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Maharashtra Drought Crisis: महाराष्ट्र के 30 से ज्यादा जिलों में गहराया सूखा संकट, जानिए सरकार कैसे घोषित करती है सूखाग्रस्त क्षेत्र

महाराष्ट्र के ग्रामीण और कृषि प्रधान क्षेत्रों में एक बार फिर सूखे की गंभीर समस्या ने विकराल रूप ले लिया है। राज्य के मराठवाड़ा, विदर्भ, उत्तरी महाराष्ट्र और पश्चिमी महाराष्ट्र के कई हिस्सों सहित 30 से अधिक जिलों में बारिश की भारी कमी, गिरते भूजल स्तर और सूखते जलाशयों ने किसानों और आम नागरिकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। खेतों में खड़ी फसलें पानी के अभाव में नष्ट हो रही हैं और सैकड़ों गांवों व बस्तियों में पीने के पानी की आपूर्ति पूरी तरह से वाटर टैंकरों पर निर्भर हो चुकी है। ऐसे संवेदनशील समय में यह जानना बेहद आवश्यक है कि किसी भी जिले, तहसील या ब्लॉक को आधिकारिक तौर पर सूखाग्रस्त (Drought-Hit) कैसे घोषित किया जाता है, इसके क्या तकनीकी व वैज्ञानिक मानक हैं और घोषणा के बाद प्रभावित किसानों को क्या-क्या सरकारी राहत मिलती है।

भारत में किसी भी राज्य या जिले को सूखाग्रस्त घोषित करने की व्यवस्था मनमाने आधार पर नहीं चलती, बल्कि इसके लिए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी ‘मैनुअल फॉर ड्रॉट मैनेजमेंट 2016’ के कड़े वैज्ञानिक दिशा-निर्देश लागू होते हैं। इस मैनुअल से पहले सूखा घोषित करने के नियम काफी व्यक्तिपरक हुआ करते थे, लेकिन 2016 के नए नियमों के तहत पूरी प्रक्रिया को डेटा, सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग और जमीनी सर्वेक्षणों से जोड़ दिया गया। इस प्रणाली के तहत सूखे को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा जाता है: सामान्य सूखा (Moderate Drought) और गंभीर सूखा (Severe Drought)। किसी भी क्षेत्र में आधिकारिक घोषणा से पहले निर्धारित चरणों और ट्रिगर मैट्रिक्स से गुजरना अनिवार्य होता है।

सूखा घोषित करने की प्रक्रिया मुख्यतः दो बड़े चरणों में बंटी होती है, जिन्हें तकनीकी भाषा में ट्रिगर-1 और ट्रिगर-2 कहा जाता है।

पहला चरण यानी ‘ट्रिगर-1’ पूरी तरह से वर्षा के आंकड़ों पर आधारित होता है। यदि किसी क्षेत्र में सामान्य से 60 प्रतिशत या उससे अधिक वर्षा की कमी दर्ज की जाती है, अथवा लगातार तीन से चार सप्ताह तक बिल्कुल बारिश नहीं होती (Dry Spell), तो पहला ट्रिगर सक्रिय मान लिया जाता है।

पहले ट्रिगर के सक्रिय होने के बाद ‘ट्रिगर-2’ के तहत चार प्रमुख कृषि एवं पर्यावरणीय संकेतकों की विस्तृत जांच की जाती है:

  • कृषि बुवाई का रकबा: क्या तय समय पर 50 प्रतिशत या उससे अधिक बुवाई प्रभावित हुई है?

  • सैटेलाइट आधारित वनस्पति सूचकांक (NDVI/NDWI): रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट्स से यह देखा जाता है कि खेतों में नमी और हरियाली की वास्तविक स्थिति क्या है।

  • मिट्टी की नमी सूचकांक (Soil Moisture Index): मिट्टी की विभिन्न परतों में पौधों की वृद्धि के लिए जरूरी नमी बची है या खत्म हो चुकी है।

  • हाइड्रोलॉजिकल संकेतक: जलाशयों, बांधों, नदियों का जलस्तर और केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार भूमिगत जल का स्तर सामान्य से कितना नीचे गिरा है।

यदि इन चार पैमानों में से कम से कम तीन पैमाने गंभीर स्थिति दर्शाते हैं, तो मामला अगले चरण यानी जमीनी सत्यापन के लिए आगे बढ़ता है।

कागजी आंकड़ों और सैटेलाइट तस्वीरों के बाद तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम ‘ग्राउंड ट्रुथिंग’ (Ground Truthing) कहलाता है। इसके तहत राज्य राजस्व विभाग, कृषि विभाग और जिला प्रशासन के अधिकारियों की संयुक्त टीमें प्रभावित गांवों में सीधे खेतों का दौरा करती हैं।

महाराष्ट्र में इस जमीनी पड़ताल को पारंपरिक रूप से ‘नजरअंदाजी’ या पीक कटिंग एक्सपेरिमेंट के रूप में भी समझा जाता है। अधिकारी प्रत्येक चयनित ब्लॉक के कम से कम 10 प्रतिशत गांवों का औचक निरीक्षण करते हैं। यहां ‘क्रॉप कटिंग’ के जरिए यह मापा जाता है कि सामान्य वर्षों की तुलना में फसल का उत्पादन कितना घटा है। यदि उत्पादन में 33 प्रतिशत या 50 प्रतिशत से अधिक का सीधा नुकसान दर्ज किया जाता है, तो जिला कलेक्टर अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करके राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और राज्य सरकार की कैबिनेट उप-समिति को भेजते हैं।

जिला स्तर से आई वैज्ञानिक रिपोर्टों की समीक्षा के बाद राज्य की मंत्रिपरिषद आधिकारिक रूप से संबंधित जिलों, तहसीलों या राजस्व मंडलों को सूखाग्रस्त घोषित करने की अधिसूचना (Gazette Notification) जारी करती है। इसके तुरंत बाद राज्य सरकार केंद्र सरकार को एक औपचारिक ज्ञापन (Memorandum) सौंपती है।

ज्ञापन के आधार पर केंद्र सरकार द्वारा एक अंतर-मंत्रालयी केंद्रीय दल (IMCT) राज्य के दौरे पर भेजा जाता है। यह केंद्रीय दल प्रभावित तालुकों का प्रत्यक्ष मुआयना करता है और अपनी अंतिम रिपोर्ट केंद्रीय गृह मंत्रालय व उच्च स्तरीय समिति को सौंपता है। इसके बाद राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) और राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) से राहत पैकेज के रूप में वित्तीय सहायता स्वीकृत की जाती है।

जब किसी जिले या ब्लॉक को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया जाता है, तो वहां के किसानों और स्थानीय जनता को कई तरह की प्रत्यक्ष प्रशासनिक व वित्तीय रियायतें मिलती हैं:

  • फसल ऋण और वसूली पर रोक: किसानों द्वारा लिए गए अल्पकालिक कृषि ऋणों की वसूली तत्काल रोक दी जाती है और उन्हें मध्यम अवधि के ऋणों में पुनर्गठित (Restructure) कर दिया जाता है।

  • मालगुजारी और बिजली बिलों में छूट: कृषि पंपों के बिजली बिलों में छूट या सब्सिडी दी जाती है और भूमि राजस्व (लगान) माफ कर दिया जाता है।

  • छात्रों की परीक्षा फीस माफी: प्रभावित क्षेत्रों के किसानों के बच्चों की स्कूलों और कॉलेजों की परीक्षा फीस राज्य सरकार द्वारा वहन की जाती है।

  • टैंकरों से जलापूर्ति और मवेशी छावनियां: पेयजल संकट से जूझ रहे गांवों में सरकारी खर्च पर पानी के टैंकर लगाए जाते हैं और पशुओं को बचाने के लिए चारा डिपो व चारा छावनियां (Cattle Camps) शुरू की जाती हैं।

  • मनरेगा कार्यों में बढ़ोतरी: ग्रामीण इलाकों में पलायन रोकने के लिए मनरेगा (MGNREGA) के तहत रोजगार के दिनों की सीमा बढ़ाकर जरूरतमंदों को तत्काल काम उपलब्ध कराया जाता है।