मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में स्थित ‘ककनमठ मंदिर’ किसी अजूबे से कम नहीं है। पहली नजर में देखने पर ऐसा लगता है कि यह मंदिर पल भर में गिर जाएगा, लेकिन सदियां बीत जाने के बाद भी यह अपनी जगह पर अडिग खड़ा है। बिना किसी सीमेंट, चूने या गारे के, सिर्फ पत्थरों को एक-दूसरे के ऊपर संतुलित करके बनाया गया यह ढांचा आज भी वैज्ञानिकों और पर्यटकों के लिए एक बड़ी पहेली बना हुआ है।
भूतों का मंदिर: एक रात की अधूरी कहानी
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस विशाल मंदिर का निर्माण इंसानों ने नहीं बल्कि भूतों ने किया था। कहा जाता है कि भूतों की टोली ने केवल एक रात में इस भव्य शिवालय को खड़ा कर दिया था। लेकिन जैसे ही मंदिर का काम पूरा होने वाला था, सुबह होने की आहट मिलते ही एक ग्रामीण महिला ने चक्की चलानी शुरू कर दी। चक्की की आवाज सुनकर भूत काम बीच में ही छोड़कर भाग गए, जिस वजह से मंदिर का ऊपरी हिस्सा आज भी अधूरा प्रतीत होता है। हालांकि, ऐतिहासिक रूप से इसका कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन यहाँ की हवाओं में आज भी यह लोककथा रची-बसी है।
नौ ‘काने दूल्हे’ और मंदिर के गिरने की अजीब मान्यता
ककनमठ मंदिर से जुड़ी एक और डरावनी और अजीबोगरीब मान्यता लोगों के बीच काफी मशहूर है। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि जिस दिन एक साथ ‘नौ काने दूल्हे’ (एक आंख से दिव्यांग) इस मंदिर की चौखट पर कदम रखेंगे, उसी क्षण यह मंदिर भरभराकर गिर जाएगा। इसी डर या विश्वास के कारण लोग आज भी यहाँ की बनावट को बड़ी हैरानी से देखते हैं। दूर से देखने पर ऐसा आभास होता है जैसे भारी-भरकम पत्थर हवा में तैर रहे हों, जो प्राचीन भारतीय वास्तुकला की बेहतरीन ‘बैलेंसिंग’ कला का नमूना है।
रानी ककनावती की भक्ति और इतिहास का सच
इतिहासकारों की मानें तो इस मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में कछवाहा वंश के राजा कीर्ति राज ने अपनी पत्नी रानी ककनावती की इच्छा पूरी करने के लिए करवाया था। रानी भगवान शिव की अनन्य भक्त थीं, इसलिए उन्हीं के नाम पर इसे ‘ककनमठ’ कहा गया। करीब 115 फीट ऊंचे इस मंदिर के गर्भगृह में आज भी एक विशाल शिवलिंग विराजमान है। मंदिर परिसर में बिखरी हुई खंडित मूर्तियां उन विदेशी आक्रमणों की गवाही देती हैं, जिन्होंने इस शिल्प कला को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की थी।
कैसे पहुँचें इस रहस्यमयी मंदिर तक?
अगर आप इस ऐतिहासिक और रहस्यमयी धरोहर को करीब से देखना चाहते हैं, तो आपको मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के सिहोनिया गांव पहुँचना होगा। यह जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मंदिर का गुंबद इतना ऊंचा है कि यह 3 किलोमीटर दूर से ही दिखाई देने लगता है। यहाँ जाने के लिए निजी वाहन सबसे उपयुक्त हैं क्योंकि सार्वजनिक परिवहन की सुविधा इस मार्ग पर सीमित है।
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