
हिंदू धर्म शास्त्रों में अधिक मास यानी पुरुषोत्तम माह की कथा सुनने और पढ़ने का विशेष महत्व बताया गया है। इस परम पवित्र महीने में श्रीहरि विष्णु और उनके विभिन्न प्रसंगों की कथाएं भक्तों के सभी कष्टों को दूर करने वाली मानी जाती हैं। श्रद्धालुओं और पाठकों की सुविधा के लिए यहाँ अधिक मास महात्म्य के नवें (9वें) और दसवें (10वें) अध्याय की संपूर्ण कथा नीचे दी जा रही है:
नवां अध्याय: अनाथ ऋषि कन्या के आश्रम में दुर्वासा मुनि का शुभागमन
सूत जी कहने लगे– हे ऋषियों! इसके आगे नारद जी ने भगवान नारायण से मेधावी ऋषि की उस रूपवती और गुणवती कन्या का वृतान्त पूछा। नारद जी ने कौतुहलवश पूछा– “हे प्रभो! अपने पिता के देहावसान के बाद उस असहाय ऋषि कन्या ने घने वन में क्या किया? क्या किसी अन्य ऋषि या महात्मा ने उसके साथ विवाह किया या वह अकेली ही रही?”
तब भगवान नारायण ने नारद जी के संशय को दूर करते हुए कहा– हे नारद! उस अनाथ कन्या ने अत्यंत दुःख और वेदना के साथ अपने स्वर्गीय पिता का स्मरण करते हुए, उसी निर्जन वन के आश्रम में रहकर अपने जीवन के कुछ कठिन दिन व्यतीत किए।
एक दिन भाग्यवश, उस शांत वन में अचानक अत्यंत क्रोधी स्वभाव वाले ‘महाकोपी’ दुर्वासा मुनि का शुभागमन हुआ। अपने आश्रम के द्वार पर साक्षात तेजपुंज मुनिराज को आते देख, शोक के गहरे सागर में डूबी हुई उस कुमारी ने तुरंत उठकर उनके चरणों में साष्टांग नमस्कार किया। आदरपूर्वक मुनि को अपने आश्रम के भीतर लाई। उसने वन के कंद-मूल, नाना प्रकार के स्वादिष्ट फलों, अर्ध्य और पाद्य (पैर धोने का जल) से मुनि दुर्वासा का विधिवत पूजन और सत्कार किया।
इसके बाद वह मुनि कन्या अत्यंत विनीत भाव से हाथ जोड़कर कहने लगी– “हे मुनिराज! आपको मेरा बारंबार नमस्कार है। मुझ जैसी अभागी और असहाय कन्या के इस छोटे से आश्रम में आपके पवित्र चरणों का आगमन कैसे हुआ? आपके आने से साक्षात मेरे सोए हुए भाग्य का उदय हो गया है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरे पिता के पूर्व संचित पुण्यों के प्रताप से ही आप मुझे समझाने और मेरा मार्गदर्शन करने के लिए यहां पधारे हैं। आप जैसे परम ज्ञानी महात्माओं के तीर्थरूपी चरणों की धूल को स्पर्श कर मेरा यह मानव जन्म सफल हो गया।”
इतना कहकर वह व्याकुल बाला मुनि के सम्मुख मौन होकर भूमि पर बैठ गई। कन्या के मुख से ऐसे आदरयुक्त वचन सुनकर दुर्वासा मुनि मंद-मंद मुस्कुराए और बोले– “धन्य है! हे ब्राह्मण पुत्री, तुम धन्य हो। तुमने अपने इस उत्तम व्यवहार से अपने पिता के पूरे कुल का उद्धार कर दिया है।”
कन्या पुनः बोली– “हे मुने! आपके इन कल्याणकारी वचनों को सुनकर मेरा आधा दुःख तो वैसे ही दूर हो गया है। हे कृपानिधान! आप मुझे कोई ऐसा सुलभ उपाय बताएं, जिससे मेरे जीवन का बचा हुआ कष्ट भी समाप्त हो जाए। मैं इस समय दुःख और घोर शोक की अग्नि की लपटों में भीतर ही भीतर जल रही हूं। इस पूरे संसार में मुझको सहारा देने वाला अब कोई नहीं है– न मेरी माता जीवित हैं, न पिता और न ही कोई भाई है। मैं इस घोर विपदा में अपने जीवन का निर्वाह किस प्रकार करूं? मैं अब जिस भी दिशा में देखती हूं, मुझे केवल निराशा का अंधकार ही दिखाई देता है।”
श्री नारायण कहने लगे– हे नारद! उस अनाथ और दुःख से पीड़ित कन्या के ऐसे करुण वचनों को सुनकर, मुनि दुर्वासा का हृदय पसीज गया और उन्होंने उस बाला के हित के लिए कुछ परम कल्याणकारी वचन कहे।
दसवां अध्याय: पुरुषोत्तम मास का अनादर और दुर्वासा मुनि का क्रोध
ऋषि दुर्वासा कहने लगे– हे सुन्दरी! तुम्हारे दुःखों के निवारण का एक परम उत्तम मार्ग है। अब से ठीक तीसरे महीने में ‘पुरुषोत्तम मास’ (अधिक मास) आने वाला है। इस पावन महीने में केवल श्रद्धापूर्वक स्नान-ध्यान करने से ही मनुष्य अपने समस्त पूर्व जन्मों के पापों और दोषों से तत्काल मुक्त हो जाता है।
इस पुरुषोत्तम मास के समान फल देने वाला कार्तिक आदि कोई भी अन्य महीना इस सृष्टि में नहीं है। वर्ष के सभी बारह महीने, उनके पक्ष और तिथियां इस पुरुषोत्तम मास की सोलहवीं कला (एक छोटे अंश) के बराबर भी पुण्य नहीं रखते हैं। जो फल किसी मनुष्य को बारह हजार वर्षों तक निरंतर पवित्र गंगा जी में स्नान करने से मिलता है, और जो दुर्लभ फल सिंह राशि के बृहस्पति में गोदावरी नदी में स्नान करने से प्राप्त होता है; वही महापुण्य इस पुरुषोत्तम मास में केवल एक बार विधिपूर्वक स्नान करने मात्र से सहज ही प्राप्त हो जाता है।
चूंकि यह महीना स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का अत्यंत प्रिय मास है, इसलिए इसमें किया गया स्नान, वस्त्र-अन्न का दान और नाम-जप मनुष्य के सब मनोवांछित फलों को पूर्ण करता है। इसलिए मेरी बात मानकर तुम भी आने वाले पुरुषोत्तम मास की पूरी श्रद्धा से सेवा और व्रत करो।
मुनिराज दुर्वासा उस कन्या को यह उत्तम उपदेश देकर चुप हो गए।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा– हे अर्जुन! मुनि के इन परम हितकारी वचनों को सुनकर भी, अपने दुर्भाग्य और बुद्धि के फेर के कारण वह मूढ़ (मूर्ख) कन्या अत्यंत क्रोधित हो गई और झल्लाकर बोली– “हे ब्राह्मण! मुझको आपके यह वचन बिल्कुल भी तर्कसंगत और ठीक नहीं लग रहे हैं। आप माघ आदि पवित्र महीनों को किस आधार पर छोटा और कम फल देने वाला बता रहे हैं? और आप कार्तिक जैसे महान मास को इनसे कमतर कैसे कह सकते हैं? क्या पूरी श्रद्धा से सेवा किया हुआ वैशाख का महीना मनुष्य को उसका इच्छित फल नहीं देता? यह मलमास (अधिक मास) तो संसार के सभी शुभ कर्मों में पूरी तरह से निंदित और त्याज्य माना गया है। हे मुने! जो महीना सूर्य की संक्रांति से पूरी तरह रहित है, उसे भला आप सभी महीनों में श्रेष्ठ कैसे कह सकते हैं?”
इस प्रकार उस नादान ब्राह्मण पुत्री के क्रोध और अहंकार से भरे कटु वचनों को सुनकर, दुर्वासा मुनि का तपोमय शरीर भीतर से जलने लगा और क्रोध के मारे उनके दोनों नेत्र अंगारे की तरह लाल हो गए। परंतु, चूंकि वह कन्या उनके परम मित्र मेधावी ऋषि की पुत्री थी, इसलिए उन्होंने अपने उग्र क्रोध पर नियंत्रण पाया और उसे कोई भयंकर शाप नहीं दिया।
मुनि मन ही मन सोचने लगे कि– “यह कन्या अभी सर्वथा मूर्ख और नादान है, यह अपने अच्छे और बुरे (हित-अहित) को बिल्कुल नहीं जानती। जिस पुरुषोत्तम मास के गूढ़ महात्म्य को बड़े-बड़े ज्ञानी और महर्षि भी पूरी तरह नहीं समझ पाते, उसे यह अल्प बुद्धि वाली कन्या भला कैसे जान सकती है? इसके अतिरिक्त यह बिना माता-पिता की अनाथ बच्ची पहले से ही दुःख की अग्नि में सुलग रही है, यह मेरे उग्र शाप के ताप को सहन नहीं कर पाएगी।”
ऐसा विचार कर मुनि दुर्वासा ने अपने उत्पन्न हुए तीव्र क्रोध को शांत किया और सामान्य होकर उस व्याकुल कन्या से कहने लगे– “पुत्री! तू इस समय अत्यंत दुःखी और नादान है, इसलिए तेरे इस अपराध पर मुझे कुछ भी कोप (क्रोध) नहीं है। जैसा तेरे इस अभागे मन को ठीक लगे, तू वैसा ही कर। परंतु भविष्य में जो कुछ घटित होने वाला है, उसे ध्यान से सुन। मैं तुझे सचेत करता हूं कि तूने जो साक्षात भगवान के स्वरूप ‘पुरुषोत्तम मास’ का घोर अनादर और निंदा की है, उसका कड़वा फल तुझे इस जन्म में या अपने अगले जन्म में अवश्य ही भोगना पड़ेगा। चूंकि तेरे पिता मेरे प्रिय मित्र थे, केवल इसी कारण मैं तुझे कोई श्राप नहीं दे रहा हूं क्योंकि तू अभी अबोध बालक है और शुभ-अशुभ की पहचान नहीं रखती। तेरा कल्याण हो, मैं अब भगवान नारायण की शाश्वत सेवा में प्रस्थान करता हूं।”
श्रीकृष्ण कहने लगे– हे अर्जुन! ऐसा कहकर वे महातेजस्वी और तपस्वी दुर्वासा मुनि क्षण भर में वहां से चले गए। मुनि के जाते ही, पुरुषोत्तम मास के अनादर के कुप्रभाव के कारण वह रूपवती कन्या उसी क्षण तेजहीन और कांतिहीन (काली) हो गई।
अपने रूप को नष्ट हुआ देख वह अपने मन में अत्यंत पश्चाताप और विचार करने लगी कि अब मुझे तत्काल फल देने वाले पार्वती के पति भगवान श्री शंकर (महादेव) की ही आराधना करनी चाहिए। ऐसा पक्का निश्चय करके वह अपने आश्रम के भीतर चली गई और महादेव को प्रसन्न करने के लिए अत्यंत कठिन तपस्या करने की तैयारी करने लगी।
सूत जी कहने लगे– हे शौनकादि ऋषियों! वह बाला परम ज्ञानी मुनि दुर्वासा के कल्याणकारी वचनों को निंदित ठहराकर, तथा अनंत फल देने वाले साक्षात भगवान विष्णु और सावित्री के पति ब्रह्मा जी की आराधना को छोड़कर, अपने वन के आश्रम में केवल भगवान शिव की कठोर सेवा और तप में लीन हो गई। (इसके आगे की कथा अगले अध्याय में…
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