News India Live, Digital Desk : सनातन धर्म में जब भी देवी-देवताओं की बात होती है, तो ’33 कोटि’ शब्द का जिक्र सबसे पहले आता है। अक्सर लोग इसे ’33 करोड़’ समझने की भूल कर बैठते हैं, जबकि शास्त्रों में इसका अर्थ बिल्कुल अलग बताया गया है। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि कलयुग के जाग्रत देव और भक्तों के संकट हरने वाले पवनपुत्र हनुमान का नाम इन 33 कोटि देवताओं की सूची में शामिल नहीं है? आखिर ऐसा क्यों है? आइए जानते हैं इस रहस्य के पीछे का आध्यात्मिक और पौराणिक तर्क।
33 कोटि का असली अर्थ: क्या वाकई करोड़ों देवता हैं?
सबसे पहले उस भ्रम को दूर करना जरूरी है जो ’33 कोटि’ शब्द को लेकर समाज में फैला है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘कोटि’ का अर्थ ‘प्रकार’ (Types) होता है, न कि ‘करोड़’। शास्त्रों के मुताबिक इन 33 प्रकार के देवताओं में 12 आदित्य, 11 रुद्र, 8 वसु और 2 अश्विनी कुमार शामिल हैं। यही वे मुख्य ऊर्जाएं हैं जो सृष्टि के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लेकिन सवाल वही है कि अगर ये मुख्य देवता हैं, तो महावीर हनुमान इस फेहरिस्त का हिस्सा क्यों नहीं बने?
हनुमान जी का विशिष्ट स्वरूप और भक्ति का सर्वोच्च शिखर
धार्मिक विद्वानों और पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, हनुमान जी का स्वरूप अन्य देवताओं से पूरी तरह भिन्न है। वे केवल एक देवता नहीं, बल्कि भक्ति, शक्ति और निस्वार्थ सेवा के सबसे बड़े प्रतीक हैं। हनुमान जी का पूरा अस्तित्व प्रभु श्री राम के प्रति समर्पित है। शास्त्रों में उन्हें ‘राम दूत’ और ‘राम भक्त’ के रूप में परिभाषित किया गया है। उनकी महिमा किसी श्रेणी या गणना में नहीं बांधी जा सकती, क्योंकि उन्होंने खुद को एक ‘भक्त’ के रूप में स्थापित किया है, जो किसी भी पद या पदवी से कहीं ऊपर है।
8 चिरंजीवियों में शामिल और शिव के अंशावतार
हनुमान जी के इस सूची में न होने का एक बड़ा कारण उनका ‘चिरंजीवी’ होना भी है। वे उन 8 महापुरुषों में शामिल हैं जिन्हें अमरता का वरदान प्राप्त है। अष्ट चिरंजीवियों में अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि व्यास, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि के साथ हनुमान जी का नाम आता है। भगवान शिव के अंशावतार होने के नाते वे स्वयं रुद्र के ही स्वरूप हैं, लेकिन उनकी विशिष्ट पहचान ‘अष्टसिद्धि और नवनिधि’ के दाता के रूप में है। श्री राम द्वारा दिए गए अमरता के वरदान और कलयुग में गंधमादन पर्वत पर उनके साक्षात वास की वजह से उनका स्थान किसी भी लिस्ट से कहीं अधिक दिव्य माना गया है।
भगवान और भक्त के बीच का सेतु हैं बजरंगबली
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हनुमान जी का महत्व 33 कोटि देवताओं की सूची में शामिल होने या न होने पर निर्भर नहीं करता। वे भगवान और भक्त के बीच एक अटूट सेतु (Bridge) का काम करते हैं। उन्हें ‘देवताओं का देव’ नहीं, बल्कि ‘भक्तों का शिरोमणि’ कहा गया है। यही कारण है कि उनका स्थान 33 कोटि देवताओं की परिधि से बाहर और उनसे कहीं अधिक ऊंचा माना जाता है। वे एक ऐसी शक्ति हैं जो आज भी इस पृथ्वी पर अपने भक्तों की रक्षा के लिए जाग्रत अवस्था में मौजूद हैं।
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