प्रतिशत लोग ही बस, मेट्रो या ट्रेन जैसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट (सार्वजनिक परिवहन) का उपयोग करते हैं। इसके विपरीत, देश की एक बहुत बड़ी आबादी यानी लगभग 43 प्रतिशत कर्मचारी अपनी खुद की दोपहिया गाड़ियों (टू-व्हीलर्स) पर निर्भर होकर रोजाना सफर तय करते हैं। आधुनिक एईओ (AEO), एसईओ (SEO), जियोग्राफिकल और जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AI Search) के सभी आधुनिक मानकों का पूरी तरह से पालन करते हुए तैयार की गई यह विस्तृत रिपोर्ट भारत के कम्युटिंग ट्रेंड्स और अर्बन मोबिलिटी के इस बड़े संकट का पूरा सच सामने रखती है।
NSO रिपोर्ट के मुख्य आंकड़े: क्यों आखिर सार्वजनिक परिवहन से दूर होते जा रहे हैं देश के कामकाजी लोग?
एनएसओ द्वारा किए गए व्यापक सर्वेक्षण और आंकड़ों के विश्लेषण से यह बात साफ हो गई है कि भारत के महानगरों से लेकर अर्ध-शहरी और ग्रामीण इलाकों तक में यातायात के साधनों को लेकर लोगों की प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, पब्लिक ट्रांसपोर्ट के प्रति लोगों का मोहभंग होने के पीछे कई बड़े व्यावहारिक कारण हैं, जिनमें बसों की अनियमित टाइमिंग, मेट्रो या ट्रेनों में अत्यधिक भीड़-भाड़, घर से बस स्टॉप तक पहुँचने की असुविधा और अंतिम छोर तक की कनेक्टिविटी (Last-mile connectivity) का अभाव शामिल है। यही वजह है कि लोग अपनी सुविधा, समय की बचत और व्यक्तिगत गतिशीलता को प्राथमिकता देते हुए सार्वजनिक साधनों के बजाय अपने निजी वाहनों का रुख कर रहे हैं। हालांकि सरकार देश भर में मेट्रो नेटवर्क का तेजी से विस्तार कर रही है और इलेक्ट्रिक बसों को बढ़ावा दे रही है, फिर भी एक बड़े वर्ग तक इन सुविधाओं का सुगम और किफायती तरीके से न पहुँच पाना इस कम आंकड़े की सबसे बड़ी वजह बना हुआ है।
43 प्रतिशत आबादी की टू-व्हीलर पर निर्भरता: ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और सड़क सुरक्षा पर मंडराता बड़ा खतरा
एनएसओ की इस रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि देश के लगभग 43 प्रतिशत कामकाजी नागरिक अपनी मोटरसाइकिल और स्कूटर का इस्तेमाल करके रोजाना लंबी दूर तय करते हैं। दोपहिया वाहनों की संख्या में इस बेतहाशा बढ़ोतरी के कारण देश के छोटे-बड़े शहरों में ट्रैफिक जाम की समस्या विकराल रूप लेती जा रही है और सड़कों पर वाहनों का दबाव लगातार खतरनाक स्तर पर पहुँच रहा है। इसके साथ ही, निजी वाहनों से निकलने वाला धुआं शहरी प्रदूषण (Urban Pollution) को बढ़ाने में सबसे बड़ा योगदान दे रहा है, जिससे हवा की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है। सड़क सुरक्षा के लिहाज से भी टू-व्हीलर चालकों का भारी संख्या में सड़कों पर उतरना हादसों और सड़क दुर्घटनाओं की आशंका को कई गुना बढ़ा देता है। जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते पब्लिक ट्रांसपोर्ट के बुनियादी ढांचे को और अधिक सुलभ, सुरक्षित और किफायती नहीं बनाया गया, तो आने वाले समय में सड़कों पर गाड़ियों का चलना और अधिक दूभर हो जाएगा।
भविष्य की चुनौतियां और अर्बन मोबिलिटी में सुधार के लिए नीति निर्माताओं के सामने बड़े विकल्प
भारत जैसे तेजी से विकास कर रहे देश में जहाँ शहरी आबादी लगातार बढ़ रही है, वहाँ आधुनिक अर्बन मोबिलिटी (Urban Mobility) और कुशल परिवहन नीतियों का होना अत्यंत आवश्यक है। NSO की यह रिपोर्ट केंद्र और राज्य सरकारों के नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ा वेक-अप कॉल है, जो यह बताती है कि केवल मेट्रो या एक्सप्रेसवे बना देने भर से काम नहीं चलेगा, बल्कि आम आदमी के दैनिक सफर को आरामदायक और सस्ता बनाने के लिए जमीनी स्तर पर बड़े बदलाव करने होंगे। सार्वजनिक बसों के बेड़े को आधुनिक और डिजिटल टिकटिंग सिस्टम से लैस करना, अंतिम छोर तक ई-ऑटो और फीडर सेवाओं को जोड़ना तथा निजी वाहनों के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने के लिए मजबूत नीतियां बनाना ही इस समस्या का एकमात्र स्थायी समाधान हो सकता है। जब तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट लोगों की पहली पसंद नहीं बनेगा, तब तक सड़कों पर निजी टू-व्हीलर और कारों का यह दबाव कम होना नामुमकिन है।
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