ममता बनर्जी की बढ़ी मुश्किलें: TMC में मची भगदड़, 20 सांसद और 100 पार्षदों के इस्तीफे की चर्चा से सियासी गलियारों में हलचल

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) एक बेहद चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। विधानसभा चुनाव के परिणामों के बाद से ही पार्टी के भीतर असंतोष की आग धधक रही है, जो अब विकराल रूप लेती नजर आ रही है। सियासी गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि पार्टी के दिग्गज नेताओं का मोहभंग हो चुका है और बड़े स्तर पर दलबदल की पटकथा लिखी जा रही है।

18 दिग्गज नेताओं ने खोली बगावत की राह

पार्टी के भीतर आंतरिक कलह इस कदर बढ़ गई है कि एक दर्जन से ज्यादा विधायक और वरिष्ठ नेता खुलेआम नीतियों पर सवाल उठाने लगे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुखेंदु शेख रॉय, सांसद काकोली घोष दस्तीदार, देव अधिकारी, कल्याण बनर्जी, रचना बनर्जी, कुणाल घोष और रिताब्रता बनर्जी समेत कम से कम 18 बड़े चेहरे पार्टी नेतृत्व से खासे नाराज बताए जा रहे हैं। अरुणव सेन, संदीपन साहा, नियामत शेख, पूर्व मंत्री कृष्णेंदु नारायण चौधरी, मनोज तिवारी, रविंद्रनाथ घोष, अतीन घोष, खगेश्वर रॉय, सौरव चक्रवर्ती, रत्ना चटर्जी और तपन चटर्जी जैसे नामों का शामिल होना टीएमसी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

20 सांसदों के पाला बदलने की अटकलें

सूत्रों की मानें तो टीएमसी के खेमे में बड़ी टूट की तैयारी है। संघवाद प्रतिदिन की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 12 टीएमसी सांसद भाजपा के संपर्क में हैं या समर्थन देने की राह पर हैं। यह सिलसिला यहीं नहीं रुकने वाला, चर्चा है कि यह आंकड़ा 20 सांसदों तक पहुंच सकता है। हालांकि, आधिकारिक तौर पर अभी कोई पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इन नेताओं की चुप्पी ममता बनर्जी की रातों की नींद उड़ाने के लिए काफी है।

निकाय चुनाव से पहले 100 पार्षदों का इस्तीफा

संकट सिर्फ विधायकों और सांसदों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर भी पार्टी कमजोर होती दिख रही है। खबर है कि पिछले कुछ दिनों में 100 से अधिक पार्षदों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ये इस्तीफे ऐसे समय में हो रहे हैं जब निकाय चुनाव सिर पर हैं। नाराज पार्षद न केवल पार्टी के शीर्ष नेतृत्व बल्कि सांसद अभिषेक बनर्जी के ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ पर भी सवाल उठा रहे हैं। हालांकि ममता बनर्जी ने सभी से एकजुट रहने की अपील की है, लेकिन जमीनी हालात उनके दावों के विपरीत दिख रहे हैं।

नंदीग्राम में उम्मीदवार ढूंढना बनी बड़ी चुनौती

इन सबके बीच, नंदीग्राम की सीट ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी पहेली बन गई है। उपचुनाव के लिए पार्टी को कोई भी बड़ा चेहरा उम्मीदवार के रूप में नहीं मिल रहा है। साल 2021 में शुभेंदु अधिकारी के हाथों मिली हार के बाद से ही टीएमसी इस सीट पर अपनी पकड़ बनाने के लिए जूझ रही है। 2026 में शुभेंदु अधिकारी की दोबारा जीत और भवानीपुर सीट छोड़ने के बाद से खाली हुई इस जगह के लिए कोई भी बड़ा नेता जोखिम लेने को तैयार नहीं है, जो ममता बनर्जी की कमजोर होती रणनीतिक पकड़ को दर्शाता है।